इन दिनों चैनलों पर एक विज्ञापन दिखाया जाता है जिसमें एक महिला घर लौटती है तो देखती है कि उसका पति बालकनी में निश्चल बैठा है ।
उसे अनिष्ट की आशंका होती है पर उसे यह देखकर तब राहत मिलती है कि वह आराम कर रहा है। अंत में विज्ञापन इस संदेश के साथ खत्म होता है कि अनिष्ट कभी भी हो सकता है।
मोबाइल फोन के एक विज्ञापन में एक पिता अपने किशोर बच्चे को डांट रहा होता है। पर वह किशोर फोन पर खामोशी के साथ संगीत सुनते हुए पिता को अनसुना कर देता है। मोबाइल सेवा के एक विज्ञापन में एक तरुणी अपने ब्वॉय फ्रेंड के साथ पिकनिक पर जाने के लिए माता-पिता की इजाजत लेती है पर उन्हें झांसा देकर। वह अपने मां-बाप को यह आभास भी कराती है कि वह गलत रास्ते पर भी जा सकती है।
ये तीनों विज्ञापन काफी दिलचस्प हैं और आदमी इन पर टिके रहता है। पहला जहां उकसाता है, वहीं दूसरा आकर्षक और मनोरंजक है। जीवन बीमा का विज्ञापन किसी अनहोनी की सूरत में उत्पाद-सुरक्षा की सबसे बुनियादी जरूरत को छूता है।
हममें से ज्यादातर लोगों का युवावस्था में निजी तौर पर जो अनुभव रहा है उसकी इन मोबाइल विज्ञापनों में झलक मिलती है। यानी मां-बाप को भी अब ज्यादा स्मार्ट बनना होगा। वे ही असली हैं। ये बताते हैं कि इन किसी भी बहानों में खासतौर पर कुछ भी गलत नहीं है। इन विज्ञापनों के दर्शकों पर होने वाले असर या इनकी बिक्री के लिए हम कोई फैसला नहीं दे रहे। पर इनसे एक बड़ा सवाल पैदा होता है कि क्या भारतीय समाज ऐसी सचाई के लिए तैयार है।
पिछले दशक में भारतीय समाज में काफी दिलचस्प बदलाव आए हैं। अहंवादी, पारंपरिक, विनम्र, संतुष्ट, गैर-भौतिकतावादी, आदर्शवादी, परिवारोन्मुखी और भावुक भारतीय के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है। साथ ही, यह भी कि नया भारतीय आशावादी, विश्वस्त, कुछ भी कर सकने की भावना से परिपूर्ण, प्रतिस्पर्धी और आत्ममुग्ध उपभोक्ता है। पर इसके साथ-साथ दो अन्य अहम बदलाव और आए हैं।
और ये बदलाव उस बाह्य पश्चिमी सांस्कृतिक हमले से परे हैं जो 90 के दशक में आए और जिन पर मीडिया ने काफी चर्चा की। पहला , नए भारतीय ने समाज में असुरक्षा को जन्म दिया है। निजी स्तर पर स्कूल से लेकर कालेज तक और काम के स्थल तक परिवार और परिजनों तथा संगियों का कुछ कर दिखाने का आला दर्जे का ऐसा दबाव पड़ा है जो पहले कभी नहीं था।
एकल परिवारों के उभार तथा कामकाजी मां-बाप के कारण परिवार से संपर्क की डोर कमजोर पड़ी है। अब बच्चों (यहां तक कि बड़ों ) की भावनाओं के ज्वार में उनकी मदद करने वाले कम लोग रह गए हैं। नतीजे में मनोवैज्ञानिक अकेलापन बढ़ा है। साठ और सत्तर के दशक में राष्ट्र के रुप में भारत को अपने शत्रुओं का पता था। पर आज आतंकवाद बढ़ने के कारण यह नहीं पता कि शत्रु कौन है- वह कहीं भी हो सकता है, आपके पड़ोस में भी।
यह विडंबना है कि हम बात तो ज्यादा भरोसे वाली पीढ़ी क़ी करते हैं पर शोधों से जाहिर हुआ है कि मां-बाप आज अपने बच्चों को आजादी देने को लेकर आशंकित रहते हैं। बच्चे स्कूल जाएं या टयूटोरियल क्लास या फिर वोकेशनल ट्रेनिंग के लिए, मोबाइल उनसे संपर्क का साधन बन गया है। यह ऐसी बात है जिसकी पुरानी पीढ़ियां शायद ही चिंता करती थीं। भारत (और शायद दुनिया भी) आज सबसे ज्यादा असुरक्षित जगह बन गया है।
