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नवरत्न और राजनीतिक मजबूरियां

Last Updated- December 07, 2022 | 1:40 AM IST

यह लगभग तय है कि देश की सबसे बड़ी बिजली उत्पादक कंपनी एनटीपीसी लिमिटेड का 6000 करोड़ रुपये का जो फॉलोआन पब्लिक ऑफर (एफपीओ) आने वाला है, उससे सरकार का ही भला होना है।


इस नवरत्न कंपनी को इससे कुछ भी हासिल नहीं होगा क्योंकि एफपीओ के जरिए बेची जाने वाली 4.75 प्रतिशत इक्विटी सरकार के पास है। एक विचार यह है कि सरकार यह पैसा अपनी हिस्सेदारी बेचकर बाजार से उठाएगी और इसका उपयोग एनटीपीसी को 75000 मेगावाट की कंपनी बनाने के लिए विस्तार कार्यों में किया जाएगा। इसका कोई तार्किक आधार नहीं लगता क्योंकि नवरत्न कंपनियां सरकार के फंड पर निर्भर नहीं हैं।

पब्लिक ऑफर के इस प्रस्ताव को वित्त मंत्रालय ने ठुकरा दिया था, क्योंकि सरकार की वर्तमान नीतियों के मुताबिक सरकार नवरत्न कंपनियों का विनिवेश नहीं कर सकती। जब यह नीति सार्वजनिक हो चुकी है, तो सवाल उठता है कि इस तरह के प्रस्ताव क्यों लाए जाते हैं। प्रस्ताव या तो यह नीति के लचीलेपन का परीक्षण करने के लिए लाया गया या इसे वाम दलों के लचीलेपन का परीक्षण करने के लिए लाया गया।

वाम दल वर्तमान सरकार का बाहर से समर्थन कर रहे हैं और वे पूरी तरह से विनिवेश के खिलाफ हैं। ऐसी स्थिति में यह स्वाभाविक है कि इस युक्ति के लिए संभावनाएं कम हैं, जब तक कि अगस्त 2007, जब पहली बार यह प्रस्ताव रखा गया था, की तुलना में स्थितियों में बदलाव न आ गया हो।

ये कंपनियां अपनी पूरी क्षमता के साथ काम कर सकें, इसके लिए सरकार का नियंत्रण कम किए जाने का तर्क कई साल से दिया जा रहा है। नियंत्रण कम करने का एक तरीका यह भी है कि सरकार की हिस्सेदारी कम की जाए। यह धीमी प्रक्रिया है और एनटीपीसी जैसी कंपनियों के लिए जिसमें सरकार की हिस्सेदारी 89.5 प्रतिशत है, इसके 5 प्रतिशत शेयर जनता को बेचे जाने से नियंत्रण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है।

कंपनी की मालिक (जो इस समय सरकार है) को अभी भी छोटी-छोटी चीजों पर ध्यान रखना होगा, जैसा कि कार्पोरेट गवर्नेंस में सामान्य रूप से होता है। इस समय सरकार भीतर और बाहर, दोनों तरफ के राजनीतिक दबाव में है। इस हाल में अन्य सभी हितों को अक्सर राजनीति की बलि वेदी पर चढ़ा दिया जाता है। नवरत्न की परिकल्पना में एनटीपीसी जैसी कंपनियों में सरकारी हस्तक्षेप कम से कम किए जाने की बात कही गई है।

इस तरह संकट का सामना कर रही ऑयल मार्केटिंग कंपनियां राजनीतिक मजबूरियों के कारण घाटे की ओर बढ़ रही हैं। वे तेजी से बढ़ रहे सब्सिडी बिल से जूझ रही हैं। ऐसी स्थिति में सरकार को यह ध्यान दिलाये जाने की जरुरत है कि वह इन कंपनियों में एकमात्र शेयरधारक नहीं है। 

निवेशकों की सक्रियता और माइक्रोसॉफ्ट के साथ हाथ मिलाने के लिए याहू पर दबाव डाल रहे अरबपति निवेशक कार्ल इकॉन के क्लोन की भूमिका के संदर्भ में सोचना अव्यावहारिक होगा क्योंकि संदर्भ और वास्तविकता बिल्कुल भिन्न हैं।

First Published - May 24, 2008 | 12:03 AM IST

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