facebookmetapixel
रेट कट का असर! बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में ताबड़तोड़ खरीदारीTest Post कैश हुआ आउट ऑफ फैशन! अक्टूबर में UPI से हुआ अब तक का सबसे बड़ा लेनदेनChhattisgarh Liquor Scam: पूर्व CM भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को ED ने किया गिरफ्तारFD में निवेश का प्लान? इन 12 बैंकों में मिल रहा 8.5% तक ब्याज; जानिए जुलाई 2025 के नए TDS नियमबाबा रामदेव की कंपनी ने बाजार में मचाई हलचल, 7 दिन में 17% चढ़ा शेयर; मिल रहे हैं 2 फ्री शेयरIndian Hotels share: Q1 में 19% बढ़ा मुनाफा, शेयर 2% चढ़ा; निवेश को लेकर ब्रोकरेज की क्या है राय?Reliance ने होम अप्लायंसेस कंपनी Kelvinator को खरीदा, सौदे की रकम का खुलासा नहींITR Filing 2025: ऑनलाइन ITR-2 फॉर्म जारी, प्री-फिल्ड डेटा के साथ उपलब्ध; जानें कौन कर सकता है फाइलWipro Share Price: Q1 रिजल्ट से बाजार खुश, लेकिन ब्रोकरेज सतर्क; क्या Wipro में निवेश सही रहेगा?Air India Plane Crash: कैप्टन ने ही बंद की फ्यूल सप्लाई? वॉयस रिकॉर्डिंग से हुआ खुलासा

विषमता में भी तारतम्यता ढूंढ़ते रहते हैं मुलायम

Last Updated- December 07, 2022 | 9:05 AM IST

मूर्धन्य पत्रकार और राजनीतिक स्तंभकार भानु प्रताप शुक्ल की बरसी थी। हालांकि शुक्ल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य थे, लेकिन वे संघ पर निशाना साधने से कभी नहीं चूकते थे।


बल्कि उन्हें पांचजन्य के संपादक पद से बर्खास्त कर दिया गया था, जब उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से मिमियाने की बजाय नेतृत्व संभालने को कहा। शुक्ल के लेख हमेशा पैने हुआ करते थे और चोट पहुंचाते थे। मुलायम सिंह यादव पर शुक्ल विशेष कृपादृष्टि रखते थे। उनका चमरौधा, यादव के लिए खास भिगोकर रखा रहता था- चाहे मुलायम सत्ता में हों या सत्ता के बाहर।

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों को छह महीने रह गए थे, जब शुक्ल का निधन हुआ। मुलायम, साम्प्रदायिकता के विरोध की मुहिम जोर-शोर से चलाए हुए थे। अत: जब वे शोक सभा में पहुंचे तो सब अवाक रह गए। गोलवरकर के  सहयोगी की शोकसभा में चुनाव के पूर्व, मुलायम सिंह यादव का शोक सभा में शरीक होना। लेकिन मुलायम सिर्फ आए ही नहीं, बोले भी। उन्होंने कहा, ‘भानु जी और मेरे बीच मतभेद हुआ करते थे। लेकिन हम दोनों का एक लगाव था- हिंदी प्रेम का।’

मुलायम की इसी खासियत -विषमता में तारतम्य ढूंढना- ने उन्हें आज वहां लाकर खड़ा किया है जहां वे देश के मोस्ट वांटेड नेता हो गए हैं। गली गली में मुलायम की गुहार है। अंटी खाली है, लेकिन मुलायम की पांचों उंगलियां घी में हैं और सिर कड़ाही में। स्थिति को भांपना और उसके अनुरूप स्वयं को ढालना भी एक कला है। मुलायम सिंह इसके उस्ताद हैं। जरा सोचिए- यह वही शख्स हैं जिसने सार्वजनिक सभा में कहा था कि परमाणु करार पर सपा आजीवन वाम दलों के साथ रहेगी, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।

मुलायम सिंह के सहयोगी अमर सिंह ने तो यहां तक भाविष्यवाणी कर दी थी कि जिस तरह भाजपा की सरकार ‘फील गुड फैक्टर’ पर गिरी थी, उसी तरह संप्रग की सरकार ‘डील गुड फैक्टर’ पर गिरेगी। उन्होंने यह भी कहा था कि यूएनपीए का भविष्य उवल है और यह राष्ट्र की आवाज है। लेकिन बात पर मुकरना मुलायम सिंह के लिए कोई अप्रत्याशित बात नहीं है। पिछले कई साल से वह लगातार कहते रहे हैं कि वह वामपंथी दलों को अपना आदर्श मानते हैं।

