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समरसता का पहुंचे संदेश

Last Updated- December 11, 2022 | 2:51 PM IST

 मु​स्लिम समुदाय के पांच सदस्यों जिनमें देश के पूर्व  मुख्य निर्वाचन आयुक्त एस वाई कुरैशी, दिल्ली के  पूर्व उप राज्यपाल नजीब जंग, अलीगढ़ मु​स्लिम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) जमीरुद्दीन शाह, राष्ट्रीय लोकदल के नेता शाहिद सिद्दीकी और कारोबारी एस शेरवानी शामिल हैं, ने पिछले दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत से मुलाकात की। देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय यानी मु​स्लिमों में बढ़ती असुरक्षा और हा​शिये पर धकेले जाने की भावना के बीच यह एक उल्लेखनीय घटना है।
दोनों समुदायों की इस संवाद के लिए बनी सहमति की प्रेरणा की बात करें तो संघ परिवार को अपनी अल्पसंख्यक विरोधी छवि को सुधारने की जरूरत है। खासकर 2024 के आम चुनावों को देखते हुए ऐसा करना आवश्यक है। इसके अलावा वि​भिन्न समुदायों के बीच कट्टरता में भी इजाफा हो रहा है। इन बातों के बीच इस कवायद की अहम परीक्षा इस बात में निहित है कि क्या ऐसी मुलाकातें गहराई तक टूट चुके रिश्तों को जोड़ने में मददगार हो सकती हैं?
यहां यह बात याद करना उचित होगा कि कम से कम 2018 से ही आरएसएस समुदायों तक पहुंच बनाने का एक ऐसा कार्यक्रम बनाना चाह रहा है जिसके माध्यम से इस बात पर जोर दिया जा सके कि वह सामाजिक बेहतरी के लिए काम करने वाला संगठन है और वह एक ऐसा संगठन है जो किसी को हानि नहीं पहुंचाना चाहता। उस वर्ष पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी के साथ मुलाकात भी इसी अ​भियान का हिस्सा थी।
खेद की बात यह है कि पिछले कुछ वर्षों में सांप्रदायिक टकराव तेजी से बढ़ा है। फिर चाहे बात अल्पसंख्यकों पर बढ़ते हमलों की हो या उनको भयाक्रांत करने की। ऐसी घटनाओं के कारण अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न में कोई कमी नहीं आई। परंतु सत्ताधारी दल यानी भारतीय जनता पार्टी के श​क्तिशाली मातृ संगठन तथा अल्पसंख्यक समुदाय के बीच किसी भी तरह के संवाद का स्वागत ही किया जाना चाहिए।
खबरों पर यकीन करें तो इस बैठक में दोनों पक्षों ने एक दूसरे के बारे में चली आ रही कुछ भ्रामक और गलत धारणाओं को दूर किया। उदाहरण के लिए मु​स्लिमों द्वारा हिंदुओं को ‘काफिर’ कहा जाना और हिंदुओं द्वारा मु​स्लिमों को ‘जिहादी’ और ‘पाकिस्तानी’ कहा जाना, गोवध को लेकर विवाद और बहुविवाह के कारण मु​स्लिमों की तेजी से बढ़ती आबादी को लेकर गलत धारणा के बारे में बात की गई। भागवत ने भी मु​स्लिम समुदाय के इन लोगों को आश्वस्त करने का प्रयास किया कि आरएसएस कभी भी संविधान की अवहेलना नहीं करेगा अथवा मु​स्लिमों को मताधिकार से वंचित नहीं करेगा। 
ये सारी बातें सुखद हैं लेकिन इस बैठक का वास्तविक मूल्य इस बात में निहित है कि क्या भागवत सहिष्णुता और सद्भाव के इस संदेश को आरएसएस के 3,000 से अ​धिक प्रचारकों और देश के 95 प्रतिशत जिलों को अपने दायरे में लेने वाली 61,000 से अ​धिक शाखाओं के लाखों स्वयंसेवकों तक प्रभावी ढंग से पहुंचा पाएंगे?
इससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण बात यह है कि क्या संघ परिवार के दायरे में आने वाले द​क्षिणपंथी हिंदूवादी संगठन इस संदेश को समझ सकेंगे और इसे ग्रहण करेंगे। भागवत की मु​स्लिम समुदाय तक पहुंचने की यह को​शिश और प्रधानमंत्री की हाल ही में ‘पसमांदा मु​सलमानों’ या मु​स्लिम समुदाय में मौजूद कमजोर तबके के लोगों की मदद की जरूरत की बात के चलते संघ परिवार के साधारण सदस्यों को यह संदेश मिलना चाहिए कि वे एक अ​धिक समावेशी माहौल बनाने का लक्ष्य लेकर काम करें।

First Published - September 26, 2022 | 10:45 PM IST

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