देश आजादी की 75वीं वर्षगांठ मना रहा है और मोदी सरकार ने इसे ‘अमृत महोत्सव’ के रूप में बहुत बड़े पैमाने पर मनाने का निर्णय लिया है। ऐसे में अतिराष्ट्रवाद का राजनीतिक संघर्ष छिड़ गया।
कांग्रेस अभी भी एक नए किस्म के जोश में या तो तिरंगे को लेकर ट्विटर पर मोदी का मजाक उड़ा रही है या फिर यह प्रश्न उठा रही है कि यह खादी के बजाय प्लास्टिक या पॉलिएस्टर से क्यों बना है? अन्य गैर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) दल अपनी-अपनी प्राथमिकताओं में उलझे हैं। कई जगह यह प्राथमिकता प्रवर्तन निदेशालय या सीबीआई ने तय की है। केवल दो दलों ने तिरंगे के मामले में भाजपा को जवाब देने का प्रयास किया: तेलंगाना में के चंद्रशेखर राव ने और दिल्ली तथा कुछ अन्य जगहों पर आम आदमी पार्टी (आप) ने।
आप की प्रतिक्रिया ज्यादा ठोस और प्रासंगिक है क्योंकि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के मुकाबले कांग्रेस के अलावा केवल आप नजर आती है। आप का उभार हो रहा है जबकि कांग्रेस सिमट रही है। जमीनी लड़ाई के मामले में भी आप कांग्रेस से अधिक सक्षम है। आप ने सबसे पहले यह पता लगा लिया कि तिरंगे की जंग ही राष्ट्रवाद की लड़ाई का अगला अध्याय होगा। इस जंग में आंकड़े और आकार दोनों मायने रखेंगे। यही वजह है कि पार्टी ने राजधानी को तिरंगे के रंग में रंगने का निर्णय ले लिया और कम से कम 500 तिरंगे फहरा दिए। ये झंडे इतने बड़े हैं कि इन्हें दूर से ही देखा जा सकता है। संदेश साफ है: मेरा झंडा न केवल आपसे बड़ा है बल्कि हमारे झंडों की तादाद भी अधिक है।
तिरंगे की जंग किसी प्रतीकात्मक मसले पर स्कूली बच्चों की लड़ाई नहीं है। यह राष्ट्रीय राजनीति में विचारों की लड़ाई का नया रूपक है। नरेंद्र मोदी की भाजपा ने 2013 के बाद की राजनीति को धर्म और राष्ट्रवाद की बुनियाद पर खड़ा किया था। अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में यह घातक सम्मिश्रण होता है बशर्ते कि प्रतिद्वंद्वी बेहतर दावा न कर दे। पुराने समय में कांग्रेस के साथ ऐसा नहीं था।
कांग्रेस और आप दोनों ने हिंदू धार्मिक भावनाओं पर भाजपा के एकाधिकार को समय-समय पर चुनौती दी है। राहुल गांधी ने मंदिर जाकर तथा अनुष्ठान करके अपनी प्रतिक्रिया दी। उनके लोगों ने उनके जनेऊ और ब्राह्मण गोत्र का प्रदर्शन किया। लेकिन यह वैसा ही था जैसे वह कह रहे हों कि देखो मैं भी हिंदू हूं। इससे हिंदुओं के बीच मोदी की लोकप्रियता पर असर नहीं पड़ेगा। बल्कि उनकी पार्टी को यह कहने का अवसर मिलेगा कि देखो हमने कांग्रेस को भी देवताओं को याद करने और हिंदुत्व को राजनीतिक कारक मानने पर विवश कर दिया।
अरविंद केजरीवाल कुछ अधिक सफल रहे, भले ही उन्हें टीवी स्टूडियो जाते समय फोन पर हनुमान चालीसा याद करनी पड़ी और समाचार प्रस्तोता को यह चुनौती देनी पड़ी कि क्या वह दिल से हनुमान चालीसा दोहरा सकता है। इसके बाद उन्होंने खुद पाठ करके हिंदुओं का आह्वान किया कि वे भी ऐसा करें। उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों को नि:शुल्क तीर्थ यात्रा की पेशकश की। इन तीर्थ स्थलों में अधिकांश हिंदुओं के थे, साथ ही अजमेर शरीफ और कुछ गुरुद्वारों को भी शामिल किया गया था। परंतु उनकी सरकार के विज्ञापन उन्हें आधुनिक श्रवण कुमार दर्शाते हैं यानी सब कुछ स्पष्ट है।
वह हिंदू धर्म का मुकाबला हिंदू धर्म से कर रहे हैं। हम हिंदुत्व शब्द का इस्तेमाल नहीं करेंगे बशर्ते कि इसका संदर्भ सावरकर से जुड़ा रजानीतिक संदर्भ न हो। दिल्ली में सत्ताधारी आप ने जनवरी 2021 के दंगों और मुस्लिमों को बंदी बनाये जाने या अन्य जगह पर उन्हें जान से मारे जाने के बारे में ज्यादा कुछ नहीं कहा। कम से कम उस सक्रियता से नहीं जिसके लिए उसे जाना जाता है।
वे चतुर हैं और अब गुजरात में बुनियादी विकास के लिए या अतिक्रमण करके बने मंदिरों को तोड़े जाने का प्रश्न उठा रहे हैं। लेकिन वे यह भी जानते हैं कि धर्म के मामले में वे बस रक्षात्मक लड़ाई लड़ सकते हैं। राष्ट्रवाद एक अलग मसला है। यही वह क्षेत्र है जहां उसके और भाजपा के बीच की खुले हाथों की लड़ाई को मानो तिरंगे ने हरी झंडी दिखाई है।
इसके लिए ज्यादा सटीक उपमा शायद फ्रीस्टाइल कुश्ती की होगी लेकिन खुले हाथ की लड़ाई इसलिए उपयुक्त है क्योंकि हम कठोर राजनीति को आपसी संपर्क वाले खेल से जोड़ रहे हैं। इसलिए बर्मिंघम राष्ट्रमंडल खेलों में कांस्यपदक हासिल करने वाली महिला पहलवान दिव्या काकरान की शिकायत पर भाजपा और आप की लड़ाई पर नजर रखिए।
उनकी शिकायत यह है कि वह दिल्ली में रहती हैं लेकिन केजरीवाल सरकार ने उनके लिए कुछ नहीं किया है। भाजपा के नेताओं ने इस आधार पर आप सरकार पर हमले किए। कहा जा रहा है कि सच्चाई और राष्ट्रवाद को लेकर उसकी प्रतिबद्धता झूठी है। सच्चाई वाली बात इसलिए कि अतीत में दिव्या से वादे किए गए थे जबकि राष्ट्रवाद इसलिए क्योंकि बात खेल पदक से जुड़ी है?
