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नए लिबास में ढल रही है मारुति

Last Updated- December 07, 2022 | 1:45 AM IST

पच्चीस साल पहले आई. वी. राव ने कार डिजाइन करने का सपना देखा था और वह नई-नवेली मारुति उद्योग लिमिटेड में शामिल हो गए।


मारुति तब 800 सीसी की छोटी कारें बनाया करती थी, जिसका डिजाइन जापान में तैयार किया गया था। इसे उस समय के महारथियों ‘एंबेसेडर ‘ और ‘पद्मिनी’ से मुकाबला करना था। ‘एंबेसेडर’ और ‘पद्मिनी’ का डिजाइन भी विदेशों में तैयार किया गया था।

हिंदुस्तान मोटर्स ‘एंबेसेडर’ कार बनाती थी, तो प्रीमियर ऑटोमोबाइल्स ‘पद्मिनी’ कार बनाती थी। मारुति 800 के डिजाइन में जहां ताजगी थी, तो वहीं इन कारों के डिजाइन में दशकों से कोई बदलाव नहीं किया गया था। 

आज काफी संतुष्ट नजर आने वाले राव अपने आप को उन लोगों में से पाते हैं, जिन्होंने सबसे पहले भारत में इस तरह का सपना देखा था।  शुरुआत में उनका पूरा दिन पुर्जे बनाने, गाड़ियों की क्षमता और उनके टिकाऊपन की प्रक्रिया को जांचने में निकल जाता था। इसके अलावा कई बैठकों में भी उनकी हाजिरी जरूरी रहा करती थी। इसके अलावा, गाड़ियों की टेस्टिंग में भी काफी वक्त लग जाया करता था। अब उतनी आपा-धापी नहीं है।

आज की तारीख में उनका अधिकतर समय नए मॉडल पर काम करने में बीतता है। इसके लिए वह सुजुकी की जापानी टीम के संपर्क में भी रहते हैं। राव कहते हैं कि, ‘वैसे मैं उसी पुरानी कंपनी में काम कर रहा हूं, लेकिन यह नई तरह का काम है।’ उनकी टीम में सी. वी. रमण नाम के शख्स की भी बेहद भूमिका काफी अहम है। वैसे, आपको बता दें कि नोबेल पुरस्कार विजेता सी वी रमण से  उनका कोई नाता नहीं है।

रमण के लिए कंपनी की सफलता उम्मीद से ज्यादा अचंभित करने वाली बात है। कुछ साल पहले तक वह वेंडर डेवलपमेंट विभाग में काम किया करते थे। दरअसल डिजायर को मूर्त रूप देने में इस जोड़ी की बेहद खास भूमिका है। स्विफ्ट की बात करें तो इसने ‘एस्टीम’ की जगह को भरा है। इसका डीजल वर्जन भी है। इसमें एस्टीम की तरह का ही 1,248 सीसी का इंजन भी लगा है।

स्विफ्ट डीजल सेडान श्रेणी में मारुति के लिए रास्ते खोलती है। सेडान श्रेणी में पिछले 10 महीनों में मारुति ने डिजायर के रूप में दूसरी कार लाँच की है। मारुति की पहचान छोटी कार बनाने वाली कंपनी के तौर पर रही है लेकिन इसकी यह पहचान किसी भी मामले में बड़ी कार बनाने वाली कंपनियों से कम नहीं रही। वैसे पिछले कुछ समय से मारुति की कारों के आकार की तुलना में मारुति में आया परिवर्तन बड़ी बात है।

निर्णायक मोड़

मई 2005 में जब मारुति ने स्विफ्ट को लाँच किया, तब से पिछले तीन साल में कंपनी सात नए मॉडल बाजार में पेश कर चुकी है। इसकी कुछ प्रतिद्वंद्वी कंपनियां तो अपने पूरे जीवनकाल में भी इतने मॉडल्स पेश नहीं कर पाई हैं। वैसे परिवर्तन केवल आंकड़ों में ही नहीं दिखता है। स्विफ्ट अपनी कीमत पर हर तरीके से खरी उतरने वाली कार है। कार का डिजाइन तो बेहद खूबसूरत है ही, परफॉमेंस के मामले में भी यह कार किसी से 19 साबित नहीं पड़ती।

