कुछ साल पहले जब कभी हमारा गणतंत्र राजनीतिक और नीतिगत त्रासदी से बाल बाल बचा करता था, तब हमारे तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह हल्के से मुस्करा देते थे।
वह कहा करते थे कि ‘ भगवान ही इस देश की देखभाल करता है।’ हालांकि यह कहना ज्यादा उचित होता कि, ‘भगवान और कुछ अच्छे लोग’। मेरा मानना है कि पिछले 15 साल में कुछ समर्पित, योग्य और परिश्रमी नौकरशाहों ने कुछ गलत निर्णयों से बचाने का काम किया और लोक नीति को सही पटरी पर ले आए।
यह सही है कि उन्हें प्रशासन को चुस्त-दुरुस्त करने और हर चीज को पटरी पर लाने में पूरी तरह से सफलता नहीं मिली। लेकिन अगर उनकी सफलता दर का आकलन करें तो इन मुट्ठी भर अधिकारियों की संख्या को देखते हुए विपरीत परिस्थितियों में इसे शानदार उपलब्धि कहा जा सकता है।
इसमें मनमोहन सिंह की खुद की कोशिशों से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। दो दशकों से कम समय में उन्होंने दो बार ऐसे साहसिक कदम उठाए, जिसने भारत के इतिहास को बदलने में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा की। वित्त मंत्री के रूप में 1990 की शुरुआत में उन्होंने भारत की आर्थिक नीतियों में क्रांतिकारी बदलाव किए।
इसने देश की अर्थव्यवस्था में खासा बदलाव किया और आर्थिक बदलाव के पिछले 17 साल के दौर में भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीतिक चर्चा के केंद्र में आ गया। अब पिछले 3 महीनों में उनकी कोशिशों के परिणामस्वरूप परमाणु समझौते के करीब पहुंचा जा सका है, जिससे भारत पर लगा 34 साल पुराना प्रतिबंध खत्म होने तथा नाभिकीय और तकनीकी अलगाव दूर होने के आसार बने हैं।
करीब सभी लोगों की इस समझौते को लेकर उम्मीदें धूमिल पड़ने लगी थीं क्योंकि एक साल पहले जिस तरह का माहौल था, कांग्रेस नेतृत्व कुछ कर पाने में सक्षम नहीं लग रहा था। उसे मध्यावधि चुनाव का भय था, क्योंकि विपक्ष के साथ सरकार का सहयोग कर रहे वामपंथी दल भी इस समझौते का पुरजोर विरोध कर रहे थे।
उस समय इस मसले पर चर्चा करने वाले ज्यादातर लोग, जिसमें मैं भी शामिल था, यह उम्मीद कर रहे थे कि इस तरह से सार्वजनिक अपमान से दुखी होकर प्रधानमंत्री इस्तीफा दे सकते हैं। जहां तक मेरी बात है, मुझे परमाणु मसले पर कोई उम्मीद नहीं थी। लेकिन सिंह ने न केवल शक्तिहीन दिख रहे कार्यालय की ताकत दिखाई बल्कि भारतीय परंपरा के मुताबिक काम भी किया।
उन्होंने इस डील को जिंदा रखा, साथ ही समाजवादी पार्टी (सपा) से समझौता करके सरकार भी बचा ली। उत्तर प्रदेश में हुए चुनावों के बाद से ही इस तरह के सहयोगी की दरकार थी और वामपंथी दलों का साथ छोड़ने का बड़ा जोखिम उठाते हुए जुलाई के अंतिम सप्ताह में संसद में विश्वास प्रस्ताव हासिल कर लिया।
उन्होंने न केवल जुलाई में संसद में जीत हासिल की, बल्कि पिछले सप्ताह वियना में परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(एनएसजी) की सहमति पाकर एक और जीत हासिल की। यह सही है कि इस पूरे मसौदे के पीछे तमाम लोगों का दिमाग और मेहनत लगी थी। इसमें राजनीतिक लोग भी थे, जिसमें सोनिया गांधी, कांग्रेस के राजनीतिक प्रबंधक, समाजवादी पार्टी नेतृत्व और अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश की अहम भूमिका थी।
इसके अलावा बातचीत करने वाली एक भारतीय टीम भी थी, जिसमें श्याम शरण, शंकर मेनन, अनिल काकोदकर, रोनेन सेन और एस जयशंकर शामिल थे। लेकिन जब सब कुछ कहा और कर दिया गया तो हकीकत यही सामने आती है कि नाभिकीय मसले पर अलग-थलग पड़े भारत को इस समझौते की ओर लाने की लंबी कवायद में भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज बुश की अहम भूमिका रही। इसके चलते वह आदर और सम्मान के पात्र हैं।