अगर केजरीवाल सरकार यह कहकर बचाव करती है कि वह उत्तर प्रदेश की हैं तो उन्हें पुरस्कार क्यों देना तो उत्तर यह है कि वह दिल्ली में रहती और प्रशिक्षण लेती हैं। वह भारतीय रेल में नौकरी करती हैं और दिल्ली में ही पदस्थ हैं। अब केजरीवाल के अगले कदम की प्रतीक्षा कीजिए।
तिरंगे की तरह यह भी बड़ी तस्वीर का एक हिस्सा भर है जहां विचारों की नई लड़ाई छिड़ चुकी है। इसका संबंध राष्ट्रवाद से है।
2019 में मोदी के दूसरी बार प्रधानमंत्री चुने जाने के बाद केजरीवाल ने उन पर हमले करना बंद कर दिया था। मानो एक खतरे या चुनौती के रूप में उनका अस्तित्व ही न हो। दिल्ली विधानसभा चुनाव में प्रचार और भारी जीत के साथ वापसी के दौरान भी उन्होंने मोदी का जिक्र नहीं किया।
यह चतुराई भरी रणनीति थी। यदि भाजपा देश भर में एक व्यक्ति के कारण इस कदर कामयाब है तो उससे सीधी भिड़ंत लेना बेवकूफी होगी। अच्छे राजनेता तुक्केबाजी नहीं करते तब तो बिल्कुल नहीं जब उनके सामने संभावना हो। हां, वे छापामार युद्ध जरूर छेड़ सकते हैं। यही कारण है कि मोदी पर हमले आप के ट्विटर पर मौजूद कार्यकर्ताओं ने ज्यादा किए।
बीते कुछ सप्ताह में यह परिदृश्य बदला है। मोदी पर केजरीवाल का मौनव्रत टूटा है। यह भारतीय राजनीति में अहम बदलाव है। कुछ हद तक बिहार में आए नाटकीय बदलाव जैसा।
हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं कि बिहार ने सामाजिक न्याय और मंडल की राजनीति के पुराने योद्धाओं को नई ऊर्जा दी है कि धर्म के नाम पर एकजुट लोगों को जाति के नाम पर अलग किया जा सकता है। परंतु व्यापक तस्वीर अलग है। इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि बिहार वैसा असर डालेगा जैसा 1989-91 में या 1974-75 में आपातकाल के पहले डाला था। राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता की लड़ाई अभी भी धर्म और राष्ट्रवाद के ऊपर ही लड़ी जाएगी।
दो बातें अहम हैं। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस अभी इन विषयों पर लड़ाई के लिए तैयार नहीं है। साथ ही आप को हिमाचल प्रदेश और गुजरात में अपनी राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षाओं की बड़ी लड़ाई से गुजरना है। इन प्रांतों में पार्टी भाजपा के समक्ष कांग्रेस का विकल्प बनने की मंशा पाले है। वह कांग्रेस पर हमला करे ऐसा नहीं कर सकती। उसे भाजपा से जूझना होगा।
दिल्ली और पंजाब में मोदी पर हमला किए बिना काम चल गया। इन दोनों जगहों पर आप के रुख को 2018 के राजस्थान विधानसभा चुनाव के एक नारे में हल्का बदलाव करके समझा जा सकता है: ‘मोदी तुझसे बैर नहीं, रानी तेरी खैर नहीं।’ केजरीवाल के लिए दिल्ली और पंजाब में अपने प्रचार अभियान को मोदी से परे रखना संभव था।
अब आकांक्षाओं में विस्तार के बाद इसे बदलना होगा। यही कारण है हमें बॉक्सिंग के एक और रूपक का प्रयोग करें तो दस्ताने उतारने होंगे। देश की सबसे अक्खड़ नई पार्टी ने मोदी, रेवड़ी संस्कृति और राष्ट्रवाद से लड़ाई ठान ली है। इसमें राष्ट्रवाद ज्यादा स्पष्ट नजर आ रहा है। इसलिए उन्होंने तिरंगे के सामने तिरंगे को, नारेबाजी के सामने नारेबाजी को और ट्वीट के बदले ट्वीट का इस्तेमाल शुरू किया है। इस राजनीतिक वर्ष के बचे हुए महीनों में कुछ दिलचस्प होने वाला है।