नोएडा के लोटस वैली इंटरनेशनल स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा जेसिका पिएलचेन जब गर्मियों की छुट्टियां बिताकर अगले हफ्ते वापस स्कूल आएगी, तो उसकेपास सहपाठियों और अध्यापकों को सुनाने के लिए छुट्टियां बिताने की कहानी हिंदुस्तानी बच्चों से बिल्कुल जुदा होगी।
एक ओर उसके ज्यादातर दोस्त विदेशों में घूमने गए होंगे या फिर अपने रिश्तेदारों से मिलने गए होंगे, वहीं जेसिका अपनी मम्मी के साथ एक ‘बड़ी सी झुग्गी’ को देखने के लिए मुंबई गई थीं। लेकिन जब तक वह वापस आएगी, उनको यह मालूम ही पड़ जाएगा कि तकरीबन 10 लाख लोगों को समेटने वाली इस बस्ती का नाम धारावी है।
जेसिका ने घूमने के लिए जो अलग जगह का चयन किया उसका मसकद सिर्फ इतना नहीं था कि वह दूसरे बच्चों से अलग हो। लोग इसकी कई वजहें बता सकते हैं। उसका जर्मन मूल का होना, दुनियाभर में घूमना खास वजह बताई जा सकती हैं। इससे पहले वह कैरेबियन में अमेरिकन स्कूल में पढ़ती थी जहां वह मुश्किल से ही पढ़ पाई और वहां पर या तो स्पेनिश भाषा में बात होती थी या फिर उसकी मूल भाषा यानी जर्मन में। पिछले तीन साल से हिंदी पढ़ते हुए जेसिका इसके बारे में समझ बढ़ा पाई है।
वह बताती है कि कई बार उसके साथी उसको ‘जर्मन शेफर्ड’ और हिंदी में कई दूसरे नामों से चिढ़ाते हैं, लेकिन जेसिका इस बात को बहुत गंभीरता से नहीं लेती और उसको इससे बहुत ज्यादा परेशानी नहीं होती। वह बताती है कि उसके दोस्तों ने उसको हिंदी के बहुत सारे ‘खराब शब्द’ सिखा दिए हैं। बार-बार तबादले बड़ों को तो चिंता में डाल सकते हैं लेकिन जेसिका तो अलग-अलग संस्कृतियों का आनंद लेने में मस्त है। वह ऐसे स्कूल में पढ़ रही है जहां 10 से अधिक देशों के बच्चे पढ़ते हैं।
जेसिका को हर गुरुवार को कैंटीन में मिलने वाला भारतीय या चाईनीज खाना बेहद पसंद है, कई बच्चों के उलट उसको मैथ्स बहुत अच्छा लगता है। उसके कई भारतीय दोस्त हैं जिनके घर वह अक्सर जाती भी रहती है। जेसिका अपने अध्यापकों के बीच भी बहुत लोकप्रिय है। उसके माता-पिता भी उसको बताते हैं, ‘पुराने दिनों में जर्मनी के स्कूलों का भी नियम-कानूनों को लेकर यही रवैया रहता था।’ चौथी कक्षा में पढ़ने वाले भाई लियाम और एस्थॉन नियम और अनुशासन में कुछ छूट लेना चाहते हैं। पहले वे दक्षिण अफ्रीका में पढ़ते थे जहां उनको इस तरह की बंदिशें नहीं थीं।
वे बताते हैं कि हमको कभी भी सजा नहीं मिली। हम कक्षा से बाहर भी मस्ती किया करते थे लेकिन हमें भारत में ऐसा करने का अवसर नहीं मिला है। इसके अलावा वे घुड़सवारी गोल्फ, तैराकी और टेनिस जैसी गतिविधियों से भी दूर हो गए हैं। इस तरह से देखें तो वे कई चीजें नहीं कर पा रहे हैं। उनके आधुनिक स्कूल में उनको क्लास रूम में बढ़िया बोर्ड, सेंट्रल एयरकंडीशन, छोटी कक्षाओं के लिए खेल-खेल में पढ़ाई के अलावा और भी कई तरह की बेहतरीन सुविधाएं दी जा रही हैं।
इंटरनैशनल स्कूल
