केंद्र में सत्तासीन यूपीए सरकार की झोली में ढेरों उपलब्धियां हैं। मसलन राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी एक्ट, सूचना का अधिकार अधिनियम।
अगर सब कुछ सही चलता है तो महिला आरक्षण विधेयक लागू करने का श्रेय भी सरकार को मिल जाएगा। इसके अलावा असंगठित क्षेत्र सामाजिक सुरक्षा अधिनियम पर भी विचार चल रहा है। अगर संसद की स्थायी समिति के सुझावों को मान लिया जाता है, तो इसे भी कानूनी जामा पहनाया जा सकता है।
इसी कड़ी में भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास अधिनियम भी आता है, जिसमें भूमि संबंधी नीतियों के सुधार और पूर्ववर्ती सरकारों की गलतियों को उजागर किया गया है। लेकिन अगर सरकार चरमपंथ प्रभावित क्षेत्र के विकास की चुनौतियों के बारे में योजना आयोग के विशेषज्ञों द्वारा दी गई संस्तुतियों को अमल में लाती है, तो यह सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
रिपोर्ट में पूरी ईमानदारी बरती गई है और उसके बहुत ही तीखे शब्दों में हकीकत का बयान किया गया है। उसमें स्पष्ट किया गया है कि स्वतंत्रता के 60 सालों में सरकार ने क्या क्या गलतियां कीं जिसकी वजह से देश भर के तमाम जिलों में नक्सलवाद की जड़ें मजबूत होती गईं।
इसमें सरकार से कहा गया है कि सरकार को हर तरह की क्षतिपूर्ति करनी चाहिए और हर तरह की पहल करनी चाहिए जिसमें नक्सलवादियों से बातचीत भी शामिल है, ”जिससे पिछली गलतियों को सुधारा जा सके।”
इस समूह का गठन मई 2006 में असंतोष, अशांति और चरमपंथ पर विचार करने के लिए किया गया था। समूह में डॉ. ई.ए.एस शर्मा, डॉ. एन. जे. कुरियन, के. बी. सक्सेना, एस. आर. शंकरन, डॉ. सुखदेव थोराट, डॉ. बेला भाटिया, के. बालगोपाल, डॉ. संतोष मेहरोत्रा और रुपिंदर सिंह समेत 16 सदस्य शामिल किए गए थे।
रिपोर्ट में कहा गया है कि पंचायत व्यवस्था को मजबूत न किया जाना प्रमुख भूल रही है, जिसके चलते आदिवासी इलाके विकास से दूर होते चले गए। पंचायत एक्ट के विस्तार का प्रावधान (पीईएसए) को इन इलाकों में आंशिक रूप से ही लागू किया गया। इसमें राज्य सरकारों की उस प्रवृत्ति के बारे में भी कहा गया है, जिसमें सरकारें पंचायतों को अधिकार नहीं देना चाहती हैं।
हकीकत यह है कि 125 जिलों में सरकार का कोई कानून नहीं चल रहा है, जो नक्सल प्रभावित इलाके कहे जाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि राज्य की ब्यूरोक्रेसी वहां सुशासन देने में विफल रही है। इसलिए पंचायती राज ही एकमात्र विकल्प है, जो उन इलाकों में कानून व्यवस्था को फिर से पटरी पर ला सकता है। यह भी प्रतीत होता है कि देश के 9 प्रतिशत विकास दर के आंकड़े इन इलाकों में कहीं भी नहीं पहुंच सके हैं।
यहां तक कि सरकारी कोशिशों से भी विकास की खांई पटने के बजाय और गहरी ही हुई है। इसमें कहा गया है, ‘हम शिक्षा के क्षेत्र में, स्वास्थ्य के क्षेत्र में और आवागमन तथा मकानों के लिहाज से दो अलग अलग दुनिया पाते हैं।’
इसमें इस तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाया गया है कि खदान वाले इलाकों में तमाम तरह के विवाद पैदा हो रहे हैं। इसकी प्रमुख वजह यह है कि नई नई इस्पात कंपनियां तो खनिज पदार्थों का दोहन कर लाभ कमा रही हैं लेकिन उन इलाकों के लोगों को इसमें कहीं से हिस्सेदार नहीं बनाया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है, ‘यहां तक कि जो लोग नक्सल आंदोलन के बारे में थोड़ा भी जानते हैं, वे इससे वाकिफ हैं कि इसका प्रमुख नारा है कि ‘जोतने वाले की ही हो जमीन’ है।
इसकी पूरी शोहरत का आधार ही यही है कि गरीबों को जमीन मिले।’ इस परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखते हुए रिपोर्ट में विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के निर्माण पर ही सवाल उठाया गया है। यह कहा गया है, ‘सेज का गठन इससे नहीं जुडा है कि वह कृषि भूमि पर बनाया जा रहा है या गैर कृषि भूमि पर। मसला यह है कि यह सीधे-सीधे रोजी-रोटी पर हमला है।’
इसमें यह भी इंगित किया गया है कि इससे आदिवासी और ग्रामीण इलाकों के रहन सहन और जीवन में हस्तक्षेप हो रहा है। ग्रामीण इलाकों की सामूहिक संपत्ति स्रोतों पर हमला हो रहा है, जिससे सामान्य रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था चलती है और जो ग्रामीण क्षेत्रों के स्थानीय समुदाय के जीवन का आधार है।
इसमें कहा गया है कि निजीकरण से लोगों के बीच की दूरियां बढ़ी हैं। निजी फार्म हाउसों, जबरन कब्जा और सरकारों की विभाजनकारी राजनीति के चलते आक्रोश बढ़ रहा है और इससे नक्सलवाद की जड़ें गहरी हो रही हैं।
नक्सली मुद्दों पर लिखने वाली नंदिनी सुंदर, जो खुद एक शिक्षिका और इन मामलों की जानकार हैं, का कहना है कि यह एक बेहतरीन रिपोर्ट है, जिसमें पूरे मामले को उसी तरह देखा गया है, जैसा कि वास्तव में है। वे इस सलाह का स्वागत करती हैं कि नक्सलवादियों से बातचीत की जानी चाहिए। वह जानना चाहती हैं कि अगर नेपाल में सफलता मिली है तो भारत के माओवादियों के मामले में ऐसा क्यों नहीं हो सकता है।