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कुप्रबंधन की मुरलिया खूब बाजे रे…

Last Updated- December 07, 2022 | 4:05 AM IST

जब मुल्क के पेट्रोलियम मंत्री का ही नाम मुरली हो, तो इस तरह के शीर्षक सूझना काफी हद तक स्वाभाविक है। इस शीर्षक में द्विअर्थी संवाद से भी आगे काफी कुछ है।


यह बताता है कि पेट्रोलियम मंत्रालय को आजकल कैसे चलाया जा रहा है। यह शीर्षक केवल पेट्रोलियम मंत्रालय के कदमों के बारे में ही नहीं, बल्कि उस घटिया रवैये बारे में भी बता रहा है जिसके साथ कांग्रेस पार्टी और संप्रग, सरकार को चलाए जा रही है। मिसाल के तौर पर राजग सरकार को ही ले लीजिए।

वाजपेयी सरकार ने मनमोहन सरकार की तुलना में कहीं ज्यादा बार पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों में इजाफा किया था। राजग सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतों को एक तरह से ऑटो पायलट मोड पर डाल दिया था, जिस वजह से कीमतों में 33 बार छोटी-मोटी बढ़ोतरी की गई थीं।

वहीं, संप्रग के शासनकाल में इससे आधी बार ही इजाफा किया गया। ऊपर से केरोसिन तेल की कीमतों में राजग सरकार के समय में 2.5 गुना तक इजाफा कर दिया गया था। फिर भी इस बारे में कोई हंगामा नहीं हुआ। आज न तो कांग्रेस और न ही संप्रग सरकार इस बात का फायदा उठाने की कोशिश कर रही है। साथ ही, अटल बिहारी वाजपेयी ने देश के नाम अपना संदेश परमाणु परीक्षण के वक्त दिया था, ना कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में इजाफा करने पर।

राजग सरकार ने मार्च 1998 में जब सत्ता संभाली थी, तब एक बैरल कच्चे तेल की कीमत केवल 10 डॉलर थी। संप्रग के मई, 2004 को सत्ता पर काबिज होते वक्त यह बढ़कर 39 डॉलर तक हो गई थी। यानी कीमतों में 290 फीसदी का इजाफा। वहीं आज कच्चे तेल की कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल हो चुकी है। यानी संप्रग सरकार को कच्चे तेल की कीमत में केवल 233.3 फीसदी का इजाफा देखना पड़ा है।

वाजपेयी के शासनकाल में केरोसिन तेल की कीमतों में 257.6 फीसदी (2.52 रुपये से सीधे 9.01 रुपये) का जबरदस्त इजाफा किया गया था, जबकि संप्रग सरकार के समय में केवल 0.9 (9.01 रुपये से 9.09 रुपये) फीसदी का। साथ ही, रसोई गैस की कीमतों में भी राजग सरकार के वक्त 77 फीसदी का इजाफा किया गया था, जबकि संप्रग सरकार में इसकी कीमत में केवल 42 फीसदी का इजाफा किया गया था।

वहीं, पेट्रोल की कीमतें वाजपेयी साहब के सत्ता में आने के वक्त 22.84 रुपये प्रति लीटर थीं, जबकि उनके जाते-जाते यह बढ़कर 33.71 रुपये प्रति लीटर हो चुकी थी। मतलब, 47.6 फीसदी का इजाफा। वहीं आज पेट्रोल की कीमत 50.56 रुपये प्रति लीटर हो चुकी है। यानी डॉ. मनमोहन सिंह के पीएमओ में आने के बाद से पेट्रोल की कीमतों में पूरे 50 फीसदी का इजाफा हो चुका है।

वहीं, राजग के आने के वक्त डीजल की कीमत करीब 10 रुपये थी, जबकि उसके जाते-जाते तक यह चढ़कर 21.74 रुपये प्रति लीटर तक हो चुकी थी। मतलब, पूरे 112.1 फीसदी का अच्छा-खासा इजाफा। आज डीजल की कीमत 34.80 रुपये प्रति लीटर है। यानी संप्रग सरकार में केवल 60 फीसदी का इजाफा हुआ है।

डीजल और केरोसिन के दाम में बढ़ते अंतर से मिलावट को ही बढ़ावा मिलेगा। आज करीब 30-40 फीसदी केरोसिन का इस्तेमाल तो केवल डीजल के साथ मिलावट में होता है। इस अंतर के और बढ़ने से हालत और भी बदतर हो जाएगी। यह केरोसिन की मिलावट ही है, जिसकी वजह से तेजी से विकास करते अपने मुल्क में डीजल के इस्तेमाल की दर इतनी धीमे क्यों बढ़ रही है।