राव का खुद मानना है कि स्विफ्ट बेहद आकर्षक कार है। उनका यह भी कहना है कि डिजाइन को लेकर कंपनी की धारण बदली है। शुरुआत में तो हम लोग परंपरागत डिजाइन की कार बनाया करते थे लेकिन अब कंपनी अंतरराष्ट्रीय डिजाइनों की कार बना रही है। दूसरी ओर रमण का कहना है कि चाहे छोटी कार हो या बड़ी कार, डिजाइन को लेकर ‘सुजुकी’ की सोच बदली है।

अब हम दुनिया की बेहतरीन डिजाइन वाली कार बना रहे हैं। उन्होंने बताया कि कंपनी  ने काफी समय तक स्विफ्ट का सफेद रंग वाला मॉडल बाजार में नहीं उतारा। उनका मानना है कि सफेद रंग काफी परंपरागत होता है। वैसे, हाल में मारुति ने जितनी कारें बाजार में उतारी हैं उनमें केवल नई वैगन आर ही मारुति की परंपरागत कार की कसौटी पर खरी उतरती है।

जेन एस्टेलो का आकार छोटा तो जरूर है, लेकिन इसका डिजाइन कुछ-कुछ ऑल्टो, वैगन आर और एस्टीम से मिलता-जुलता है। स्विफ्ट से पहले मारुति डिजाइन के मोर्चे पर शायद ही कभी इतनी चाक चौबंद रही। अब जितने नए मॉडल्स पर काम चल रहा है, उनमें परफॉमेंस के साथ-साथ उनके डिजाइन पर भी कंपनी का पूरा ध्यान है।

मारुति के प्रबंध निदेशक एस नाकानिशी का मानना है कि मारुति के लिए स्विफ्ट किसी मील के पत्थर से कम नहीं है। गौरतलब है कि इस कंपनी में जापानी हिस्सेदार सुजुकी की 54.2 फीसदी हिस्सेदारी है।

नए बादशाह

2005 तक सुजुकी यूरोप के  बाजार में एस्टीम कार के प्रारूप में कुछ बदलाव कर उसे स्विफ्ट के नाम से बेचती थी। इस कार के कुछ खास ग्राहक थे। कहा जाता है कि जब बाजार में नई स्विफ्ट कार बाजार में उतरी तो ग्राहकों को इस मॉडल को देखकर मजा नहीं आया। 2000 के बाद इसके निर्माण की क्षमता सालाना 16 लाख थी, जबकि उस दौरान उसकी मांग 12 लाख ही थी।

लिहाजा बाजार का रुख खरीदार तय कर रहे थे न कि विक्रेता। आजादी के बाद की पीढ़ी अभाव में थी और खर्च करने की उनकी क्षमता नहीं थी। बाद की पीढ़ी के पास कुछ पैसा आया तो जरूर, लेकिन वह रकम मोटी नहीं थी। लेकिन  आज की पीढ़ी अपने सपनों को खरीदने के लिए इंतजार नहीं करना चाहती। इस दौर में वे इस बात का इंतजार नहीं करते कि जब पैसा आएगा तब खर्च करेंगे।

यह वह पीढ़ी है जो ट्रेनों की जगह प्लेन में सफर करती है और मल्टीप्लेक्सों में 500 रुपये खर्च करने में उन्हें कोई गुरेज नहीं है। सेल्स व मार्केटिंग के संयुक्त प्रमुख मयंक पारिक कहते हैं कि कल की सुविधायुक्त वस्तुएं आज की स्वास्थ्य विज्ञान बन  चुकी हैं। कारों की बिक्री यातायात की सुविधा के साथ किसी व्यक्ति का विस्तार से जुड़ गयी है। नए ग्राहकों को नए तरीके से जोड़ने की कवायद की गयी है।

परंपरागत रूप से भारतीय ग्राहक किसी चीज के मूल्यों पर काफी ध्यान देते हैं। इसलिए मारुति ने अपनी नीति में मूल्यों को केंद्रबिंदु में रखा है। लेकिन इसके साथ जैसा कि पारीक कहते हैं लोगों में किसी चीज को पाने की चाहत पैदा करना भी इस नीति में जोड़ा गया है। प्रीमियर कार खरीदने वालों के मुकाबले पैसे को आंकने वाले ग्राहकों की उम्मीद अलग होती है।

