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सत्ता की भाषा को समझने वाले राजनेता हैं मोदी

Last Updated- December 07, 2022 | 8:48 PM IST

पप्पू मेवेवाला वैसे तो पोरबंदर, गुजरात का निवासी है लेकिन रोजी रोटी की वजह से दिल्ली में बसा है। उसे दिल्ली अटपटी लगती है, लेकिन ”धंधा” (जो गुजरात में सबसे उपयुक्त शब्द है) उसकी रग रग में दौड़ता है।


लोदी गार्डन में मेवा बेचता है- काले मीठे अंजीर, बादाम, भुने हुए काजू, मोटी-मोटी मिसरी सरीखी किशमिश… बोली से पोरबंदर की महक आती है: ”अरे बेन, खाकर तो देखो, सास छे…” नरेंद्र मोदी का नाम सुना है? ”अरे बेन, किसने नहीं सुना वर्ल्ड में सबसे बड़ा लीडर है।” इस अतिशयोक्ति के बादशाह का कहना है।

लेकिन दंगा? ”बेन वह तो सियासी मामला है। और जिसने करवाया है, उसे जेल में नहीं डाल दिया? आप बताइये, दिल्ली में सरोजनी नगर में जो धमाके हुए थे, उसके लिए आज तक किसी को पकड़ा सरकार ने? नरेंद्र भाई जो कहते हैं, करके दिखाते हैं।” फिर वोट देगा मोदी को? ”दोनों हाथों से दे सकता तो देता” पप्पू का कहना था।

गुजराती गौरव एक विचित्र संज्ञा है। आंध्र प्रदेश में 1980 से 1983 तक कांग्रेस ने 6-6 महीने पर मुख्यमंत्री बदला। वहां एक जाति समीकरण के चलते रेड्डी और दलित समुदाय के लोग कांग्रेस को वोट दिया करते थे, लेकिन कम्मा जाति- जो कांग्रेस को पैसा दिया करती थी, लेकिन इस जाति से मुख्यमंत्री कभी नहीं बना- ने विद्रोह का झंडा फहराया।

नंदमूरि तारक रामाराव (एनटीआर) की तेलुगू देशम पार्टी मूल रूप से कम्मा पार्टी थी, लेकिन अपने आप को दिखाया एक ऐसे दल के रूप में जो आंध्र अस्मिता की रक्षा करने वाला इकलौता दल था। फिर क्या था, लोकसभा और विधानसभा में कांग्रेस बुरी तरह से परास्त हुई और तेलुगू देशम पार्टी का सिक्का जम गया। इसे जमाए रखा एनटीआर के दामाद चंद्रबाबू नायडू ने- लेकिन कम्मा जाति से उठकर आंध्र प्रदेश के विकास के मुद्दे को उठाकर।

गुजरात में राजनीतिक मुद्दे कुछ भिन्न हैं। राज्य सीमा से सटा हुआ है। इसलिए सांप्रदायिक तनाव के जल्दी छिड़ जाने की आशंका हमेशा रहती है। इसमें सभी शामिल हैं- कांग्रेस भी, भारतीय जनता पार्टी भी। लेकिन सांप्रदायिक भावनाओं को गुजरात के आत्मगौरव में कैसे परिवर्तित किया जाए, इसका गुर सिर्फ नरेंद्र मोदी ही समझ पाए हैं। अभी हाल ही में हुए सूरत, अहमदाबाद और अन्य शहरों के धमाकों को ही ले लीजिए।

छानबीन में राज्य की पुलिस ने पाया कि कई व्यक्तियों की सांठगांठ थी, इस पूरे षड़यंत्र को तैयार करने में। और उनमें कई सुदूर प्रदेशों के निवासी थे। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के। बजाय इसके कि वह उत्तर प्रदेश की सरकार से निवेदन करें कि मुख्यमंत्री इन लोगों पर मुकदमा करें और फिर इन्हें गुजरात लाया जाए, ताकि वहां की पुलिस छानबीन कर सके, मोदी ने एक दूसरा हथकंडा अपनाया।