सार्वजनिक सेवा में पिछले सप्ताह एक और बड़ा परिवर्तन हुआ। यागा वेणुगोपाल रेड्डी ने भारतीय रिजर्व बैंक के गर्वनर के रूप में अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा कर लिया है और वह हैदराबाद स्थित अपने घर वापस चले गए हैं। उनका प्रदर्शन भी शानदार रहा, हालांकि जनसंपर्क में वह कमजोर रहे, जिसके चलते उनकी उपलब्धियां खुलकर सामने नहीं आ पाईं।
इसके साथ ही वित्त मंत्रालय से भी उन्हें खुला समर्थन नहीं मिला, जिसके चलते वृहद आर्थिक नीतियों में पर्याप्त कामयाबी नहीं मिली। उन्होंने कुछ ऐसी वित्तीय संस्थानों के खिलाफ कड़े कदम उठाए और उन्हें नियमों के तहत लाने की कोशिश की, जो राजनीतिक रूप से बहुत शक्तिशाली थे। इसमें सहारा और पीयरलेस जैसी गैर बैंकिग वित्तीय कंपनियां शामिल हैं।
उन्होंने अपने से पहले रहे गवर्नरों की तुलना में कहीं ज्यादा उपलब्धियां हासिल कीं। इसी तरह से शहरी सहकारी बैंकों (यूसीबी) को रेड्डी के कार्यकाल में 19 राज्य सरकारों में सहमति पत्र तैयार कराया गया, जिसमें 90 प्रतिशत यूसीबी शामिल हो गईं। इसके साथ ही उनके नेतृत्व और निरीक्षण में रिजर्व बैंक ने कोई महत्त्वपूर्ण बैंकिग असफलता सामने नहीं आई और बैंकिग उद्योग तेजी से आगे बढ़ा।
इस मसले पर भी एक नजर डालना जरूरी है कि रेड्डी के कार्यकाल में बैंकों से उधारी लेने वालों की संख्या में तीब्र बढ़ोतरी हुई और लोगों ने रिटेल से लेकर रियल एस्टेट तक की खरीदारी में खूब कर्ज लिए। हालांकि रेड्डी के कार्यकाल के अंतिम दिनों में इस क्षेत्र में मौद्रिक नीतियां कड़ी कर दी गई। इसका उद्देश्य यह था कि रियल एस्टेट में विदेशी निवेश और इस कारोबार में महंगाई के कृत्रिम बुलबुले पर लगाम लगाई जाए।
रेड्डी के सामने गंभीर वृहद-आर्थिक प्रबंधन की चुनौतियां थीं, जिसके चलते भारतीय अर्थव्यवस्था के त्वरित विकास में रुकावटें आने की संभावना थीं। रेड्डी ने ऐसे कदम उठाए जिससे देश में विदेशी पूंजी भी आई और तेजी से विकास हुआ। इसमें दो प्रमुख चुनौतियां थीं जो एक दूसरे से जुड़ी हुई थीं- विनिमय दर का प्रबंधन करना और इसका मौद्रिक नीति से तालमेल बैठाना।
इन दो प्रमुख मसलों पर रेड्डी के नेतृत्व में रिजर्व बैंक ने सही रणनीतिक फैसले किए। रुपये की मजबूती के साथ उन्होंने 2007 में कई फैसले लिए जिसने भारत के तेज विकास में अहम भूमिका अदा की। इसके साथ ही भारत के उपभोक्ता वस्तुओं और सेवाओं के निर्यात में भी जोरदार बढ़ोतरी हुई।
मौद्रिक नीति के मामले में रेड्डी ने तरलता को कम करने के लिए कोशिशें की, जिसमें उन्हें वित्त मंत्रालय के विरोध का भी सामना करना पड़ा। इसके चलते उन्होंने शायद बहुत कड़े कदम नहीं उठाए, जैसा कि वे चाहते थे। 2008 की सर्दियों में जिंसों की वैश्विक कीमतें बढ़ने के बाद रिजर्व बैंक और रेड्डी की आलोचना भी हुई। इसमें कुछ आलोचक ऐसे भी थे, जिन्होंने मौद्रिक नीति को कड़ा किए जाने की नीति का भी विरोध किया।
इसका सामान्य कारण यह है कि राजनीतिक रूप से लुभावने होने के लिए कोई नीतियां 2004-07 के दौरान नहीं बनी। रेड्डी की मौद्रिक और विनिमय दरों पर नीतियों के कुछ स्तंभकारों ने जोरदार आलोचना की और रिजर्व बैंक विरोधी मुहिम चलाई। लेकिन उन्होंने आधुनिक केंद्रीय बैंकिंग और उपलब्धियों को नजरंदाज किया। बहरहाल रेड्डी अपनी नीतियों के पथ से विचलित नहीं हुए।
हालांकि उन पर वित्त मंत्रालय की ओर से भी पर्याप्त दबाव रहा। एक बात तो तय है कि रेड्डी के कार्यकाल के दौरान रिजर्व बैंक की स्वायत्तता और स्वतंत्रता पर कोई उंगली नहीं उठा सकता।
अगर मुझे 2004-08 के दौरान कुछ लोगों को व्यक्तिगत रूप से पुरस्कार देने को कहा जाय तो मैं इन लोगों का नाम लूंगा-
सबसे ज्यादा दूरदर्शी राजनेता का पुरस्कार प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को।
सबसे बेहतरीन आर्थिक नीतियों पर पुरस्कार के विजेता वाई. वेणुगोपाल रेड्डी।
भारत के सबसे बढ़िया विदेशी मित्र का पुरस्कार जार्ज बुश को ।
सबसे खराब आर्थिक नीतियों और राजनीति का पुरस्कार प्रकाश कारत को ।