भारत में पिछले कुछ साल में ‘इंटरनैशनल स्कूल’ बहुत तेजी से बढ़े हैं। इसमें गौर करने वाली बात यह भी है कि आखिर इसमें से कितने ‘इंटरनेशनल बैकलॉरेट’ जिसको आईबी के नाम से भी जाना जाता है, से मान्यता प्राप्त हैं। दरअसल बड़े कॉर्पोरेट घराने इस फायदेमंद कारोबार में पैसा लगा रहे हैं।
वाई-फाई क्लासरूम, स्कूल में लैपटॉप ले जाते बच्चे, सुरक्षा कर्मियों के साथ एयरकंडीशन स्कूल बसें, योग और शूटिंग जैसी पढ़ाई से परे की गतिविधियां तथा फाइव स्टार होटल जैसी सुविधाओं वाले स्कूलों के बारे में किसी ने भी दो साल पहले नहीं सोचा होगा। इस तरह के स्कूल भारत में शिक्षा के क्षेत्र में कायापलट कर रहे हैं। लेकिन इस तरह के स्कूलों के बारे मे अपने बच्चों को पढ़ाने के बारे में कोई धनाढय भारतीय ही सोच सकता है। अनिवासी भारतीयों को इस तरह के स्कूल लुभा रहे हैं। इनमें पढ़ने वाले बच्चों के पास बाहर जाने का विकल्प भी मौजूद है।
और इनको आई बी और इंटरनेशनल जनरल सर्टिफिकेट ऑफ सेकेंडरी एजुकेशन से सर्टिफिकेट मिलता है। इस तरह के स्कूल विदेशियों को बहुत आकर्षित कर रहे हैं। इनमें पढ़ने वालों में एशिया प्रशांत क्षेत्र के बच्चे काफी संख्या में शामिल हैं, लेकिन हाल में यूरोपीय और दक्षिण अमेरिकी बच्चे भी इन स्कूलों में पढ़ने के लिए आ रहे हैं। गुड़गांव स्थित एक एलीट स्कूल की प्रशासनिक प्रमुख अलका वर्मा कहती हैं कि उनके स्कूल में इटली, जर्मनी, फ्रांस, स्पेन और यहां तक की चिली के बच्चे पढ़ रहे हैं।
वर्मा बताती हैं कि इस सत्र में उनके स्कूल में तकरीबन 53 देशों के बच्चे पढ़ेंगे। पेशे से पुस्तक विक्रेता और ‘गाइड टू गुड स्कूल्स ऑफ इंडिया’ पुस्तक के लेखक संदीप दत्त कहते हैं कि भारत में शिक्षा क्षेत्र इस समय एकदम उफान पर है। दत्त का मशहूर ‘इंगलिश बुक डिपो’ इस तरह के स्कूलों को बड़ी संख्या में किताबों की आपूर्ति करता है। उनका मानना है कि सरकारी दखल के बिना सूचना प्रौद्योगिकी और दवा उद्योग में तेजी आई, उसी तरह से इसमें भी तेजी आएगी।
उनका कहना है कि यदि सूचना प्रौद्योगिकी की कंपनियां, आउटसोर्सिंग के जरिये कारोबार कर रही हैं और अस्पतालों के कारोबार में ‘स्वास्थ्य पर्यटन’ के जरिये तेजी आई है तो इस दिशा में स्कूल भी पीछे नहीं हैं। वह बताते हैं कि इन स्कूलों में प्राइमरी से लेकर हाईस्कूल तक पढ़ने के लिए विदेशी छात्रों की संख्या में बहुत तेजी आ रही है। इस लिहाज से भारत बहुत बड़े एजुकेशन हब के रूप में उभर रहा है। वैसे यह भी तय नहीं है कि आंकड़े हमेशा पूरी कहानी बयां कर देते हैं।
खास मानदंड
पिछले साल मार्च तक 8,979 स्कूल सीबीएसई से मान्यता प्राप्त किए हुए हैं। इसमें विदेशों में स्थित स्कूल भी शामिल हैं। दूसरी ओर दत्त के मुताबिक ‘विशेष मानदंडों वाले’ केवल 100 से 200 स्कूल हैं जिनमें से प्रत्येक में लगभग 500 छात्र पढ़ते हैं। इनमें से लगभग 10 फीसदी विदेशी ही होते हैं। मसूरी के ‘वुडस्टॉक’ में ही नहीं, गुड़गांव के ‘पाथवेज’ और पुणे के ‘महिंद्रा यूनाइटेड वर्ल्ड कॉलेज इंडिया’ में भी काफी संख्या में विदेशी छात्र पढ़ते हैं। लेकिन अब दूसरे स्कूलों में भी विदेशी छात्रों की तादाद तेजी से बढ़ रही है।
