हाल में जारी आंकड़े भारतीय जनसांख्यिकी स्थिति में अहम बदलाव दर्शाते हैं। युवाओं (15 से 29 साल) का हिस्सा 2021 में घटकर 26.7 फीसदी पर आ गया और यह वर्ष 2036 तक गिरकर 22.6 फीसदी पर आने का अनुमान है। भारतीय आबादी की एक असामान्य विशेषता यह है कि जनसांख्यिकी बदलाव के अनुमान हमेशा कम साबित हुए हैं, यह बदलाव हमेशा अनुमान से अधिक तेजी से हुआ है। महामारी से जन्म दर में गिरावट आ सकती है। भारत के भविष्य को लेकर विचारों के विभिन्न आयामों में ‘जनसांख्यिकी भविष्य है’। वृद्धावस्था आय और सामाजिक सुरक्षा की समस्या पर आसान तर्क प्रत्येक वरिष्ठ जन के लिए इस समय कार्यरत युवाओं की गिनती करना है। भारत में असैन्य सेवा पेंशन सुधार हाल के दशकों की प्रमुख सफलताओं में से एक है।हालांकि हाल में दो दशकों में हासिल सुधारों को कुछ राज्य सरकारों द्वारा मटियामेट किए जाने के चिंताजनक संकेत नजर आए हैं। ऐसे फैसले आंशिक रूप से लोक लुभावन सोच और तात्कालिक राजकोषीय दबाव के कारण लिए जा रहे हैं, जिनसे केवल भविष्य की पीढ़ियों पर देनदारियां हस्तांतरित होंगी।
आगे देखने के लिए पीछे देखना उपयोगी है। वर्ष 1998 में तत्कालीन कल्याण मंत्रालय ने सुरेंद्र दवे की अगुआई में एक आठ सदस्यीय अंतर-मंत्रालय विशेषज्ञ समिति बनाई थी, जिसका नाम वृद्धावस्था सामाजिक एवं आय सुरक्षा (ओएसिस) परियोजना रखा गया था। इसे बनाने का मकसद यह था कि पेंशन के दायरे से बाहर आबादी के लिए एक पेंशन प्रणाली बनाई जाए। तब तक भारतीय पेंशन प्रणाली में तीन श्रेणियों के लोग शामिल थे। सरकारी कर्मचारी, जो परंपरागत पे-एज-यू-गो परिभाषित लाभ (डीबी) प्रणाली के तहत आते थे। निराश्रित लोग, जो राष्ट्रीय वृद्धावस्था पेंशन योजना के तहत पात्र थे। संगठित क्षेत्र के कामगार जो कर्मचारी भविष्य निधि संगठन की पेंशन योजना के तहत आते थे। परियोजना ओएसिस ने दुनिया भर में डीबी प्रणालियों की विफलता और तब तक बहुत से देशों में शुरू हो चुकी नई परिभाषित योगदान (डीसी) प्रणालियों की दिक्कतों पर समाजीकरण में मदद दी।
हालांकि ओएसिस रिपोर्ट में पेंशन के सभी तीनों घटकों पर जोर दिया गया, लेकिन नीति निर्माताओं ने सरकारी कर्मचारियों की पेंशन से शुरुआत करने का फैसला किया। इसकी कुछ बाध्यकारी राजकोषीय वजह भी थीं। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में केंद्र सरकार का पेंशन बिल 1980-81 में जीडीपी का 0.24 फीसदी था, जो 22 फीसदी की नॉमिनल सालाना वृद्धि दर से 1999-2000 में जीडीपी का 0.73 फीसदी हो गया। जब ये सुधार शुरू किए गए थे, उस समय पेंशन खर्च केंद्रीय बजट के कुल राजस्व व्यय का 5.7 फीसदी था। यह 1980-81 में 2.4 फीसदी की तुलना में तेज बढ़ोतरी को दर्शाता है। वर्ष 1999-2000 में भारत सरकार के पेंशन बिल में राजस्व प्राप्तियों का आठ फीसदी हिस्सा खप गया जबकि यह वर्ष 1980-81 में 2.9 फीसदी ही था।
फरवरी 2002 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने एक डीसी पेंशन प्रणाली की घोषणा की थी। इससे भी अहम बात यह थी कि असैन्य सेवाओं में भर्ती होने वाले नए लोगों और पेंशन के दायरे से बाहर आबादी के हिस्से को एक ही प्रणाली- राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली (एनपीएस) में शामिल कर दिया। एनपीएस के विनियमन के लिए पेंशन फंड रेग्युलेटरी ऐंड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया (पीएफआरडीए) बनाया गया।
