विनिवेश को लेकर केंद्र सरकार को अपने रुख की समीक्षा करनी चाहिए। बीते वर्षों के दौरान इसका इस्तेमाल राजकोषीय घाटा कम करने के उपाय के रूप में किया गया था, हालांकि सरकार अक्सर बजट में उल्लिखित लक्ष्य हासिल करने में विफल रही थी। यहां तक कि चालू वित्त वर्ष के दौरान भी सरकार अब तक तय लक्ष्य की आधी राशि भी नहीं जुटा पाई है। फिर भी वह निश्चिंत है कि वह सकल घरेलू उत्पाद के 6.4 फीसदी के बराबर का राजकोषीय घाटा लक्ष्य पा सकेगी क्योंकि कर राजस्व के मोर्चे पर उसकी स्थिति अच्छी है।
उच्च मुद्रास्फीति के कारण अनुमान से ऊंची नॉमिनल वृद्धि अर्थव्यवस्था के आकार को बढ़ाएगी और काफी ऊंचे खर्च के बावजूद घाटे को नियंत्रित रखने में मदद करेगी। चूंकि बजट का दबाव इस वर्ष अपेक्षाकृत कम है इसलिए यह विनिवेश प्रक्रिया पर ध्यान देने के लिहाज से अच्छा समय है। विनिवेश एवं सार्वजनिक परिसंपत्ति प्रबंधन सचिव तुहिन कांत पांडेय ने इस विषय में जो सुझाव दिए हैं वे उपयोगी साबित हो सकते हैं।
गत सप्ताह इस समाचार पत्र के साथ एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ‘हमें टॉप डाउन नहीं बल्कि बॉटम अप एप्रोच की आवश्यकता है।’ यानी बिना ब्योरों में गए ऊपरी स्तर पर नीति बनाने के बजाय हमें छोटी-छोटी बातों के साथ आगे जटिल योजनाओं की ओर बढ़ना है। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि बाजार की हकीकत निरंतर बदलती रहती है इसलिए किसी एक आंकड़े को लक्ष्य बनाकर नहीं रहा जा सकता।
उनके इन तर्कों में काफी दम है और सरकार में इन पर चर्चा की जानी चाहिए। राजकोषीय घाटे को सीमित रखने के लिए विनिवेश पर निर्भरता समाप्त होनी चाहिए। सरकार को विनिवेश कार्यक्रम का इस्तेमाल अधिक व्यापक लक्ष्यों को हासिल करने के लिए करना चाहिए। उदाहरण के लिए ऐसी कोई वजह नहीं है कि सरकार इतनी सारी कंपनियों में अपना निवेश बनाए रखे और वह भी तब जब उनमें से अनेक घाटे वाली हैं। सरकार ने इस दिशा में स्पष्ट सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति बनाकर अच्छा किया है। इस नीति में कहा गया है कि नीतिगत क्षेत्रों में सरकारी कंपनियों की बहुत सीमित उपस्थिति रहेगी।
चूंकि सरकार का अन्य क्षेत्रों से बाहर निकलने का उचित इरादा है इसलिए उसे अधिक व्यवस्थित रुख अपनाना चाहिए। वर्ष के लिए लक्ष्य तय करने के बाद कंपनियों में विनिवेश करने की कोशिश करने से मदद नहीं मिलेगी। बल्कि सरकार के पास उन कंपनियों की एक सूची होनी चाहिए जिनमें वह विनिवेश करना चाहती है। ऐसी सूची होने से न केवल संबंधित विभागों के पास स्पष्टता रहेगी बल्कि बाजारों के पास भी ऐसा अवसर होगा कि वे इन कंपनियों के शेयर खरीदने की तैयारी कर सकें।
इससे प्राप्त राशि का इस्तेमाल अहम बुनियादी परियोजनाओं को वित्तीय सहायता मुहैया कराने में किया जा सकता है। बाजार के हालात और विनिवेश की जा रही कंपनियों की गुणवत्ता के मुताबिक आने वाला राजस्व अलग-अलग वर्षों में काफी अलग-अलग हो सकता है। ऐसे में सरकार विनिवेश प्रक्रिया के साथ और उसके बिना राजकोषीय घाटे के आंकड़े दिखा सकती है। विश्लेषण के लक्ष्यों की बात करें तो बिना विनिवेश के आंकड़े वाले लक्ष्य का इस्तेमाल किया जा सकता है।
चूंकि प्राप्तियों के अस्थिर होने की संभावना रहती है इसलिए एक ऐसी प्रणाली स्थापित की जा सकती है ताकि चयनित परियोजनाओं में निवेश किया जा सके। बजट की मांग की प्रकृति के अनुसार विनिवेश से पूंजीगत व्यय के समायोजन में मदद मिल सकती है जिससे अर्थव्यवस्था की वृद्धि संभावना बढ़ेगी।
वैश्विक आर्थिक संभावनाओं के मंद होने की स्थिति में यह संभव है कि भारत की वृद्धि काफी हद तक सरकारी व्यय पर निर्भर करेगी। बहरहाल, चूंकि सरकार को आने वाले वर्षों में राजकोषीय घाटे को कम करना है तो ऐसे में विनिवेश से पूंजीगत व्यय को एक स्तर पर बरकरार रखने में मदद मिल सकती है। व्यापक तौर पर देखा जाए तो यह स्पष्ट है कि विनिवेश कार्यक्रम अपने मौजूदा स्वरूप में वांछित परिणाम नहीं दे पा रहा है। इसे लेकर एक अलहदा रुख अपनाने की आवश्यकता है।