दत्त का कहना है कि इस साल 70 से 80 इस तरह के और स्कूल खुलने जा रहे हैं। इस तरह के स्कूल बनाने के लिए 25 से 30 एकड़ जमीन की जरूरत होती है और इसके अलावा तीन साल का ‘जेस्टेशन पीरियड’ भी चाहिए। इस तरह के स्कूलों की सालाना वृद्धि तकरीबन 15 फीसदी है। इन स्कूलों ने खुद पिछले कुछ साल में विदेशी छात्रों की बढ़ती संख्या की बात कही है। तमिलनाडु के क्रिश्चियन बहुसंस्कृतिक आवासीय विद्यालय ‘कोडईकनाल इंटरनेशनल’ में हमेशा से अमेरिकी छात्रों की अच्छी खासी संख्या रही है, लेकिन इस साल डीन सैम बालचंद्रा हैरान हैं।
उनका कहना है ‘ अब यूरोपीय छात्र बड़ी संख्या में आ रहे हैं, इसका कारण यह हो सकता है कि हमारे छात्र बढ़िया आई बी रिजल्ट के साथ यूरोप गए हैं’। कुछ ऐसे भी हिस्से जिसमें कुछ ज्यादा तेजी देखने को मिल रही है, खासतौर पर एशिया प्रशांत क्षेत्र और कोरिया के क्षेत्रों से छात्र आ रहे है। बालचंद्र का कहना है, ‘हमारे यहां 10-15 छात्र कोरिया से होते हैं लेकिन इस साल हमारे यहां पहले से ही 20 छात्र हैं।’ भारत में ‘न्यू स्कूल’ मूवमेंट की शुरूआत करने का श्रेय कंसल्टेंट गुलाब रामचंदानी को दिया जा सकता है।
उन्होंने स्कूलों को एक नया रूप दिया मसलन असम से लेकर कपूरथला के बावा लालवानी पब्लिक स्कूल और बेंगलुरु के जैन इंटरनेशनल तक। रामचंदानी कहते हैं, ‘ मध्यपूर्व का एक अच्छा बाजार था वहां के स्कूल छात्रों को आकर्षित करने के लिए एजुकेशनल फेयर आयोजित कराते थे। हालांकि यह अब खत्म हो गया है। क्योंकि अब इन देशों में भी बेहतर स्कू ल हैं।’ उनका कहना है कि यहां हमेशा नेपाल, थाईलैंड और सार्क देशों से विदेशी छात्र आते थे। हालांकि, यहां कोरियाई छात्रों की संख्या बढ़ रही है जो किसी न किसी तरह की समस्या तो पैदा कर ही देते हैं।
अंग्रेजी का क्रेज
आजकल भारतीय बोर्डिंग और एलीट स्कूलों में कोरिया, जापान, इंडोनेशिया और मलेशिया के छात्र आ रहे हैं। इसकी एक खास वजह यहां के स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाई होती है। अजमेर में मेयो कॉलेज के प्रिंसिपल प्रमोद शर्मा हंसते हुए कहते हैं, ‘कहां अंग्रेजी सही तरीके से बोली जाती है? यूएस और यूके में तो नहीं ही।’
हाल के दिनों में उन्होंने कई कोरियाई छात्रों से बात की है लेकिन उनका जोर इस बात पर है कि यहां की उपलब्ध सीटों पर भारतीय छात्र और सार्क देशों के छात्रों का नामांकन ही होगा। शर्मा का कहना है कि इन देशों से छात्रों के आने की वजह यहां अंग्रेजी की पढ़ाई ही है। इस वजह से हिंदुस्तानी अभिभावक बच्चों को भारतीय स्कूलों में भेजने से नहीं हिचकिचाते। दक्षिण कोरिया के प्राइमरी और सेकेंडरी स्तर के छात्र टॉफल परीक्षा में शामिल होते हैं इसकी वजह यह है कि उन छात्रों को हाईस्कूल और विदेश के विश्वविद्यालयों में जाने के लिए के लिए यह परीक्षा पास करनी जरूरी होती है। इसी लिए भारतीय स्कूलों की मांग मध्यवर्ग में बढ़ रही है।
पैसे बनाने का मौका
