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वक्त की नजाकत को देखते हुए हो आधुनिकीकरण

Last Updated- December 07, 2022 | 5:45 AM IST

थल सेना और रक्षा एवं अनुसंधान संगठन(डीआरडीओ) के बीच अर्जुन टैंक को लेकर जारी मतभेद से इस विषय में लंबी बहस छिड़ गई है कि भारत को अपने मिकेनाइज्ड फोर्स यानी यंत्रीकृत बल के लिए क्या करना चाहिए।


सेना का यह महत्त्वपूर्ण अंग किसी भी शत्रु देश पर हमला करता है, इसके टैंक, बख्तरबंद वाहन और एयरमोबाइल फोर्स शत्रु राष्ट्र के बीचों बीच धावा बोलकर उसकी योजना को नाकाम कर देते हैं और लड़ने का उसका मनोबल तोड़ देते हैं।

अगर पाकिस्तान के साथ कोई युध्द होता है तो इस मिकेनाइज्ड फोर्स के तहत भारत की तीन स्ट्राइक कोर सीमा तक ही सीमित नहीं रहेगी बल्कि उनका निशाना सिंधु के  तट से लगने वाले कस्बे और शहर होंगे।

इसी संदर्भ में स्ट्राइक कोर के आक्रामक कमांडर रह चुके अवकाश प्राप्त लेफ्टीनेंट जनरल बीएम कपूर खुशी के साथ कहते हैं-  ‘मेरी कोर का भारत की जमीन पर कोई काम नहीं है।’  इस हमले में मुख्य भूमिका कुछ अहम आयुध टैंकों की है। सेना की भाषा में इन्हें एमबीटी कहा जाता है। भारत के लिए रूसी टी-72 और टी-90 टैंक एमबीटी हैं। युध्द के मैदान में यह टैंक बहुत ही आक्रामक होता है। इसे अनेक विशेषताओं से लैस होना चाहिए।

सड़क और संकरे रास्तों पर इसे अत्यंत गतिशील होना चाहिए, इसमें कंप्यूटर के इस्तेमाल से चलने वाली गन लगी होनी चाहिए ताकि युध्द के मैदान में इसका पूरा दबदबा कायम रह सके। इसे अपने में सवार सैन्यकर्मियों की रक्षा के लिए बख्तरबंद होना चाहिए। इसमें शत्रु देश की सीमा के काफी अंदर घुसकर कई दिनों की लड़ाई के लिए गोला बारूद और ईंधन रखने का इंतजाम होना चाहिए।

बीसवीं सदी के आखिर में भारत ने रूस में निर्मित टैंकों से काम चलाया। वे टैंक सस्ते, तूफानी और प्रभावी थे जिन्होंने साधारण धमकियों का ही सामना किया। उस दौरान पाकिस्तानी टैंकों के दस्ते पुराने पड़ चुके थे, उसकी वायुसेना को अमेरिका से अतिरिक्त  एफ-16 और चीन से जेएफ-17 नहीं मिले थे। खुद ड्रैगन से भी खतरा कम हो गया था।

लेकिन आज की सूरत में भारतीय टैंकों की क्षमता ऐसी होनी चाहिए कि पाकिस्तानी सीमा के अलावा अन्य जगहों से होने वाले खतरों से भी निबटा जा सके। जहां तक पाकिस्तानी सीमा का सवाल है तो वहां पर भारतीय थलसेना की 59 रेजीमेंट में से 58 तैनात हैं। वहीं 11,000 किलोमीटर की पूर्वोत्तर सीमा, जो चीन बांग्लादेश और म्यांमार से सटी है, वहां केवल एक रेजीमेंट तैनात है जिसके पास केवल 45 टैंक हैं।

रूस के टी-72 और टी-90 टैंक बहुत ही भारी हैं, जिसे पूर्वोत्तर क्षेत्र के पहाड़ी क्षेत्रों में संचालित करने में समस्या होती है। सेना, दशकों से हल्के टैंकों की तैनाती की मांग कर रही है। चीन सिक्किम के उत्तरी हिस्से में तथाकथित फिंगर एरिया को लेकर समय समय पर अपनी ताकत का अहसास जताता रहता है। वहां भारतीय टैंकों की एक टुकड़ी तैनात की जा सकती है।

लेकिन पूर्वोत्तर इलाके के लिए हल्के टैंकों के तीन रेजीमेंटों की ब्रिगेड बनाने का प्रस्ताव अभी भी सेना के सेमीनार कक्षों तक ही सीमित है। इसे अभी तक रक्षा मंत्रालय को भी नहीं भेजा जा सका है।  इसके बारे में पूछे जाने पर थल सेना के डॉयरेक्टर जनरल आफ मिकेनाइज्ड फोर्स (डीजीएमएफ) लेफ्टीनेंट जनरल जी भारद्वाज कहते हैं, ‘मिकेनाइज्ड फोर्स में टैंकों का मौजूदा दस्ता किसी भी आपरेशन के लिए पूरी तरह से सक्षम है।

