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मीडिया में विलय एवं अधिग्रहण से सुधरेंगे इस उद्योग के हालात

Last Updated- December 11, 2022 | 6:46 PM IST

फिक्की-ईवाई की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार 2021 में मीडिया जगत में विलय एवं अधिग्रहण के 118 सौदे हुए जिनका कुल मूल्यांकन 67,200 करोड़ रुपये था। यह सन 2020 के 6,800 करोड़ रुपये मूल्य के 77 सौदों तथा 2019 के 10,100 करोड़ रुपये मूल्य के 64 सौदों की तुलना में बहुत अधिक है। मूल्य और मूल्यांकन के मुताबिक इनमें से करीब आधे सौदे प्रसारण में तथा करीब एक तिहाई गेमिंग जगत में थे।
सबसे बड़ा सौदा संभवत: दिसंबर 2021 में सोनी और ज़ी के विलय का 14,000 करोड़ रुपये का सौदा था। इस सौदे के बाद यह डिज्नी-स्टार के बाद देश की दूसरी सबसे बड़ी मीडिया कंपनी बन गई है। इस वर्ष दो बड़े सौदे हुए। मार्च 2022 के अंत में  देश की सबसे बड़ी मल्टीप्लेक्स चेन पीवीआर का प्रतिद्वंद्वी आइनॉक्स लेजर के साथ विलय हो गया और वह 1,500 स्क्रीन वाली फिल्म प्रदर्शन कंपनी बन गई। अप्रैल में जेम्स मर्डोक की लूपा सिस्टम्स की शाखा बोधि ट्री सिस्टम्स  ने 13,500 करोड़ रुपये खर्च करके वायकॉम 18 में 40 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी।
इसके लिए इतिहास, महामारी और उसका प्रभाव आदि प्रमुख कारण रहे। वर्ष 2007 में जब नेटफ्लिक्स ने वीडियो स्ट्रीमिंग शुरू की तब यह स्पष्ट नहीं था कि क्या होने जा रहा है। यहां तक कि जब कंपनी ने 2013 में हाउस ऑफ काड्र्स के साथ ओरिजनल कंटेंट प्रसारित करना शुरू किया तब भी हालात अस्पष्ट थे। लेकिन जल्दी ही इंटरनेट, स्ट्रीमिंग, उपकरणों और तकनीक के मिश्रण ने दुनिया भर में मनोरंजन उद्योग को नया आकार देना शुरू कर दिया। तब नए कारोबारी उभरने लगे। ऐपल (1.8 अरब उपयोगकर्ता और 366 अरब डॉलर का राजस्व), अल्फाबेट (गूगल और यूट्यूब की मालिक जिसके 4.3 अरब उपयोगकर्ता और 258 अरब डॉलर का राजस्व है), फेसबुक (2 अरब उपयोगकर्ता और 118 अरब डॉलर का राजस्व) तथा एमेजॉन (470 अरब डॉलर का राजस्व) आदि इसके उदाहरण हैं। इन कंपनियों ने  विषयवस्तु में निवेश करना शुरू कर दिया। ये कंपनियां या तो खोज या कारोबार या कुछ और संचालित करना चाहती थीं लेकिन इस काम के लिए उन्हें अनिवार्य तौर पर बड़ी संख्या में लोगों की जरूरत थी। ऐसे में उनमें से ज्यादातर ने मीडिया फर्म का रूप लिया। एमेजॉन के पास प्राइम वीडियो है ताकि वह ज्यादा किराना और जूते बेच सके। यूट्यूब गूगल के खोज कारोबार को आधार प्रदान करता है। विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों, तकनीक, भाषाओं, अभिरुचियों, स्वरूपों और उपकरणों के माध्यम से दर्शक तलाशने की उनकी कवायद ने वैश्विक मनोरंजन मानचित्र को नए सिरे से आकार देना शुरू किया। यह बात स्पष्ट हो गई कि इस बाजार में मोलतोल की शक्ति उन्हीं कंपनियों के पास रहेगी जिनके पास ज्यादा पैसा और बड़ा मंच होगा। यही कारण है कि 2018 में रुपर्ट मर्डोक ने स्टार इंडिया समेत ट्वेंटी फस्र्ट सेंचुरी फॉक्स की मनोरंजन परिसंपत्तियों को द वाल्ट डिज्नी कंपनी को बेचने का निर्णय लिया। उस समय डिज्नी का आकार फॉक्स के आकार का दोगुना था।