शर्मा का कहना है, ‘यहां पैसे बनाने का बहुत मौका है। यहां एडमिशन के लिए विदेशी छात्रों के बहुत सारे ईमेल आते रहते हैं। यहां सामान्य तौर पर हर एक बच्चे के लिए 1.3 लाख रुपये लिए जाते हैं, वहीं विदेशी लोग एक बच्चे के लिए 2.5 लाख रुपये देने के लिए तैयार तो होते ही हैं। जो भी एडमिशन कराता है उसे ये लोग 50,000 रुपये कमीशन भी देते हैं।’
अमेरिका और ब्रिटेन के अंतरराष्ट्रीय स्कूलों में अतिरिक्त चार्ज लिया जाता है जो हमारे देश के प्राइवेट स्कूलों के मुकाबले कहीं ज्यादा होता है। इसी वजह विदेशी छात्रों के लिए यहां के स्कूलों में शिक्षा पाना ज्यादा सस्ता होता है। भारत के प्राइवेट स्कूलों में अब आईबी मान्यता प्राप्त करना एक ट्रेंड बन गया है।पुणे में भी पहले से ही मर्सिडीज बेंज इंटरनेशनल स्कूल और महिन्द्रा यूनाइटेड वर्ल्ड कॉलेज ही ऐसे थे जिन्हें आईबी स्कूल की मान्यता मिली हुई है।
पिछले दो सालों में कम से कम पांच नए स्कूल इसमें शामिल होने वाले हैं। हालांकि दून स्कूल तो अगस्त 2006 से ही आईबी वर्ल्ड स्कूल बन चुका है। ये संस्थान एलीट क्लास का प्रतीक बन चुके हैं। इनको मान्यता मिलने के बाद अंतरराष्ट्रीय जगत के छात्रों का आकर्षण यहां के लिए बढ़ जाता है। हालांकि अगर ऐसा नहीं भी हो तो भी शैक्षणिक जगत से जुड़े लोग भारतीय शिक्षा व्यवस्था को विश्व में सबसे बेहतर बताने से नहीं चूकते। उनके मुताबिक यहां के स्कूल पूर्वी देशों की संस्कृति का प्रतीक तो हैं ही।
इसके अलावा यहां छात्रों के लिए फाइव स्टार सुविधाओं के साथ आधुनिक शिक्षण व्यवस्था भी मुहैया कराई जाती है। इसी खासियत की वजह से छात्र और उनके अभिभावक सांस्कृतिक रूप से रूढिवादी होते हुए भी इसकी काफी प्रशंसा करते हैं। लोटस वैली में पढ़ने वाले आठ साल की कोरियाई छात्र हुई-जियांग-जिम इस बात से शायद जरूर सहमत होगी। वह चार सालों से यहां के स्कूल में पढ़ रही है और वह भारतीय तरीके से ही अंग्रेजी बोलती है। उसे अपने क्लास के दोस्तों में जो खास बात नजर आती थी वह यह थी कि वे बुजुर्गों को वैसे ही सम्मान देते हैं जैसे कि वे लोग देते हैं।
कोडइकनाल के डीन बालचंद्र का कहना है कि कोरियाई छात्रों के साथ एक बड़ी समस्या है कि वे यहां के छात्रों के साथ वे अपने को जोड़ नहीं पाते। उनके माता पिता भी जोर देते हैं कि वे अलग रहें और दूसरे लोगों के साथ न रहें। शिक्षकों का कहना है कि एशियाई संस्कृति से संबंध रखने वाले छात्र सामान्य तौर पर काफी मेहनती होते हैं और लोगों से थोड़े अलग भी होते हैं। हालांकि, पश्चिमी देशों के छात्रों के साथ यह समस्या नहीं होती लेकिन दूसरी परेशानियों से उन्हें रूबरू तो होना ही पड़ता है।
एमआईआईटी विश्वशांति गुरुकुल में केवल शाकाहारी भोजन दिया जाता है। एडमिशन हेड विलियम फर्नांडीस बताते हैं, ‘हमें कई बार छात्रों और उनके माता पिता को शाकाहारी खाने के बारे में सलाह देनी पड़ती है। हमने पैरेंट्स के लिए भी कैंपस में फूड टेस्टिंग का सत्र भी चलाया है।’ यहां कई काउंसलर भी विदेशी छात्रों को साथी छात्रों के साथ तालमेल बिठाने में मदद करते हैं। भारत के इस सुंदर दृश्य को देखकर इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि यह भी एक शिक्षा है।
(साथ में प्रियंका जोशी भी)