प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को देश के अंतरिक्ष और रक्षा उद्योग के समक्ष एक चुनौती प्रस्तुत करते हुए कहा कि उसे 40,000 करोड़ रुपये का वार्षिक निर्यात लक्ष्य हासिल करना चाहिए। न तो यह संकल्प नया है और न ही यह आंकड़ा। रक्षा निर्यात का मौजूदा वार्षिक स्तर 2,000-3,000 करोड़ रुपये है और उसे 10 गुना से अधिक बढ़ाकर 5 अरब डॉलर से अधिक करने का लक्ष्य पहली बार 2018 की रक्षा उत्पादन नीति (डीपीआरपी-2018) में प्रस्तुत किया गया था।
मोदी ने लखनऊ में डिफेंस एक्सपो 2020 को संबोधित करते हुए इस बात को दोहराया। इस वर्ष विमान निर्माण संबंधी उत्पादों को रक्षा क्षेत्र में शामिल करने से निर्यात बढ़कर 13,000 करोड़ रुपये हो गया। इसके बावजूद डीपीआरपी 2018 के निर्यात लक्ष्य को हासिल करने के लिए इसमें तीन गुना इजाफा करना होगा जो वास्तव में एक बड़ी चुनौती है।
हालांकि यह असंभव नहीं है। जैसा कि प्रधानमंत्री ने भी संकेत किया रक्षा निर्यात बीते पांच वर्ष में आठ गुना बढ़ा है और हमारे रक्षा उत्पाद तथा उपकरण दुनिया के 75 से अधिक देशों में जा रहे हैं। सरकार ने भी इस क्षेत्र की मदद आरंभ की क्योंकि उसे समझ में आ गया था कि रक्षा निर्यात को कई गुना बढ़ाकर ही डीपीआरपी 2018 का लक्ष्य को पूरा किया जा सकता है और ऐसा करके ही भारत दुनिया के शीर्ष पांच रक्षा उत्पादकों में शामिल हो सकता है। फिलहाल हमारा सालाना रक्षा उत्पादन 90,000 करोड़ रुपये का है जिसे दोगुना बढ़ाकर यानी 1.8 लाख करोड़ रुपये अर्थात 26 अरब डॉलर करके ही ऐसा किया जा सकता है।
परंतु इस चुनौती के आकार से अवगत सरकार ने एक नीतिगत ढांचा तैयार किया ताकि विमान निर्माण और रक्षा निर्यात को बढ़ावा दिया जा सके। विदेशों में भारतीय दूतावासों में तैनात विभिन्न रक्षा अताशे को यह काम दिया गया है कि वे उन देशों में भारतीय सैन्य उपकरणों की आपूर्ति करने के अवसर देखें।
भारत ने रक्षा निर्यात के लिए एक उदार कारोबारी माहौल बनाया है और इस क्रम में हथियारों के व्यापार से संबंधित ढांचागत बाधाओं को दूर किया गया है। भारत को पहले ही चार में से तीन वैश्विक निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं में प्रवेश मिल चुका है: द मिसाइल टेक्नॉलजी कंट्रोल रिजीम, द वासेनार अरेंजमेंट और द ऑस्ट्रेलिया ग्रुप।
भारत ने चौथे समूह यानी परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह में प्रवेश पाने के लिए सारे कूटनीतिक उपायों का इस्तेमाल कर लिया। भारत ने म्यांमार, मालदीव और श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों को भारतीय रक्षा उपकरण खरीदने के लिए ऋण सुविधा प्रदान करने की पेशकश की है।
सरकारी क्षेत्र की रक्षा कंपनियों को अब अपने कुल कारोबार का 25 फीसदी हिस्सा निर्यात करना है। अक्टूबर में ही स्वदेशी रक्षा उपकरण निर्यातक महासंघ के रूप में एक नोडल एजेंसी बनायी गई ताकि दुनिया भर के संभावित ग्राहकों द्वारा की जा रही रक्षा निर्यात संबंधी पूछताछ का उत्तर दिया जा सके।
ढांचागत फ्रेमवर्क में इन उपायों के साथ भी रक्षा निर्यात में इजाफा करने के लिए कुछ अहम बदलाव जरूरी हैं। कम मूल्य वाली उपभोग्य वस्तुओं मसलन गोली-बारूद, कलपुर्जे तथा विमान निर्माण कलपुर्जों के बजाय भारत को उच्च मूल्य वाले जटिल लड़ाकू प्लेटफॉर्म निर्यात करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
भारतीय सेना ने स्वदेशी तौर पर विकसित रक्षा प्लेटफॉर्म मसलन तेजस मार्क 1 और मार्क 1ए लड़ाकू विमानों, हल्के लड़ाकू हेलीकॉप्टरों ध्रुव और रुद्र, अर्जुन टैंक, आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, पिनाका रॉकेट लॉन्चर तथा ढेर सारे स्वदेशी युद्ध पोतों को अपनाने में अनिच्छा जताई है तो ऐसे में संभावित ग्राहक उचित ही यह प्रश्न कर सकते हैं कि आखिर भारत की सेना इन प्लेटफॉर्म को क्यों नहीं खरीद रही?
भारत की सेना को इस मामले में मार्गदर्शन करना चाहिए और थलसेना, नौसेना तथा वायुसेना को स्वदेशी हथियारों को अपनाना चाहिए ताकि यह उद्योग निरंतर उत्पादों के विकास और सुधार में संलग्न रहे। हथियारों का निर्यात आर्थिक पैमाना पैदा करता है। इससे न केवल भारत के लिए बल्कि खरीदार देशों के लिए भी उपकरणों की कीमत कम होगी। यह भारत के लिए सामरिक दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण होगा।