यह रेगिस्तान, कैनाल और अन्य दुर्गम क्षेत्रों में संचालन के लिए पूरी तरह सक्षम है।  हम हल्के टैंकों के बारे में अध्ययन कर रहे हैं, खासकर पूर्वोत्तर इलाकों के लिए। निश्चित रूप से यह भविष्य की जरूरत है।’ हल्के टैंक भारत में जल और थल पर काम करने वाले बलों के लिए भी जरूरी हैं, जो अंडमान और लक्षद्वीप जैसे द्वीपों तथा बांबे हाई जैसे समुद्र अपतटीय क्षेत्रों की रक्षा करते हैं।

हैदराबाद में तैनात 54वीं इनफैंट्री डिवीजन की तैनाती जल और थल दोनों लक्ष्यों के लिए की गई है-भारतीय नौसेना ने टैंकों के लिए लैंडिग शिप तैयार किया है। उसने अमेरिका से यूएसएस ट्रेंटन जिसे अब आईएनएस जलश्व कहा जाता है, को खरीदा लेकिन हल्के टैंक नहीं खरीदे गए जिन्हें इन पोतों से लॉन्च किया जाएगा। एयरमोबाइल आपरेशन के लिए भी हल्के टैंक बहुत जरूरी हैं।

भारतीय सेना, दुनिया की कुछ सेनाओं में शामिल है जिसके पास स्ट्रैटिजिक एयरक्राफ्ट क्षमता है। इसका आईएल-76 एयरक्राफ्ट भारत से दूर के किसी भी ठिकाने पर पैराट्रूपर्स ब्रिगेड को पहुंचाने में सक्षम है।  नवंबर 1988 में जब तमिल मिशनरियों ने मालदीव में धावा बोला, तो शांति बरकरार रखने के लिए आईएल-76 से दो बटालियन भेजी गई। उन्होंने वही किया जो कहा गया था। अगर उन पर जोरदार जवाबी हमला होता तो उन्हें बैकअप देने के लिए हल्के टैंक नहीं थे।

आईएल-76 केवल एक रूसी एमबीटी ले जाने में सक्षम है लेकिन उसका पैरा-ड्रॉप नहीं कर सकता।  हल्के टैंक, जिसे वायुमार्ग से ले जाया जा सकता है और जिसकी पैरा-ड्रापिंग की जा सकती है, आज बहुत जरूरी हो गए हैं। हल्के टैंक शहरी इलाकों में हो रहे आतंकवादी हमलों को ध्यान में रखते हुए भी जरूरी हैं। इस समय भारतीय सेना, पुलिस और अर्धसैनिक बलों को अत्याधुनिक वाहनों की जरूरत है, जो हथियारों से लैस हों और जब जरूरत पड़े तो शहरों या कस्बों में जवाबी हमले कर सकें।

ऊपर से हमला करने वाले आतंकवादियों से भारतीयों की जिंदगी को बचाया जा सकता है, अगर घुमावदार गलियों और संकरे रास्तों पर चलने में सक्षम हल्के टैंक हों। इस तरह की क्षमता वाले हथियार भारत की ताकत में बढ़ोतरी करेंगे। भारतीय सेना में शामिल अर्जुन एमबीटी बहुत भारी है। 42 टन के  टी-72 और 46 टन के टी-90 की तुलना में 58 टन का अर्जुन बहुत भारी है।

इसका कंचन कवच (इसका नाम हैदराबाद के कंचनबाग के नाम पर पडा, जहां इसे तैयार किया गया) वजन बढ़ाता है, लेकिन वहीं पर शत्रु के एयरक्राफ्ट, आर्टिलरी, और हेलीकाप्टरों से होने वाले हमलों, टैंकों, मिसाइल कैरियर और कंधे पर रखकर फायर किए जाने वाले रॉकेट लॉन्चरों से सुरक्षा भी प्रदान करता है।

जहां अर्जुन टैंक का वजन  पंजाब के मैदानी भागों के लिए एक बोझ हो सकता है, वहीं इसे दक्षिणी राजस्थान के खुले रेगिस्तान में एक असेट के रूप में इस्तेमाल में लाया जा सकता है, जहां भारत की एक स्ट्राइक कोर ऑपरेट करती है। उसे अर्जुन टैंक मुहैया कराने से उसकी मारक क्षमता में निश्चित तौर पर बढ़ोतरी होगी। इस तरह के फैसले से टैंक डिजाइनरों को पता भी चल जाएगा कि उन्हें अर्जुन टैंक के भविष्य में होने वाले निर्माण में किस तरह का बदलाव करना चाहिए।

First Published - June 16, 2008 | 10:55 PM IST

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