2004 में जब सोनिया गांधी के घर पर चाय पार्टी हुई और सांप्रदायिकता की लड़ाई में अग्रसर सपा को निमंत्रण नहीं मिला तो कैसे हरकिशन सिंह सुरजीत ने सपा की लाज रखी, इस वाकये को बताते हुए अमर सिंह थकते नहीं थे। आज उन्होंने राष्ट्रहित में पुराने मित्रों को दगा दे दिया। उसी बेमुरव्वत कांग्रेस से हाथ मिलाने के लिए, जिसने उन्हें अशिष्टता से मना किया था। चलिए एक मिनट के लिए मान लेते हैं कि यह सब पुरानी बातें हो गईं। सच तो यह है कि आज की तारीख में सपा को कांग्रेस की उतनी ही जरूरत है, जितनी कांग्रेस को सपा की।

जिस तरह से मायावती, उत्तर प्रदेश में मुलायम और उनके समर्थकों को दौड़ा रही हैं, उससे यह लगता है कि जल्दी ही ‘मुलायम’ और ‘यादव’ उत्तर प्रदेश में एक गाली का शब्द बन जाएगा। यह अस्थायी दौर नहीं है। मायावती के पास विधायकों की कमी नहीं है और सरकार पूरे पांच साल चलेगी। पांच साल तक सत्ता से बाहर रहने के बाद मुलायम और सपा का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। उधर कांग्रेस के लिए भारत और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का मान सम्मान रखने के लिए सामरिक करार को जीवित रखना और उसे कार्यान्वित करना बहुत जरूरी है।

ऐसा न करने से न केवल विश्व की राजधानियों में भारत की खिल्ली उड़ सकती है, बल्कि मनमोहन सिंह के इस्तीफा देने की भी नौबत आ सकती है। अत: सपा और कांग्रेस के गठबंधन से दोनों को लाभ है। सरकार अब उन सभी आर्थिक मुद्दों पर धड़ल्ले से आगे बढ़ सकती है, जो जरूरी हैं, लेकिन वाम दलों की वजह से उनपर प्रतिबंध लगा था- जैसे बीमा, बैंक एकीकरण और विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में कैंपस खोलने की छूट। सपा में यह साफ है कि यदि लोक सभा चुनाव में पार्टी अकेले लड़ती है तो मायावती को 80 लोकसभा सीटों में से 60 मिल सकती हैं।

सपा को सबसे बड़ा डर यह है कि उप्र में तो वह साफ है, लोक सभा और केंद्र में भी साफ हो गई तो कौन बचाएगा? यही बात मुलायम सिंह और अमर सिंह ने यूपीए के नेताओं से कही। सपा में एक-दो समाजवादियों -जैसे जनेश्वर मिश्र- को छोड़कर सरकार की बागडोर फिर संभालने की आशा में बैठे सभी खुश हैं। कांग्रेस में कोई खुश नहीं है। मुलायम और अमर सिंह जैसे सच्चे ‘राष्ट्रवादियों’ को कांग्रेस में गहरे संदेह की निगाहों से देखा जाता है।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस समिति की अध्यक्ष रीता बहुगुणा ने कहा तो है कि यदि मुलायम सिंह के साथ 40 सीटों पर समझौता हो जाए तो काफी है। लेकिन यह कांग्रेस का एक दिवास्वप्न है। मुलायम सिंह यादव कांग्रेस को 20 सीटों से ज्यादा दे ही नहीं सकते। इसका मतलब यह है कि जिस तरह तमिलनाडु और महाराष्ट्र में कांग्रेस अपने चुनावी सहयोगियों के  सामने झुक कर हार मान चुकी है, उसी तरह उत्तर प्रदेश में भी उसे समझौता करने पर विवश होना पड़ेगा। और फिर, जब पार्टी लड़ेगी ही 80 में से 20 सीटों पर, तब जीतेगी कितनी और सरकार बनाएगी कैसे? आगे जो स्थिति बन रही है वह बहुत दिलचस्प रहेगी। बाकी रजत पटल पर!

First Published - July 4, 2008 | 10:04 PM IST

संबंधित पोस्ट