नरसिंह राव की अल्पमत सरकार में वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने देश में उदारीकरण का बिगुल फूंका था। 2004 में उनके नेतृत्व में केंद्र में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार बनी।
ऐसे में यह जानना काफी रोचक है कि उन नीतियों को किस तरह आगे बढाया गया, जिसका बीजारोपण उन्होंने आज से 17 साल पहले किया था। क्या मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियां सचमुच तारीफ के काबिल रही हैं या फिर वह आर्थिक मोर्चे पर नाकाम साबित हुए हैं, इसी विषय पर केंद्रित है इस बार की जिरह :
नई बोतल में पुरानी शराब…
कमल नयन काबरा, वरिष्ठ अर्थशास्त्री
मनमोहन सिंह की अगुआई में यूपीए सरकार 2004 में केंद्र में सत्ता में आई। उस वक्त उन्होंने आर्थिक नीतियों के मोर्चे पर जो कुछ किया, उसमें कुछ भी नया नहीं है।
1991 में वित्त मंत्री के तौर पर मनमोहन सिंह ने आर्थिक संकट का हौवा पैदा करके सारी पुरानी नीतियां बदल दीं।पुरानी नीतियों को बदले जाने की जरूरत थी, पर यह बदलाव उसी दिशा में किया गया, जिन विकृतियों से अर्थव्यवस्था पहले से जूझ रही थी।
पुरानी नीतियां राज्यवादी थीं। यानी उनमें राज्य की प्रमुख भूमिका थी। लेकिन बाजार की देसी और विदेशी ताकतें उन्हें चलने नहीं दे रही थीं। आर्थिक शक्ति (खासकर विदेशी कर्जों की ताकत) का उपयोग करके उन्हें खत्म किए जाने की कोशिश की जा रही थी।
उसके बाद उन्हीं नीतियों को बाजारीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में मोड़ दिया गया। यूपीए सरकार में पिछली सरकार के मुकाबले एक खास फर्क था। इस सरकार ने न्यूनतम साझा कार्यक्रम (सीएमपी) बनाया। उसमें ज्यादातर बातें पुरानी नीतियों पर ही आधारित थीं। लेकिन उसमें दो-तीन बातें खास तौर पर महत्वपूर्ण थीं। मसलन, मुनाफे वाली कंपनियों का विनिवेश नहीं किया जाएगा और सारे देश में रोजगार गारंटी योजना शुरू की जाएगी।
सूचना के अधिकार और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को मजबूत बनाने की बात भी उसमें शामिल थी। इसके अलावा उदारीकरण की नीतियों की पुरानी बातें ही थीं। सामाजिक कल्याण के तहत यह बात थी कि गांवों में सुविधाओं का प्रसार किया जाएगा। कई चीजों को लागू करने के लिए कानून बदले जाने की जरूरत थी।
2004 में योजना आयोग ने 10वीं योजना का मध्यावधि आकलन पेश किया। उसमें कहीं यह संकेत नहीं था कि देश के खुदरा व्यापार में कोई दिक्कत है या 15 साल पहले भी इसमें कोई दिक्कत थी। इसी आकलन में यह बात जोड़ दी गई कि विदेशी कंपनियों को खुदरा व्यापार में आने की छूट मिलनी चाहिए। इस बात से यह साबित होता है कि सरकार में ऐसे लोग शामिल थे, जो देश की स्थितियों और जरूरतों के प्रति जवाबदेह और संवेदनशील नहीं थे।
हालांकि इसे पूरी तरह लागू कराना न तो संभव हो पाया है और न ही होगा। 1991 में मनमोहन सिंह के बजट में थोक बाजार के व्यापार में विदेशी कंपनियों को आने की छूट दी गई थी। 2004 में उसके 13 साल हो गए। लेकिन इसके नफा-नुकसान की कोई समीक्षा नहीं की गई।
यूपीए सरकार राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना लेकर आई। यदि इसके मसौदे को मूल रूप में ही लागू किया जाता, तो नतीजा शायद वैसा भी नहीं होता, जैसा आज है। लेफ्ट के दबाव में इस कानून को लागू किया गया। बावजूद इसके इस कानून को लागू किए जाने के मामले में कई खामियां हैं।