सीएसई के भी मुताबिक बढ़ते प्रदूषण की असल जड़ भी घटिया कार इंजन नहीं, बल्कि घटिया ईंधन है। वैसे, डीजल की कीमत कम रखने से औद्योगिक इकाइयों ने फर्नेस ऑयल ऐंड लो सल्फर हेवी स्टॉक (एफओएलएसएचएस) की जगह इसे इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। चूंकि एफओएलएसएचएस आज भी कुछ रिफाइनरियों के कुल उत्पादन का 20 फीसदी हिस्सा है, इस वजह से वे इसे घाटा सहते हुए भी निर्यात कर रहे हैं।

साल भर में डीजल के इस्तेमाल में 11 फीसदी का जोरदार उछाल आया है, वहीं एफओएलएसएचएस का उपयोग केवल 0.2 फीसदी बढ़ा है। गौरतलब है कि अब तक डीजल के इस्तेमाल में प्रतिवर्ष केवल एक या दो फीसदी इजाफा होता रहा था। सरकारी कुप्रबंधन की कलाई आईओसी प्रमुख के बयान से भी खुलती है। उन्होंने कहा था कि उनकी कंपनी के पास अब केवल दो दिनों का स्टॉक बचा हुआ है।

दो दिन राष्ट्रीय सुरक्षा को बरकरार रखने के लिए बनाए गए नियमों के मुताबिक कम से कम 45 दिनों का तेल स्टॉक रखना जरूरी है। क्या किसी का ध्यान इस तरफ गया? वाजपेयी के शासनकाल में इस बढ़ाकर दोगुना करने का फैसला लिया था। उसका क्या हुआ? अब बारी आती है अंडर रिकवरीज की यानी कि उस घाटे के बारे में जो सरकार पेट्रोलियम उत्पादों की बिक्री पर उठाती है। इसके बारे में पेट्रोलियम मंत्रालय और तेल कंपनियां आज कल खूब बात कर रही हैं।

कीमतों में इजाफे से पहले कहा जा रहा था कि अंडर रिकवरी का स्तर 2.45 लाख करोड़ रुपये के स्तर पर पहुंच चुका है। वहीं खुद मनमोहन इसे केवल दो लाख करोड़ रुपये का बता रहे थे। कई पेट्रोलियम उत्पादों के मामले में भी पीएम अंडर रिकवरी का स्तर चर्चा में चल रहे स्तर से कहीं नीचे बता रहे थे। तो क्या अंडर रिकवरी के स्तर को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है? 

एक संभावना तो यह है कि आज भी अंडर रिकवरी को पुराने तरीके से ही मापा जा रहा है। इसमें किसी एक पेट्रोलियम उत्पाद को लिया जाता है. फिर उसके ऊपर लागत, बीमा, मालभाड़ा और आयात शुल्क को जोड़कर उसकी असल कीमत निकाली जाती है। इसे फिर घरेलू बाजार में चल रही कीमतों से घटाकर अंडर रिकवरी का पता लगाया जाता है। लेकिन दिक्कत यह है कि भारत पेट्रोलियम उत्पादों का आयात न के बराबर करता है।

दरअसल, हम कच्चे तेल का आयात करके उसे यहां रिफाइन करते हैं। साथ ही, आईओसी जैसी रिफाइनरियां 20 फीसदी तेल ओएनजीसी से खरीदती हैं। ओएनजीसी उन्हें ऐसी कीमत पर तेल बेचती है, जो अंतरराष्ट्रीय कीमतों से आधी होती हैं। क्या अंडर रिकवरी को मापते वक्त इस बात का ख्याल रखा जाता है? मजे की बात यह है कि बी. के. चतुर्वेदी कमिटी को सौंपे गए कामों में एक काम अंडर रिकवरी के असल स्तर को पता लगाने का भी काम है।

तो क्या अब नियंत्रित मूल्य प्रणाली (एपीएम) की तरफ वापस लौटने का वक्त आ गया है? दरअसल, इसे खत्म ही इसीलिए किया गया था, ताकि इस क्षेत्र में प्राइवेट कंपनियां उतर सकें। लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। इस सेक्टर में उतरने वाली रिलायंस अब बोरिया बिस्तर बांधकर वापस लौट चुकी है।

First Published - June 8, 2008 | 11:14 PM IST

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