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एनजीओ पर भी चला सीलिंग का चाबुक

Last Updated- December 06, 2022 | 11:04 PM IST

कल तक दूसरे के अधिकारों के लिए लड़ने वाली दिल्ली की गैर सरकारी संस्थाएं (एनजीओ) आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं।


क्या कहा, मामला कुछ समझ में नहीं आया? दरअसल हुआ यह कि इस महीने की छह तारीख को कई एनजीओ के नई दिल्ली में स्थित दफ्तरों को सील कर दिया गया। वजह यह है कि सिटी प्लानरों ने एनजीओ को इस शहर का हिस्सा माना ही नहीं। और तो और, उन्होंने रिहाइशी इलाकों से चल रहे एनजीओ को भी शहर का हिस्सा नहीं माना।


तो फिलहाल हालत यह है कि इन सभी 12 एनजीओ के दफ्तर जुलाई तक सील रहेंगे, जब तक यह मुद्दा सुप्रीम कोर्ट के सामने नहीं आता। इस बीच कई दूसरे एनजीओ के ऊपर भी सीलिंग की तलवार लटक रही है क्योंकि अदालत ने 50 गैर सरकारी संस्थाओं की इस सीलिंग ड्राइव पर अंतरिम रोक लगाने की अपील को ठुकरा दिया।


दिल्ली नगर निगम (एमसीडी) ने दक्षिण दिल्ली के पॉश इलाकों जैसे वसंत कुंज, मालवीय नगर और ग्रेटर कैलाश में स्थित नवदान, एसओएस चिल्ड्रेंस विलेज और वाइल्डलाइफ सोसाइटी ऑफ इंडिया के दफ्तरों को सील कर रखा है। इस वजह से इन संस्थाओं को बिना दफ्तरों के ही काम करना पड़ रहा है।


‘जागोरी’ की कल्याणी मेनन सेन का कहना है कि, ‘जब तक मास्टरप्लान में तब्दीली नहीं की गई थी, तब तक तो सबकुछ ठीकठाक ही चल रहा था। एमसीडी ने इससे पहले जो एनीजीओ जहां हैं, वहां से काम करते रहने की कुछ वक्त के लिए इजाजत दे दी थी। इस वजह से हमें सीलिंग से छूट मिल गई थी। ज्यादातर एनजीओ तो सरकारी योजनाओं को ही अमली जामा पहनाने में मदद करती हैं।


इसके साथ-साथ दूसरी एजेंसियों के लिए समाज सेवा का काम भी करती हैं।’ ‘जागोरी’ एनजीओ के खिलाफ चल रही इस सीलिंग ड्राइव के लिए कोर्ट में अपील करने वाली संस्थाओं में से एक है।  इन गैर सरकारी संस्थाओं ने एमसीडी के इस कदम के खिलाफ केंद्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी और शहरी विकास राज्यमंत्री अजय माकन से गुहार लगाई है।


उनका अनुरोध है कि उन्हें गैर संस्थागत इलाकों से काम करने की इजाजत दी जाए। साथ ही, वे इस बारे में दिल्ली मास्टर प्लान में बकायदा प्रावधान शामिल किया जाए। शहरी विकास मंत्रालय को लिखे एक पत्र में इन गैर सरकारी संस्थाओं ने कहा है कि, ‘दिल्ली में भी दूसरे शहरों की तरह ज्यादातर एनजीओ गैर संस्थागत इलाकों से काम करते हैं, ताकि लोगों को जरूरी सुविधाएं मुहैया कराईं जा सकें।


ये संस्थाएं दिल्ली की गरीब जनता को शिक्षा, स्वास्थ्य और दूसरी सामाजिक सुविधाएं मुहैया करवाती हैं। साथ ही, ये संकट में फंसे लोगों की भी मदद करती हैं। इनमें से कई लोग सस्ते मकानों की कमी की वजह से गैरकानूनी बस्तियों में रहते हैं।’ सेन के मुताबिक उनकी सारी उम्मीदें अब शहरी विकास मंत्रालय से ही जुड़ी हुई हैं। उनका कहना है कि बातचीत के दौरान जयपाल रेड्डी ने उनकी गैर संस्थागत इलाकों से काम करते रहने देने की मांग को काफी गौर से सुना। 


एमसीडी ने मास्टरप्लान में तब्दीली करने से पहले गैर सरकारी संस्थाओं को छूट दे रखी थी। सुप्रीम कोर्ट की सीलिंग पर नजर रखने के लिए बनाई गई कमिटी ने 2006 में कहा था कि ये संस्थाएं सीलिंग के तहत आएंगी, भले ही वे रिहाइशी इलाकों से ही क्यों न चल रही हों।


इस आदेश को सितंबर 2006 में एमसीडी ने अपने जोनल कमिश्नरों को सर्कुलर जारी कर इसे अधिसूचित कर दिया था। इसके बाद यूएसएड ने 2, पूर्वी मार्ग, वसंत विहार के अपने एक दफ्तर पर से सीलिंग हटाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की इस कमिटी के सामने अपील दाखिल की। सेन के मुताबिक अब कमिटी के उस आदेश का कोई तुक नहीं रह गया है क्योंकि वह अतरिंम था।


प्रोग्राम फॉर सोशल एक्शन नाम एक एनजीओ के एक प्रतिनिधि ने बताया कि, ‘आज की तारीख में दिल्ली में ज्यादातर एनजीओ, ट्रस्ट और सोसाइटी तो गैर संस्थागत इलाकों या रिहाइशी इलाकों से चल रहे हैं। हम लोगों के पास ज्यादा च्वाइस भी तो नहीं है। दरअसल, ऐसे जगहों की तादाद भी काफी कम है।


जो जगहें हैं, उनकी की कीमतें भी आसमान छू रही हैं। वो हमारी पहुंच में बिल्कुल भी नहीं है क्योंकि हमारे पास वैसे ही पैसों का असर अभाव रहता है।’ एनजीओ ने इस सीलिंग को दिल्ली सरकार के नागरिक-सरकार साझीदार प्रोजेक्ट, ‘भागीदार’ के भावना के खिलाफ बताया है।

First Published - May 13, 2008 | 10:48 PM IST

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