तेज हो सकता है उदारीकरण
प्रो. किरण बर्मन
काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी
संप्रग सरकार पर से वामपंथियों का नियंत्रण खत्म हो जाने की वजह से यह बात तो साफ हो गई है कि दूसरे चरण के आर्थिक सुधारों यानी नव-उदारवाद की गति में यकीनन तेजी आएगी।
अब तक मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने वामपंथियों के दबाव के कारण अपनी आर्थिक नीतियों पर नियंत्रण रखा था। अब संभावना यही है कि कुछ ऐसी मौद्रिक नीति, आयात निर्यात नीति, राजकोषीय नीति और औद्योगिक नीति जो पूंजीपति वर्ग को लाभ दे सकें वैसी नीतियों को ही बढ़ावा मिलेगा। सेज जैसी नीतियों पर अब तक हर राज्य में विरोध होता रहा है।
सरकार को समर्थन देते हुए वामदलों ने इसका विरोध किया लेकिन अब सेज जैसी योजनाएं और तेजी से बढ़ेंगी। हम आर्थिक सुधारों के लिए चीन से प्रेरणा लेते हैं लेकिन आपको मालूम होना चाहिए कि पूरे चीन में 6 इकनॉमिक जोन हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों को विनिवेश के तहत लाने की प्रक्रिया पर अब तक जो नियंत्रण था उस पर असर तो होगा ही। सरकार ज्यादा मुनाफे के चक्कर में अच्छी खासी कंपनियों को भी निजीकरण की राह की ओर ले जा रही है।
जहां तक शेयर बाजार की बात है शेयर बाजार में भले ही कुछ दिन बढ़े लेकिन आखिरकार उसे तो नीचे आना ही है। अर्थशास्त्र का यही सिद्धांत है कि तेज विकास के बाद मंदी तो आती ही है। विदेशी निवेशकों को भी लग रहा है कि कांग्रेस की सरकार का जीवनकाल ज्यादा दिनों का नहीं है। दुनिया की मंदी और यहां की राजनीतिक व्यवस्था का असर इन निवेशकों पर जरूर पड़ेगा और वे जब चाहे बाजार से अपना हाथ खींच सकते हैं। अगर वृद्धि दर भी ठीक रहे तो यह मैक्रो इंडिकेटर की तरह होगा और इससे यह जरूर लगेगा कि विकास हो रहा है।
लेकिन वास्तव में मोनोपॉली की प्रवृति बाजार में आएगी और कुछ आर्थिक शक्तियों का केंद्रीकरण बढ़ेगा। सरकार पहले से ही टेलीकॉम और बीमा के सेक्टर में विदेशी निवेश की सीमा बढ़ाने को बेताब है। रिटेल चेन कंपनियों के विदेशी पूंजी निवेश की अनुमति देने वाले विधेयक के जल्द पास होने की उम्मीद है। पेंशन फंड रेगुलेटरी और विकास प्राधिकरण विधेयक के पास होने पर पेंशन फंड के कारोबार पर से कर्मचारी भविष्य निधि संगठन का एकाधिकार खत्म हो जाएगा और सरकार की नव-उदारवादी नीतियां भी इन्हीं रास्तों की ओर ले जाती हैं। इससे बेरोजगारी और गरीबी तो बढ़ेगी ही।
बैलेंसशीट और बैंक रेट पर असर पड़ने से बुनियादी ढांचे के निर्माण की प्रक्रिया और भी महंगी हो जाएगी और लोग लोन भी कम लेंगे। मौजूदा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने वर्ष 1991 में ग्लोबलाइजेशन की नीतियों से प्रभावित होकर नई आर्थिक नीतियों को लागू कराया। इसके तहत विदेशी आयात-निर्यात पर कोई नियंत्रण न लगाने की बात थी। वित्तीय बाजार पर कम से कम नियंत्रण की बात की गई और निजीकरण और विनिवेश की प्रक्रिया को और बढ़ाई जाएगी। इसके अलावा कई तर्क ऐसे भी दिए गए कि बैलेंस ऑफ पेमेंट कम होगा, शिक्षा क्षेत्र और औद्योगिक क्षेत्र का विकास होगा और महंगाई कम होगी।
हालांकि उदारवादी नीतियों का असर कुछ ऐसा हुआ कि केवल 2 से 3 करोड़ लोगों को फायदा हुआ। प्रधानमंत्री का कहना है कि विकास की रफ्तार तेज है लेकिन यह वास्तविक वृद्धि नहीं कही जा सकती। विकास की कीमत अगर गरीब जनता चुकाती है तो यह नव-उदारवाद विकास को नहीं परिभाषित करती। प्रतिव्यक्ति आय में जो बढ़ोत्तरी हो रही है वह क्रीमी लेयर की आय में बढ़ोतरी है। हम वैश्वीकरण की प्रक्रिया से अलग नहीं हो सकते हैं लेकिन हम अपने देश की परिस्थितियों को समझकर अपनी शर्तो के मुताबिक उन नीतियों को लागू करना चाहिए ताकि उसके फायदे का व्यापक विस्तार आम जनता की जिंदगी में भी नजर आए। (बातचीत: शिखा शालिनी )
फ्लॉप शो है भारत में नव उदारवाद
प्रो. आनंद कुमार
जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
भारतीय समाज में सरकारीकरण की राजनीति और आर्थिकी से 1974-75 में ही मोहभंग होना शुरू हो गया था। इस प्रक्रिया में गरीबी और रोजगार के संदर्भ में समाज की आशाओं के विरुद्ध राजनीतिक भ्रष्टाचार ने दिशाहीन आर्थिकी को बढ़ावा दिया है। इस मोहभंग का परीक्षण हमारी अर्थव्यवस्था की दिशा में परिवर्तन के रूप में सामने आना स्वाभाविक ही था।
नब्बे के दशक के आरंभ में आर्थिक सुधारों को जो दौर शुरू हुआ था, उसके मिले-जुले परिणाम नजर आए हैं। भूमि सुधार और हरित क्रांति के अभियान की तुलना में नव उदारवाद यानी बाजार केंद्रित पूंजीवाद की नीतियों के परिणाम उत्साहवर्धक नहीं हैं। पिछले डेढ़ दशक में आर्थिक सुधारों ने हमारी अर्थव्यवस्था में समग्र गतिशीलता के आंकड़े जरूर उपलब्ध कराए हैं। यह कहना गलत नहीं है कि पिछले दिनों की आर्थिक नीतियों और कार्यक्रमों ने हमारी आर्थिक प्रगति की दर को 4-5 फीसदी से बढ़ाकर 8 से 9 फीसदी के करीब ला दिया है।
ये सुधार सीधे दोगुनी तरक्की का दावा करते हैं। लेकिन इसी दौर में भूमि सुधार और हरित क्रांति से भारत के ग्रामीण समाज में आई खुशहाली को ग्रहण लग गया। इसकी वजह नई नीतियों में कृषि, पशुपालन, गामीण उद्योग धंधों के लिए एक उदासीनता थी। नतीजतन आजादी के बाद पहली बार नकारात्मक परिवर्तन दर्ज किया गया। इन्हीं नीतियों के चलते कृषि क्षेत्र से श्रम और पूंजी दोनों का पलायन बहुत तेजी से हुआ है।
इन नीतियों ने ग्रामीण भारत की तस्वीर को बड़ी बेदर्दी से बदला है। देश में संपन्न प्रदेशों के किसान आत्महत्या करने को मजबूर हैं। महाराष्ट्र से लेकर पंजाब और हरियाणा तक मातमपुर्सी ही छाई हुई है। यह कड़वी सच्चाई इस देश की 70 फीसदी आबादी से जुड़ी हुई है। इसी के समानांतर बुनकरी, लकड़ी उद्योग, धातु उद्योग जैसे कुटीर उद्योग और दस्तकारी के क्षेत्र में भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आने से व्यापक तबाही का मंजर सामने आया है।
सिर्फ सूचना प्रौद्योगिकी जैसे कुछ क्षेत्रों में रोजगार के क्षेत्रों में जबरदस्त उछाल आया है। इसके साथ ही हमारे सेवा क्षेत्र का दायरा और बढ़ा है जिससे अर्थव्यवस्था में इसकी हिस्सेदारी और बढ़ी है। उद्योग क्षेत्र में कपड़ा, दवा, इमारती सामान जैसे धंधे पिटे हैं तो कंप्यूटर और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का कारोबार बढ़ा है। रोजगार के अवसरों के सृजन की बात करें तो यह बेहद बुरा दौर है। सही मायनों में यह रोजगार विहीन विस्तार का दौर है। हां, यह सही है कि चुनिंदा क्षेत्रों में मुट्ठी भर मोटी तनख्वाहों वाली नौकरियां भी आई हैं लेकिन आम उद्योग धंधों, मसलन कृषि और छोटे उद्योगों में बेरोजगारी बहुत तेजी से बढ़ी है।
ग्राम प्रधान अर्थव्यवस्था में यह पूंजी प्रधान तकनीक विस्तार का दौर है जहां अतिशिक्षित युवाओं के लिए तमाम अवसर बढ़े हैं और साधारण शिक्षा और कला कौशल वाले युवाओं के लिए अवसर सीमित हुए हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि शिक्षा प्राप्त करना भी बहुत महंगा हो गया है। आर्थिक सुधारों का लक्ष्य यह भी था कि दरिद्रता के दलदल में फंसे बीमारू राज्य नए तरीकों से संपन्नता की ओर बढ़ेंगे। लेकिन हालात सुधरे नहीं है।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक तो गरीबी में कमी आई है लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। इस संदर्भ में देखें तो कुल मिलाकर हालत और पतली ही हुई है। अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद कबूल कर चुके हैं कि गरीबों और पिछड़े क्षेत्रों में अति उग्रवादी राजनीति पनप रही है। यह राजनीतिक प्रवृत्ति हमारी जनतांत्रिक जड़ें काट रही है। अब अगर यह सब जानने के बाद भी कोई यही कहे कि नव उदारवाद ही सही रास्ता है, तो क्या कहा जा सकता है?
(बातचीत : प्रणव सिरोही )