14 चार्टर हवाई जहाज लिए गए, जो पुलिसकर्मियों के लिए 24 घंटे उपलब्ध कराए जाते। जब उनकी छानबीन ऐसे मोड़ पर पहुंच जाती थी- जब आजमगढ़ या मैनपुरी से अमुक को लाना जरूरी पड़ जाता था, तब हवाईजहाज में पूरी पुलिस टीम को भेजा जाता था। वहां के डीएम से बात हो जाती थी, हवाई अड्डे पर एक घंटा उसे रोककर रखा जाता था, अभियुक्त को पकड़कर गुजरात लाया जाता था और केस सीट बनाई जाती थी।

तेरह-चौदह लोगों को मुकदमा करने के लिए इसी तरह गुजरात लाया गया और धमाकों की गुत्थी सुलझती रही। दिक्कत तब हुई जब मायावती के सिपहसालार और कैबिनेट मंत्री सतीश मिश्र ने आपत्ति जाहिर की। उनका कहना था कि राज्य सरकार को नजरंदाज करके  किसी दूसरे राज्य की पुलिस किसी को भी ऐसे उसके घर से पकड़कर नहीं ले जा सकती थी। अत: कुछ माह पहले यह प्रक्रिया रुक गई।

लेकिन असर यह था कि गुजरात सरकार को कुछ ही सप्ताह में ऐसे सुराग मिल गए जो महीनों, सालों तक नहीं मिलते। जो लोग बार-बार यह कहते हैं कि अपराध रोकने में केंद्र की शक्ति क्षीण हो गई है, क्योंकि दायित्व राज्य सरकारों का है, उन्हें इस पूरे प्रकरण से सबक सीखना चाहिए। इच्छाशक्ति हो तो कुछ भी हो सकता है। मोदी अपराधियों का धर्म, जाति आदि देखने में ज्यादा समय व्यर्थ नहीं करते।

उनके कार्यकाल में 19,000 किसानों को बिजली कर न देने के जुर्म में उतनी ही सहजता से गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, जितनी आसानी से धमाकों की शाजिश में शामिल लोगों को। मोदी से ज्यादा अच्छी तरह से यह कोई नहीं समझता कि सत्ता का अर्थ क्या है। जब प्रधानमंत्री को बिहार में बाढ़ पीड़ितों का दौरा करने के लिए लिवाने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार दिल्ली आए तो उन्हें प्रधानमंत्री से पूरी अपेक्षा थी कि वह उन्हें साथ में जहाज में ले जाएंगे।

लेकिन डॉ. मनमोहन सिंह ने एक बार भी नीतीश कुमार से साथ बैठने के लिए नहीं कहा।  उधर जब प्रधानमंत्री को गुजरात जाना था तब नरेंद्र मोदी ने साफ कह दिया कि या तो वह प्रधानमंत्री की बगल में बैठकर दौरा करेंगे या फिर सिर्फ हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी करेंगे। ऐसा नहीं हो सकता कि मुख्यमंत्री गाड़ी नं. 10 में बैठे हों और प्रधानमंत्री गाड़ी नं. 1 में। यही हुआ। वह प्रधानमंत्री के साथ बैठे, उनके साथ दौरा किया और उन्हें ठीक से समझाया बुझाया।

दुख की बात यह है कि हमारे देश में राज्य सत्ता की भाषा बहुत कम लोग समझते हैं। दर्प में मत्त हो जाना एक चीज है। लेकिन सत्ता की नब्ज पकड़ना दूसरी बात है। आज कोई भी भारतीय ऐसा नहीं है जो धमाकों की राजनीति को लेकर केंद्रीय गृहमंत्री की निरीहता को कोसता न हो।

क्या भारत इतना दुर्बल हो गया है कि कोई भी आकर हमारे गाल पर चपत मारे और चलता बने और हम मन मसोसकर रह जाएं? नरेंद्र मोदी की राजनीति से मतभेद हो सकता है, लेकिन यह नहीं नकारा जा सकता है कि वे गिनती के नेताओं में से एक हैं, जो सत्ता की भाषा को समझते हैं।

First Published - September 12, 2008 | 11:54 PM IST

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