नए भारतीय में दूसरी बात आक्रामकता है। जब आक्रामक ऊर्जा बेहतरी या वास्तव में नई चीज के लिए हो तो यह सकारात्मक है। पर इसका स्याह पहलू भी है। स्कूलों में गोली-चालन, शिक्षित लोगों के बीच इंतकाम और हत्या की घटनाएं इस नई किस्म की आक्रामकता की झलक है। यह भावनाओं के उफान से बुध्दिमता और परिपक्व तरीके से नहीं निपट पाने की सामाजिक असमर्थता का नतीजा है।
आईपीएल के दौरान श्रीशांत को हरभजन के थप्पड़ मारने की घटना कुछ को भले ही विस्मयकारी लगे या दूसरों को महज खेल आक्रामकता का वमन, पर यह भी आक्रामक भारतीय का स्याह पहलू है। इस पर अभी बहस मुबाहिसा जारी है। साथ ही कौशल विकास और मनोवैज्ञानिक तैयारियों के अलावा इस बात पर भी चर्चा चल रही है कि क्रिकेटर कैसे मैदान में अपनी भावनाओं पर काबू करें, इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण की जरूरत है।
यह इस बात की स्वीकृति है कि जिस नए भारतीय पर हमें इतना गर्व है, उसे सुधारने की जरूरत है। मीडिया की बढ़ोतरी ने इस ‘असुरक्षा’ और विशाल ‘आक्रामकता’ को जटिल ही बनाया है। टीआरपी की होड़ के कारण हिंसक वारदात, जो कि अक्सर जघन्य होती हैं, के ग्राफिक चित्रण में वृद्धि हुई है। इससे अनिश्चितता की भावना बढ़ी है। इसलिए यह आसानी से कहा जा सकता है कि मीडिया लोगों को वही परोस रहा है जो वे चाहते हैं।
असली सच्चाई यह है कि लोग भले ही दिखाए जाने पर तटस्थ होकर इसका मजा लें, पर असलियत में वे कलुषित प्रकृति के नहीं हैं। वे खूनी ब्यौरा नहीं जानना चाहते। सकारात्मक खबरें आम दर्शक को उतनी ही खींचती हैं जितनी नकारात्मक। इस तरह के मीडिया कवरेज से जहां इंसाफ दिलाने में मदद मिलती है वहीं समाज में इससे मनोरोग फैलता है।
अर्थशास्त्र समाज और संस्कृति पर हावी हो रहा है। नए विश्व में कंपनियां नई सरकार, मार्गदर्शक समाज हैं जो अपने उत्पादों और संदेशों से इसे आकार दे रही हैं। व्यापारों और ब्रांडों को संवेदनशील होना पड़ेगा, क्योंकि समाज में उनकी बड़ी भूमिका है। सामाजिक प्रभावों का यह आकलन किए जाने की जरूरत है, चाहे वे मीडिया संपादकीय या विज्ञापनी संदेशों में हों, कि क्या वे महज व्यावसायिक होने के बजाय प्रोत्साहनकारी भूमिका निभा सकते हैं।
साथ ही साथ ये स्थिति ब्रांडों-मीडिया या उत्पाद- को विज्ञापक की भूमिका अपनाने का अवसर उपलब्ध कराती है। हाल में चेन्नई सुपर किंग्स और किंग्स11 पंजाब के बीच खेले गए आईपीएल सेमी-फाइनल में कुमार संगकारा इसलिए चल दिए क्योंकि उन्होंने सोचा कि वे आउट हो गए हैं। हालांकि अम्पायर ने अपनी उंगली नहीं उठाई थी। यह बड़ी खेल भावना थी, फिर भी ऐसे कई युवक थे जिन्होंने कहा कि संगकारा मूर्ख थे और उन्हें खेल भावना दिखाने के बजाय खेलते रहना चाहिए था।
ऐसे भी मौके आते हैं जब वे गलत फैसले के शिकार होते हैं तो ऐसे में यह उनके लिए भाग्यशाली मौका था। यह घटना भले ही छोटी हो, पर यह आज के समय का प्रतिबिंब है। जाहिर है, लंबे अरसे में भारतीय संस्कृति और मूल्य इस बदलाव से गुजर जाएंगे। हालांकि समाज पर प्रभाव डालने वालों को भारतीय संस्कृति का खयाल रखते हुए नई पीढ़ियों को लगातार जागरुक करना होगा।