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मनमोहन सिंह की परमाणु उपलब्धि

Last Updated- December 07, 2022 | 8:07 PM IST

भारत ने परमाणु समझौते की दिशा में आखिरकार एक बड़ी सफलता हासिल कर ली है और अंततरराष्ट्रीय संबंधों को लेकर अगर इसे मनमोहन सिंह सरकार की बड़ी उपलब्धि कहें तो यह गलत नहीं होगा।


हालांकि सरकार के लिए यह राह इतनी आसान नहीं रही है और ऐसा भी नहीं है कि तीन साल पहले जो वादे किए गए थे सभी पूरे हुए हों। हालांकि भारत के लिए अब एक अच्छी खबर यह है कि अब उसे अपने परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए न तो अंतरराष्ट्रीय मंजूरी लेनी पड़ेगी और न ही परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर करने पड़ेंगे।

अगर बाकी सारे दावपेंचो को छोड़ भी दें तो भी यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। इस मसले पर मनमोहन सिंह की कूटनीतिक क्षमताएं और राजनीतिक भूमिका दांव पर लगी थी। यही वह मामला था जिसकी वजह से सरकार को अपने ही खेमे में विरोध का सामना करना पड़ा था और एक समय सरकार के सिर पर तलवार लटक गई थी कि वह संसद में अपना बहुमत साबित कर पाएगी या नहीं।

प्रधानमंत्री ने भी कथित तौर पर यह मन बना लिया था कि अगर उनकी पार्टी इस मसले पर उनके समर्थन में नहीं खड़ी होती तो वह अपने पद से इस्तीफा दे देंगे। पिछले हफ्ते परमाणु आपूर्तिकर्ता देशों के समूह के कुछ सदस्यों ने दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने से इनकार भी कर दिया था।

कुछ ऐसे भी लोग हैं जो यह सोच रहे हैं कि क्या भारत ने बातचीत के दौरान जो समझौते किए हैं उनसे देश की रणनीतिक स्वायत्तता को धक्का पहुंचा है? शायद इसका जवाब चीन और पाकिस्तान के पास होगा जो समझौते को लेकर खुश नहीं हैं। अगर चीन यह चाहता है कि ऐसी ही एक डील पाकिस्तान के लिए भी तैयार की जानी चाहिए तो इससे भारत को दुखी नहीं होना चाहिए।

भाजपा और वामपंथी पार्टियां जब अब भी इस मसले का विरोध कर रही हैं उन्हें खुद से कुछ सवाल पूछने चाहिए। लालकृष्ण आडवाणी ने दो साल पहले कहा था कि परमाणु करार का मकसद भारत के शस्त्रागारों को नुकसान पहुंचाना है। पर यह आलोचना सही नहीं है।

हालांकि भारत के सामने इस डील को जिस तरीके से पेश किया गया है और अमेरिका समेत दूसरे देशों में इसे लेकर जो चर्चाएं हैं उनमें अंतर को लेकर कुछ लोगों को ऐतराज है। पिछले हफ्ते जॉर्ज बुश के एक पत्र के लीक हो जाने से, अमेरिकी कांग्रेस को विदेश मंत्री कोंडोलीजा राइस के शपथ पत्र और खुद हाइड ऐक्ट से यह संदेश जाता है कि अमेरिका की चाहत अब भी यही है कि भारत परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर करे।

जबकि भारत इस समझौते को इस संधि पर हस्ताक्षर नहीं करने की छूट के तौर पर देखता है। अब देखना यह है कि इन दो अलग अलग विचारों पर आगे क्या एकरूपता बन सकती है। हालांकि भारत ने अपनी ओर से यह ऐतराज जताया है कि 123 समझौते और एनएसजी से मिली छूट में परमाणु परीक्षण करने को लेकर कोई जिक्र नहीं किया गया है।

अब भी इस बात को लेकर स्थिति अस्पष्ट है कि अगर भारत परमाणु परीक्षण करता है तो इसका परिणाम क्या होगा। अभी इस स्तर पर यही कहा जा सकता है कि भारतीय कूटनीतिज्ञों और परमाणु वैज्ञानिकों बातचीत के दौरान अच्छा समझौता किया है। अब यह उन्हीं के हाथों में है कि वे मिली छूट का बेहतर इस्तेमाल कर परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को सफल बना सकें।

First Published - September 8, 2008 | 11:06 PM IST

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