1991 से ही कीमतों मे लगातार 5 से 6 फीसदी की बढ़ोतरी होती रही। बावजूद इसके कि प्रतिस्पर्धा के माहौल में कीमतों के घटने और उत्पादन बढ़ने की बात की जा रही थी। हां, सेवा क्षेत्र में उत्पादन जरूर बढ़ा है, पर इस क्षेत्र में पहले से ही स्पध्र्दा का माहौल था।लोगों की आय और संपत्ति का केंद्रीकरण बढ़ा है। बचत दर बढ़कर 35 प्रतिशत, निवेश दर 36 प्रतिशत हो गई है।
देश में विदेशी व्यापार को पूरी छूट दे दी गई है। 1991-92 में देश के आंतरिक औद्योगिक उत्पादन का 30 प्रतिशत हिस्सा बाहर से आयात होता था। आज देश में जितना उत्पादन होता है, उससे 120 फीसदी ज्यादा माल बाहर से मंगाया जा रहा है। इससे जाहिर है कि आपका बाजार बाहर जा रहा है। बाहर के लोगों का रोजगार बढ़ रहा है।
फिलहाल आईटी, बीपीओ सेवाओं में रोजगार बढ़ने की बात की जा रही है। लेकिन हमारे यहां औद्योगिक क्षेत्र से ही रोजगार बढ़ सकता है। बाहर की कंपनियों के लिए हम उभरते हुए बाजार हैं। आज हालात यह है कि महंगाई की दर जब में औसतन 5 फीसदी की बढ़ोतरी को सामान्य माना जाता है।
एक सरकारी अर्थशास्त्री के मुताबिक यह कंफ र्ट जोन की सी स्थिति होती है। सोचने वाली बात यह है कि साल-दर-साल जिन लोगों की क्रय शक्ति 5 प्रतिशत से कम कर दी जाती है, उनके लिए यह कंफर्ट जोन में कैसे हो सकता है। यह एक राजनीतिक दृष्टिकोण है। मौजूदा नीतियों का आर्थिक पक्ष बेहद कमजोर और राजनीतिक पक्ष काफी मजबूत है।
हाल ही में एक आर्थिक अखबार ने 200 ब्लूचिप कंपनियों का एक आंकड़ा जारी किया। इसके मुताबिक इन कंपनियों के महज 4-5 प्रतिशत शेयर छोटे निवेशकों के पास हैं। इनके ज्यादातर शेयर विदेशी संस्थागत निवेशकों (एफआईआई) के पास हैं, जिनकी वजह से बाजार में उतार-चढ़ाव काफी बढ़ा है।
वायदा बाजार का कारोबार में बड़ी कंपनियों को 6-7 लाख टन अनाज खरीदने की आजादी दे दी गई है। महंगाई इन नीतियों से रूक नहीं सकती है। किसानों के अनाज की सरकारी खरीद ज्यादा से ज्यादा हो और राज्य सरकारें भी कुछ करें, तो यह संभव होगा। करोबारियों में लामबंदी नहीं हो और प्रतिस्पद्र्धा बढ़े।
लेकिन प्रतिस्पद्र्धा बढ़ी कहां है? काटर्ेलाइजेशन (निहित स्वार्थों के लिए गठजोड़) को देखते हुए सरकार खुद कहती है कि दाम नीचे कर लो और सामान की सप्लाई में कमी का लाभ मत उठाओ। सरकार को प्रभावी रूप से सख्त कदम उठाए जाने चाहिए। दिलचस्प बात यह है कि यह उनकी आर्थिक नीतियों के खिलाफ भी है। तेजी से कीमतें बढ़ेंगी, तो विकास की रफ्तार भी कुंद होगी। यह आत्मघाती नीति है।
यह अपविकास या कुविकास है। हर बढ़त विकास नहीं हो सकती है। मसलन महंगी कारों, शराब, पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली चीजों का उत्पादन बढ़ने को विकास की संज्ञा नहीं दी जा सकती। कंपनियों के मुनाफे का बढ़ना और रोजगार में ठहराव विकास की मिसाल नहीं हो सकते। देश में बेरोजगारी की हालत में विदेश से माल मंगाकर उनका उपभोग करना, क्या अच्छी बात है? किसानों की कर्जमाफी भी नाटक का एक हिस्सा है। किसानों के प्रति सरकार की संवेदनहीन है।