प्रीमियर कार खरीदने वाले निश्चित रूप से सर्वोत्तम उत्पाद चाहते हैं और वे इस उत्पाद से बेहतर सेवा की उम्मीद करते हैं। बाद में मारुति ने अपनी बिक्री के लिए साइबर स्पेस का इस्तेमाल शुरू किया। इसमें ब्लाग व यूटयूब को शामिल किया गया। इंटरनेट के जरिए उन्होंने अपने उत्पाद को बाजार में उतारने से पहले उस पर बहस कराने की शुरुआत की जिससे उन्हें उत्पाद के बारे में लोगों की राय मिलने लगी।

टेलीविजन चैनल के जरिए मार्केटिंग करने के अलावा मारुति ने नए तरीकों को अपनाया। वे ग्राहकों से विशेष जरियों से सीधे रूप से संपर्क करने लगे। कंपनी का ग्राहकों से रिश्ता जोड़ने का कार्यक्रम मारुति कार के मालिकों की दस लाख की संख्या को भी पार कर गया। इससे उन्हें इस बात को जानने में मदद मिली कि जिन लोगों के पास कार है वे भी उनके ग्राहक हो सकते है।

सिर्फ 34 फीसदी कार खरीदार ऐसे है जो पहली बार कार की खरीदारी कर रहे हैं। बाकी कार खरीदार या तो अपनी कारों की संख्या को बढ़ा रहे हैं या पुरानी कार की जगह नई कार खरीद रहे है। कार की बिक्री बढ़ाने के लिए डीलरों के लिए प्रशिक्षण का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। डीजायर को बाजार में उतारने के लिए बिक्री से जुड़े 14,000 लोगों को तीन महीने के दौरान प्रशिक्षण दिया गया है।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान बिक्री से जुड़े लोगों को पांच सितारा होटल में खाना खिलाने ले जाया जाता है ताकि उन्हें इस बात का अहसास हो कि वे काफी उम्दा कार को बेचने जा रहे है। पारीक कहते हैं कि जो व्यक्ति डीजायर को खरीदेगा वह निश्चित रूप से उत्तम जीवनशैली से जुड़ा होगा। हो सकता है कि वह खुद मर्सिडीज पर चलता हो और अपनी पत्नी या बेटे के लिए डीजायर खरीद रहा हो।

ऐसे में उस प्रकार के लोगों की जीवनशैली को जानना जरूरी होगा। तभी वैसे लोगों को कार खरीदने के लिए एजेंट प्रेरित कर सकता है। पुराने जमाने में विक्रेता राजा होता था फिर ग्राहक राजा हो गया। अब ग्राहक बाजार को तय करता है।

सफलता के नट बोल्ट

पारिक ने इंजीनियरिंग और रिसर्च एंड डेवलपमेंट डिपार्टमेंट से केवल एक बात कही कि मारुति कार को अभी अव्वल होना है। कार को किसी खास शख्सियत से जोड़ने की बात है तो जेहन में जॉन अब्राहम का नाम खुद ब खुद आ जाता है। राव, रमण और उनकी टीम अब नए जमाने की जरूरतों से वाकिफ होने लगी है। इसे एक बदलाव की बानगी भर ही कहेंगे।

वर्ष 1995 में मारुति अपनी रिसर्च और डेवलपमेंट क्षमता को और बढ़ाने लगी हालांकि यह रफ्तार धीमी थी। मारुति 800 को वर्ष 1997 सितंबर को फिर से एक नई शक्ल दी गई। हालांकि इसमें कोई खास बदलाव नजर नहीं आया क्योंकि ये अब तक लगभग पहले जैसा ही नजर आता है। सुजूकी ने अपनी कार को जापान में नई शक्ल देने की कवायद शुरू की उसके बाद इसे भारत लाया गया।

सदी के अंतिम दौर में कार की नई मॉडलों की बाढ़ सी आ गई। मसलन बलेनो, ऑल्टो के  दो नए मॉडल और वैगन आर। इन सभी मॉडलों को जापान में पहले से ही बनाया जाता था मिसाल के तौर पर ऑल्टो वर्ष 2000 में भारत में आया लेकिन 1998 में ही वहां इसका उत्पादन शुरू हो गया था। भारत में लाने के लिए कार के सस्पेंशन में सुधार की जरूरत थी।