राज्य सरकारों के एनपीएस से जुड़ने की शुरुआत 2003 से हिमाचल प्रदेश के साथ हुई। इसके बाद सत्ता में आई संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार वाम दलों के कड़े विरोध के बावजूद इस रास्ते से नहीं भटकी। इसने एक ससंदीय अधिनियम के जरिये नए पेंशन नियामक को मजबूत बनाया। प्रत्येक पेंशन प्रणाली में एक अहम खर्च परिचालन की ऊपरी लागत है, जो प्रत्येक भागीदार पर डाली जाती है। एनपीएस का आकार तेजी से बढ़ा। इसने लागत घटाई है और यह भारत में सबसे सस्ती कोष प्रबंधन प्रणाली बन गई है।
एनपीएस जैसे पेंशन सुधार, जिसमें सभी पुराने वादों को बरकरार रखा गया है, वे ‘संक्रांति पीढ़ी’ कही जाने वाली एक पीढ़ी पर दोहरी लागत डालते हैं। सरकारों को पुरानी डीबी योजना (2003 तक भर्ती) के तहत लोगों को पूरी पेंशन का भुगतान करना पड़ता है और नए डीसी के तहत भर्ती लोगों (2004 के बाद) के लिए एनपीएस में अपना हिस्सा चुकाना होता है। इस तरह एनपीएस सुधार के जरिये राजकोषीय स्थितियों में अल्पावधि लाभ नहीं है। डीबी पेंशन पाने वाले लोगों के नहीं रहने के बाद ही राजकोषीय लाभ मिल पाएंगे। इसके बावजूद एनपीएस सुधार लगातार भविष्य में एक मजबूत ढांचे की नींव तैयार कर रहा है, जिसमें सरकारों को दोहरे भुगतान के बजाय केवल अपना योगदान ही चुकाना होगा और युवा राजकोषीय चिंताओं के जोखिम से मुक्त हो जाएंगे। इस पेंशन सुधार की प्रगति राजनीतिक नेतृत्व और प्रशासन की समझदारी का नतीजा है। एक के बाद दूसरी सरकारों के दौरान उनका धैर्य और दूरदृष्टि आवश्यक थी । आम तौर पर ऐसे आर्थिक सुधार के लाभ मिलने में कई दशक लगते हैं। ये लाभ कई साल दूर होने के बावजूद एनपीएस की नीतिगत वैधता इसे लेकर बौद्धिक एवं साक्ष्य आधारित सहमति, सार्वजनिक चर्चा एवं विमर्श और बाहरी क्षेत्र विशेषज्ञता के अच्छे इस्तेमाल से आई है। आज एनपीएस सभी नागरिकों के लिए खुला है। इसमें केंद्र व राज्यों के कर्मचारियों के अलावा कंपनियों और असंगठित क्षेत्र के निम्न आय वाले कामगारों के लिए अलग-अलग योजनाएं हैं। इसके बावजूद विभिन्न राज्य सरकारें विपरीत दिशा में जा रही हैं। लेकिन केंद्र सरकार निश्चित रूप से एनपीएस को समर्थन पर अडिग है।
अगर 1999-2002 में उपलब्ध सबसे बेहतर जनसांख्यिकी अनुमानों पर विचार करते हैं तो डीसी पेंशन के पक्ष में तार्किक संतुलन ज्यादा मजबूत था। इसके बाद के 20 साल में जनसांख्यिकी बदलाव की रफ्तार के मद्देनजर एनपीएस सुधार का मामला और ज्यादा मजबूत है। अच्छी उम्मीद यह है कि हर व्यक्ति का पेंशन खाता हो, जो निजी संपत्ति है। आर्थिक वृद्धि ऊंची हो ताकि लोग इस पेंशन खाते में अच्छी खासी रकम जमा कर सकें। इसके अलावा अच्छा वित्तीय प्रबंधन हो, जिसके जरिये जोखिम स्तर के आकार में परिसंपत्ति पर अच्छा प्रतिफल मिले। इसका मतलब यह कहना नहीं है कि एनपीएस के डिजाइन और क्रियान्वयन में सब कुछ ठीक है और सरकारी कर्मचारियों की शिकायतें जायज नहीं हैं। इसमें प्रक्रिया और महत्त्व दोनों के मुद्दे हैं, लेकिन एनपीएस की इन चिंताओं को कम जोखिम वाले तरीकों से दूर किया जा सकता है।
राज्य सरकारों के लोक लुभावन और लघु अवधि के नजरिये के मद्देनजर पेंशन में लंबी अवधि के आर्थिक सुधारों पर जोखिम है। केंद्र को इन्हें जारी रखना चाहिए ताकि सभी पेंशन प्रणालियों में ज्यादा व्यापक सुधार लाने के लिए बौद्धिक और राजनीतिक सहमति बनाई जा सके।
(लेखक सीपीआर में मानक प्राध्यापक, कुछ लाभकारी तथा अलाभकारी बोर्डों के सदस्य और पूर्व अफसरशाह हैं)