योजना आयोग की यह घोषणा कि अब वह गरीबी रेखा के नीचे गुजर-बसर करने वाले लोगों (बीपीएल) की परिभाषा बदलने जा रही है, स्वागत योग्य कदम है।
अब तक बीपीएल की श्रेणी में उन लोगों को रखा जाता रहा है जिनकी रोजाना की खुराक में एक निश्चित मात्रा से भी कम कैलोरी हुआ करती थी। पर अब आयोग बीपीएल के निर्धारण के लिए इस पैमाने को बढ़ाने की योजना बना रहा है।
अब तक गरीबी के बारे में बात करते वक्त लोगों का यह तर्क हुआ करता था कि ‘विकास’ एक बहुआयामी प्रक्रिया है और साथ ही सफलता और हार को भी किसी सूचकांक के जरिए मापा नहीं जा सकता है। आमतौर पर लोगों की इस विषय में यही राय हुआ करती है कि गरीबी मापने के लिए तीन बुनियादी जरूरतों ‘रोटी, कपड़ा और मकान’ को पैमाना बनाया जाए।
हाल के दिनों में गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर कर रहे लोगों की संख्या में 20 फीसदी की कमी हुई है। पर अब समस्या यह है कि कैलोरी के लिहाज से जो परिभाषा बनाई गई है उनके अनुसार तो उन्होंने गरीबी रेखा को पार कर लिया है पर आगे उनके रहन-सहन का क्या होगा?
भोजन के मामले में तो उनकी स्थिति बेहतर हुई है और उन्होंने अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सफलता हासिल कर ली है, पर इसका भरोसा कैसे किया जाए कि उनके जीवन के दूसरे पहलुओं का भी ध्यान रखा जाएगा और उनका भविष्य सुरक्षित बन सकेगा।
सरकार यह सोचकर तो अपनी पीठ थपथपा सकती है कि उसने भोजन को पैमाना बनाकर गरीबी की जो परिभाषा तैयार की थी, उससे वह कई लोगों को बाहर निकालने में कामयाब हो गई है पर अब भी यह उसके लिए सुकून की घड़ी नहीं है क्योंकि जिन्हें गरीबी रेखा के बाहर निकाल लिया गया है, उनका जीवन स्तर भी बेहतर होने के बजाय और बिगड़ता ही जा रहा है।
और इसके लिए कहीं न कहीं सरकार खुद जिम्मेदार है जो बुनियादी संरचनाओं, स्वास्थ्य एवं शिक्षा, जनसंख्या और कानून-व्यवस्था के मोर्चों पर असफल रही है। अब अगर सरकार यह चाहती है कि गरीबी रेखा मापने के पैमाने में आहार के अलावा दूसरे पहलुओं को भी शामिल किया जाए तो उसे खुद की विकास नीतियां फिर से बनाने पड़ेंगी।
आउटकम बजट के जरिए जरूर इस बात का एहसास हो सकता है कि नागरिक सुविधाओं का हाल कितना बुरा है। पर शायद सिर्फ एहसास होने भर से किसी समस्या का हल तो नहीं निकल सकता। अगर सही मायने में यह पता लगाना है कि देश में नागरिक सुविधाओं का हाल कितना बुरा है तो सरकार को उन लोगों की जिंदगियों पर इसके प्रभाव को देखना होगा जिनके पास इतने पैसा नहीं है कि वे निजी सुविधाओं का लाभ उठा सकें।
शायद आयोग ने जिस सूचकांक का प्रस्ताव रखा है, जिससे यह पता लग सके कि लोगों को किन किन चीजों का आभाव है, उससे कुछ फायदा हो सकेगा। इस सूचकांक से सरकार को निरंतर इस बात का एहसास दिलाया जा सकेगा कि हर व्यक्ति को हर दिन 2,400 कैलोरी उपलब्ध करा कर वह गरीबी के खिलाफ जंग नहीं जीत सकती है।
या फिर यह कहना भी गलत नहीं होगा कि इस सूचकांक से सरकार के सामने चुनौतियां और बढ़ जाएंगी क्योंकि लोगों का ध्यान दूसरी आवश्यकताओं की ओर जाने लगेगा जिनमें से ज्यादातर राज्य सरकारों की ओर से मुहैया कराई जाती हैं।