भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर के रूप में वाई. वी. रेड्डी का पांच साल का कार्यकाल दो महीने में पूरा होने को है।
राष्ट्र को बेहतरीन सेवा प्रदान करने वाले गवर्नरों की लंबी सूची में उनका नया नाम जुड़ने जा रहा है। इस सूची में सी. डी. देशमुख, आई. जी. पटेल और मनमोहन सिंह सरीखी हस्तियों के अलावा डा. रेड्डी से ठीक पहले पदासीन सक्षम अर्थशास्त्री सी. रंगराजन और विमल जालान शामिल हैं।
अब डॉ. रेड्डी के उत्तराधिकारी के बारे में अटकलबाजियां शुरू हो गई हैं, कई नाम उभरकर सामने भी आए हैं। एक विचार यह भी रखा गया है कि इस समय अर्थव्यवस्था में बहुत हलचल है, जिसके चलते डॉ. रेड्डी को अगले एक साल के लिए और काम जारी रखने को कहा जाना चाहिए। तब तक नई सरकार कार्यभार संभाल चुकी होगी और उसे अगले गवर्नर को चुनने की स्वतंत्रता होगी।
यह एक गलत विचार है। ऐसा नहीं कि डॉ. रेड्डी का कार्यकाल एक गवर्नर के रूप में कमजोर रहा है। इसका एक साफ कारण है कि यह कोई नहीं जानता कि लोकसभा चुनावों के बाद स्थिर सरकार बनेगी या नहीं। यह आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है कि गठबंधन के लिए महत्त्वपूर्ण दो प्रमुख पार्टियों- भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस को अगली लोकसभा में वर्तमान सीटों से कम ही सीटें मिलेंगी (इन दोनों में कुल सदस्यों की आधी संख्या ही बंटेगी)।
अगर दो प्रमुख पार्टियों की सीटों में गिरावट जारी रहती है (माना दोनों को 125-125 सीटों से ज्यादा नहीं मिलती है) और साथ में क्षेत्रीय और जाति पर आधारित पार्टियों का महत्त्व बढता है तो अगली सरकार के बारे में अनिश्चितता ज्यादा ही बढ़ेगी। क्षेत्रीय या जाति पर आधारित दल एक नेता के व्यक्तित्व और महत्वाकांक्षा पर सिमट जाते हैं। यह पहले ही स्पष्ट हो चुका है कि वर्तमान समय के गठबंधन भी मजबूत नहीं है और नए सिरे से गठजोड़ होगा जैसा कि समाजवादी पार्टी और कांग्रेस की नजदीकियों को देखते हुए लग रहा है।
इस बात को भी दृढ़ता से नहीं कहा जा सकता है कि आगामी सरकार में दो पार्टियों में से एक की ही महत्त्वपूर्ण भूमिका रहेगी, ऐसे में वामपंथी दलों के सहयोग से तीसरे मोर्चे की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इस तरह सरकार के गठन को लेकर संभावित अनिश्चितता के माहौल में नए गवर्नर की नियुक्ति का फैसला अगली सरकार पर छोड़कर मौद्रिक नीति के स्थायित्व और अनवरता को जोखिम में डालना बुध्दिमानी नहीं होगी। ऐसे में वर्तमान सरकार का दायित्व है कि वह सुनिश्चित करे कि मिंट रोड पर स्थिरता रहेगी, भले ही दिल्ली में अस्थिरता रहे।
इस तरह से अभी जिस गवर्नर की नियुक्ति की जाए, उसका कार्यकाल कम से कम दो साल या बेहतर हो कि 3 साल का होना ही चाहिए (अगर जरूरी समझा जाए तो वर्तमान गवर्नर वाई. वी. रेड्डी का कार्यकाल बढ़ाए जाने में भी कोई अड़चन नहीं होनी चाहिए), जिससे अगली सरकार को पैर जमाने का समय मिल जाए और वित्त बाजार में चल रही हलचलों में स्थिरता की राह बन सके।