सरकार में वामपंथी दलों के होने का फायदा यह हुआ कि सार्वजनिक संपत्तियों को औने-पौने दामों में बेचने की प्रक्रिया बंद हो गई। राज्य सरकारों के काम में हस्तक्षेप की नीतियां चलाई जा रही हैं। राज्यों की मदद भी शर्तों के आधार पर की जाती है। ठीक उसी तरह जैसे विश्व बैंक, आईएमएफ और एडीबी भारत उसी शर्त पर कर्ज देते हैं कि वह उनकी नीतियों को अपने यहां लागू करेगा।
लिखी विकास की इबारत
अभिषेक मनु सिंघवी, प्रवक्ता कांग्रेस
आज जब आप विदेश जाते हैं या दुनिया के किसी हिस्से से आपका संवाद कायम होता है, तो सबसे बड़ा बदलाव आपको यह नजर आएगा कि भारत के प्रति लोगों का आकर्षण और झुकाव बढ़ा है। ऐसा हमारी आर्थिक ताकत के कारण ही हुआ है। लोग कौतूहलवश पूछते हैं कि यह उभरता हुआ भारत क्या है, जिसका अद्भुत आर्थिक विकास हुआ है। कुछ आंकड़े चौकाने वाले हैं।
2004 से लेकर आज तक जीडीपी की औसत विकास दर 8.5 फीसदी से ऊपर ही रही। इसमें 2 साल ऐसे हैं, जिनमें यह दर 9.5 से 9.6 फीसदी तक भी रही है। यह विकास का गवाह है। 1991 के दौर की बात करें तो कांग्रेस सरकार में उस वक्त के वित्त मंत्री मनमोहन सिंह उदारीकरण की नीति लेकर आए।
यह उदारीकरण बेहद महत्वपूर्ण था। इसके बाद गठबंधन सरकार का दौर आया। गठबंधन की अस्थिरता, आवाजों और असहमतियों के बावजूद भारत में वर्ष 91 के बाद जितनी वृद्धि दर कभी नहीं रही, औसत रूप से या किसी खास वर्ष में। भारत विश्व में ऐसे बहुत कम देशों में से एक है जिसने 27 साल से औसतन 6.5 प्रतिशत से पौने सात प्रतिशत की सालाना बढ़ोतरी दर हासिल की और यह 1991 के बाद भी हुआ।
1960-70 में आईआईटी से पास होने वाले छात्रों में से लगभग 60 से 70 प्रतिशत 2 वर्ष के अंदर विदेश चले जाते थे। पिछले साल के आंकड़ों के मुताबिक यह आंकड़ा घटकर 3 प्रतिशत पर आ गया है। इनमें वैसे लोग शामिल नहीं हैं, जो वतन वापस लौट रहे हैं। ए टी कियर्नी ने अपने ग्लोबल इंडेक्स में निवेश की जगह के रूप में लगातार तीसरे साल भारत को दूसरे पायदान पर रखा है। यानी भारत निवेश करने के लिए दुनिया में दूसरी बेहतरीन जगह है।
इन बातों के बाद यह तो समझना ही होगा कि कम से कम ग्लास आधी भरी हुई है। लेकिन जो लोग आधी खाली ग्लास को देखते हैं, उन्हें यह समझना होगा कि सचाई पूरी ग्लास में होती है। दरअसल ग्लास को भरने के लिए पूरी कवायद होनी चाहिए। संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी की गई मानव विकास की वृध्दि दर के दयनीय आंकड़े इसी आधी खाली ग्लास की कहानी बयां करते हैं।
इसके मुताबिक गरीबी की दर लगभग 24-25 प्रतिशत है, जो पहले बहुत ज्यादा थी। लेकिन ये आंकड़े कई चीजें छुपाते हैं। पंजाब में औसतन यह दर महज 6 प्रतिशत है। अगर देश भर में यह औसतन 25 फीसदी है, तो देश के कई हिस्सों में यह 40-45 प्रतिशत भी है। यानी देश के कई प्रदेशों में असमाता है। दूसरी असमता एक ही प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में भी है।
हमारी सही चुनौती इसी असमता को पाटने की है। इसी लक्ष्य को पूरा करने के लिए देश में पहली बार नई योजनाएं बनाई गईं। मिसाल के तौर पर राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को ही लें। उसे कार्यान्वित करने में कई खामी हो सकती है, लेकिन यह सोच बेहद बड़ी है। भारत के सभी जिले के सभी परिवारों के एक व्यक्ति को सौ दिनों का रोजगार मिलेगा, अगर वह काम करने क ो तैयार है। यह सोच अपने आप में क्रांतिकारी है।