भारत में स्थानीय स्तर पर पहली बार 2003 में जेन मॉडल को बतौर जेन माइनर इसके डिजाइन में थोड़ा बदलाव लाने की कोशिश रिसर्च और डेवलपमेंट विभाग के लोगों ने शुरू की। जेन के  नए मॉडल को लोगों ने उतना पसंद नहीं किया और यह उतना मशहूर नहीं हुआ हालांकि स्विफ्ट के विकास में इसकी बड़ी भूमिका रही। भारत से 25 इंजीनियरों को इस कार पर काम करने के लिए जापान भेजा गया।

पहली बार ऐसा हुआ जब एक ही समय में जापान,यूरोप और चीन के साथ भारत में भी कार डिजाइनिंग पर काम शुरू हो गया। जब जापान में कार डिजाइनिंग और उसके नमूने का काम पूरा हुआ, उसके बाद के मॉडलों का विकास भारत में हुआ। पहले के मॉडलों के बनने के बाद जापान में उसकी क्वालिटी की परख होती थी। हाल के वर्षो में कार की बिक्री में काफी तेजी आई है। इसी वजह से हमारा ध्यान मारुति की ओर बरबस ही चला जाता है।

बाजार में मारुति का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा है। इस उद्योग के कुछ एक्सपर्ट का कहना है कि पिछले 25 सालों में सुजूकी जैसी कारों में भी इस तरह की बढ़ोतरी की अपेक्षा नहीं थी। पिछले वित्तीय वर्ष में मारुति की 711,000 से ज्यादा कारों की बिक्री हुई है जबकि जापान में 673,000 सुजूकी कार ही बिकी। भारत में मारुति कारों की बिक्री में लगभग 12 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है जबकि जापान में सुजूकी की बिक्री में 2.5 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

कारों के विकास की गाथा ऐसी ही चलती रहेगी। भारत में आज भी 1000 लोगों में से महज 7 लोग ही कार पर पैसे खर्च करते हैं जबकि चीन में 10 लोग। अगर अमेरिका की बात करें तो 1000 में से 450 लोग कार पर पैसे खर्च करते हैं जबकि इसके मुकाबले पश्चिमी यूरोप में 500 लोग कार पर निवेश करते है। अगर मारुति को बाजार में अपने बाजार शेयर को बचाए रखना है तो उसे अपने नए मॉडलों को बाजार में उतारना होगा और पहले से मौजूद कार को थोड़ा अपग्रेड करना होगा।

भारतीय उपभोक्ताओं के संदर्भ में यह बात तो बिल्कुल साफ है कि इनकी अपनी एक अलग पहचान है जो जापान के मुकाबले यूरोप से अपने को ज्यादा करीब पाती है। मारुति के रिसर्च और डेवलपमेंट में 2006-07 में इंजीनियरों की संख्या 269 थी वहीं फिलहाल इनकी संख्या 488 है। वर्ष 2010 तक यह संख्या बढ़कर 1000 होने वाली है। इन इंजीनियरों में कुछ वैसे भी है जो जापान से वापस लौट रहे हैं।

मारुति के लगभग 75 इंजीनियरों ने वहां दो साल गुजारा है। वहां हर समय सुजुकी की सुविधा पाने वाले कम से कम 40 इंजीनियर मौजूद होते हैं। रमन का कहना है, उनकी टीम में हमारे इंजीनियर भी शामिल हैं। वे काम करते हुए सीखते हैं फिर यहां वापस आते हैं और मारुति प्रोजेक्ट पर काम करते हैं। इस तरह की चीजें ए स्टार कॉन्सेप्ट के  साथ आती हैं।

सुजुकी की नई ग्लोबल कार इसी साल लॉन्च होने वाली है जिसकी डिजाइन भारत में की गई है। इस कार की डिजाइन जापान में बनने वाली थी और इसे जल्द ही पूरा भी करना था। इसके लिए मारुति ने जापान में डिजाइनरों और इंजीनियरों को भेजा। कंपनी के प्रबंध निदेशक नाकानिशी का लक्ष्य 2010 तक मारुति की बिक्री को 10 लाख तक पहुंचाना है। उस समय तक सुजुकी का लक्ष्य दुनिया भर में अपनी बिक्री को 30 लाख तक करना है। इस आंकड़ों के साथ राव, रमण, पारिक और उनकी कंपनी की यह उम्मीद है कि बदलाव की बेहतर उम्मीद है।

First Published - May 26, 2008 | 11:46 PM IST

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