वैश्विक मानचित्र की तरह भारतीय परिदृश्य भी नए सिरे से बदला। ज़ी का स्वामित्व बदला और वायकॉम 18 का भी। मीडिया और मनोरंजन जगत में दबदबे की लड़ाई अब चुनिंदा कंपनियों के बीच लड़ी जा रही है। इसमें डिज्नी-स्टार, सोनी-ज़ी, जियो, भारती एयरटेल, गूगल, नेटफ्लिक्स, एमेजॉन प्राइम वीडियो तथा कुछ अन्य कंपनियां शामिल हैं। सन टीवी और टाइम्स समूह जैसी अन्य कंपनियां अगर बाजार में बनी रहना चाहती हैं तो उन्हें भी बिक्री या विलय को अपनाना ही होगा।
इसका बहुत बड़ा हिस्सा चरणबद्ध तरीके से होगा। हालांकि महामारी ने इस क्षेत्र में घटनाओं की गति को तेज किया है। उसने भारतीय मीडिया और मनोरंजन कारोबार के मुनाफे और राजस्व दोनों को प्रभावित किया है। उदाहरण के लिए मार्च 2021 में समाप्त वर्ष में पीवीआर और आइनॉक्स के राजस्व में 90 प्रतिशत की गिरावट आई। इसके परिणामस्वरूप उनका संयुक्त राजस्व घटकर 1,000 करोड़ रुपये से कम हो गया। इसका अर्थ यह था कि उन्हें भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग की मंजूरी की आवश्यकता नहीं थी। एडलवाइस फाइनैंशियल सर्विसेज के कार्यकारी निदेशक अवनीश रॉय के अनुसार, ‘यदि कोविड नहीं आता तो यह सौदा भी नहीं होता।’
तीसरी और स्पष्ट वजह है वृहद आर्थिक कारकों मसलन बढ़ती ईंधन कीमतों और कारोबार की बदलती प्रकृति की वजह से बढ़ती मुद्रास्फीति। बड़ी कंपनियों द्वारा दर्शकों की तलाश का अर्थ यह है कि और अधिक फिल्मों, शो और देखने वाले खेलों की जरूरत है। उन्हें ओटीटी, टीवी और थियेटर हर जगह प्रदर्शित किया जाता है- पुष्पा, आरआरआर, गंगूबाई काठियावाड़ी जैसी फिल्में सामान्य फिल्मों से 20-30 गुना अधिक महंगी पड़ती हैं। एक ओटीटी शो की औसत लागत 40 लाख रुपये प्रति एपिसोड है जबकि सामान्य टीवी पर आधे घंटे का शो 10 से 15 लाख रुपये में पड़ता है। बाजार में ऐसे शो की मांग भी बढ़ती जा रही है। कंटेंट के लिए बढ़ते दबाव का अर्थ है अच्छे लेखकों और कलाकारों की कमी। ऐसी प्रतिभाओं की लागत भी बीते तीन से चार वर्ष में 40 से 50 प्रतिशत बढ़ गई है। सुदृढ़ीकरण से लागत कम करने और कारोबार का आकार बढ़ाने में मदद मिलती है।
ऐसे कदम ज्यादातर बेहतरी की ओर ही हैं। उपभोक्ताओं की भारी तादाद के बावजूद भारतीय मीडिया कारोबार अभी अच्छी तरह मुद्रीकृत नहीं हो सकता है। टेलीविजन की बात करें तो 89.2 करोड़ दर्शकों और करीब 21 करोड़ घरों में टीवी के साथ भारत चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा टेलीविजन बाजार है। इसके बावजूद मार्जिन ब्राजील जैसे देशों की तुलना में भी लगभग आधा है जबकि वहां टेलीविजन भी भारत की तुलना में आधे ही हैं। इसका कारण कीमतों का नियमन, विभाजित बाजार और नतीजतन प्रति इकाई कम राजस्व। ऐसे में आशा की जानी चाहिए कि हालिया सुदृढ़ीकरण के बाद कारोबार का मुनाफा बढ़ेगा और इसमें बेहतरी आएगी।

First Published - May 24, 2022 | 12:44 AM IST

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