2007-08 के बजट में शिक्षा क्षेत्र के लिए आवंटित की जाने वाली राशि में 33 फीसदी और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आवंटित होने वाली राशि में 25 प्रतिशत का इजाफा किया गया। दुनिया की सबसे बड़ी मिड-डे मिल योजना बनाई गई। सरकार देश के ग्रामीण इलाकों में स्कूल बनाने, ग्रामीण बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित कर रही है।
संगठित क्षेत्र में 10 प्रतिशत मजदूर हैं, जबकि असंगठित क्षेत्र में 90 प्रतिशत। असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए एक बीमा योजना बनाई गई है, जिसका प्रीमियम सरकार भरेगी। इस तरह की कई योजनाएं हैं। मैं सारी योजनाओं का जिक्र बिल्कुल भी नहीं कर रहा हूं।
लोगों की सोच बदले जाने के लिए भी कई कानून बनाए गए हैं। मसलन, सूचना अधिकार कानून और घरेलू हिंसा से सुरक्षा के अधिकार से जुड़ा कानून। बुजुर्गों का ध्यान रखने के लिए भी जो कानून बनाए गए हैं, वे सोच बदले जाने की दिशा में गौरतलब कदम कहे जा सकते हैं। यह सरकार या कोई भी सरकार यह दावा नहीं कर सकती कि उसने अपने अंतिम चरण तक सभी चुनौतियों का सामना कर लिया है।
महत्वपूर्ण हल या परिणाम नहीं है, बल्कि महत्वपूर्ण है कोशिश। मैं यह समझता हूं कि आप राष्ट्रपति के भाषण की प्रति देख लें, जिसमें लगभग 50 ऐसी योजनाओं का जिक्र है, जो पैसे के आवंटन और कार्यक्षेत्र या सोच के लिहाज से विकास की कोशिश की दास्तां कहती है।
जहां तक महंगाई का सवाल है इसकी मौजूदा दर की बात करना और इससे इस सरकार के पूरे चार साल का आकलन करना मेरे हिसाब से एक सागर का अध्ययन एक बिंदु के जरिए करने जैसा ही है। कांग्रेस और यूपीए से ज्यादा चिंतित और सतर्क कोई भी नहीं है। महंगाई पर नियंत्रण करने के लिए एक साथ कई कदम उठाए गए हैं।
आयात शुल्क में कमी गई है। इससे हमें राजस्व में करोड़ों का नुकसान भी हुआ है, पर हमने ऐसे कदम उठाए हैं। कमोडिटी के निर्यात पर पाबंदियां लगाई गई हैं। कुछ कमोडिटी के वायदा कारोबार पर भी रोक लगाई गई है। जमाखोरों के खिलाफ कड़े से कड़े कदम उठाने की चेतावनी दी गई है। महंगाई को नियंत्रण में लाना सिर्फ केंद्र सरकार का ही काम नहीं है। स्थानीय स्तर पर वितरण की समस्या बहुत गंभीर है।
सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का असर निश्चित रूप से कुछ हफ्तों में दिखने लगेगा। ऐसा कहना कि महंगाई बढ़ने की कोई एक वजह है या यह वैश्वीकरण की नीतियों का असर है, गलत होगा। वैश्वीकरण को नकार देना सही नहीं होगा। वैश्वीकरण के फायदे भी बहुत हैं। ऐसा नहीं है कि विश्व से अलग होकर हम अपनी दुनिया के विकास के सपने देखें। यह भी सच है कि वैश्वीकरण के दुष्प्रभावों को भारत ने हमेशा से नियंत्रित किया है और नकारा है।
असमानता को कम करने के लिए ही न्यूनतम साझा कार्यक्रम के तहत सारी योजनाएं बनाई गई हैं। योजनाओं के क्रियान्वयन में खामियां हो सकती हैं या भ्रष्टाचार हो सकता है, लेकिन इससे इन योजनाओं की महत्ता को कम नहीं किया जा सकता। हमारे सामने योजनाओं की शत प्रतिशत राशि को जमीनी जमीनी स्तर तक पहुंचाने की चुनौती है।