इसमें मेरे लिए क्या है? यह वही सवाल है, जिसे दुनिया भर की कंपनियों में बड़े बदलाव को लागू करते वक्त कर्मचारी पूछते हैं।
यही वह सवाल है, जिससे इन कंपनियों में सबसे ऊंचे ओहदों पर बैठे अधिकारी सबसे ज्यादा डरते हैं। लेकिन यह खुद उनके भले के लिए बेहतर होगा कि वे इस सवाल का जवाब सही-सही और सटीक जवाब दें।
यह इसलिए जरूरी है क्योंकि दुनिया की एक बड़ी एचआर कंसल्टेटिंग फर्म, मेर्सर के एक शोध के मुताबिक किसी बदलाव की शुरुआत करते वक्त अगर आपके कर्मचारी मन में उठ रहे सवालों से परेशान है तो उसकी काफी मोटी कीमत कंपनी को चुकानी पड़ती है। हकीकत तो यह है कि कर्मचारी जितनी देर से उस बदलाव को स्वीकार करेंगे, कंपनी को उतना ही ज्यादा नुकसान झेलना पड़ेगा।
वैसे, उद्योग जगत के बड़े-बड़े नाम इस बात को मानते हैं कि बदलाव के दौर में कंपनी की उत्पादकता पर असर तो पड़ता है। लेकिन वे अक्सर इसका लोगों पर पड़ने वाले बड़े असर को भूल जाते हैं। उनका मानना है कि लोग-बाग तो चीजों को खुद ब खुद ही समझ कर उस बदलाव को बड़े आराम से स्वीकार कर लेंगे। लेकिन मेर्सर की मानें तो असल में होता ठीक उल्टा है। इसकी वजह से उत्पादकता में भारी कमी आ जाती है।
साथ ही, इससे कर्मचारियों और मैनेजरों के बीच रिश्ते भी हमेशा के लिए खराब हो जाते हैं। अगर मेर्सर के आंकड़ों को मानें तो एक बड़े बदलाव की वजह से हरेक कर्मचारी का एक घंटा का वक्त तो इसकी वजह से बेकार तो हो ही जाता है। अब आप इसके वित्तीय घाटे का आंकड़ा तो निकाल ही सकते हैं।
केवल कर्मचारियों के सालाना वेतन को काम के कुल घंटों से भाग दीजिए और फिर उसे कर्मचारियों की कुल तादाद से गुणा कर दीजिए। मिसाल के तौर 10 हजार कर्मचारियों वाली किसी कंपनी को ले लीजिए, जो पूरे साल में कर्मचारियों के वेतन पर 50 हजार रुपये खर्च करती है। अब उनके काम के 2080 घंटों से भाग दे दीजिए।
इस हिसाब से उस कंपनी को एक कर्मचारी के एक घंटा बर्बाद करने से उस पर करीब 24 रुपये का नुकसान उठाना पडेग़ा। मतलब, अगर सभी कर्मचारी एक घंटे का वक्त बर्बाद करेंगे, तो कंपनी को दो लाख 40 हजार रुपये का मोटा नुकसान उठाना पड़ेगा। वह कंपनी अगर कर्मचारियों को बदलाव की घड़ी में कर्मचारियों को अपने साथ रखे तो इस हिसाब से काफी पैसे बचा सकती है।
हालांकि, इस तरह के शोध सैकड़ों बार किए जा चुके हैं और सभी के नतीजे एक से ही रहे हैं, लेकिन फिर भी कंपनियां अपने कर्मचारियों से बदलाव के बारे में बात करने को न के बराबर तरजीह देते हैं। इसकी वजह यह है कि वे इस बारे में कर्मचारियों से बात करने को एक ऐसा फालतू का काम समझती हैं, जिसकी जिम्मेदारी एचआर मैनेजरों की होती है।
मजे की बात यह है कि खुद एचआर डिपार्टमेंट वालों को इस बारे में काफी बाद में पता चलता है। मेर्सर का कहना है कि बड़े अधिकारी बदलाव को लेकर काफी उत्साहित होते हैं। इसी वजह से तो कर्मचारी भी इस मुद्दे पर दांव पर लगी चीजों को समझेंगे और इसीलिए जल्द से जल्द बदलाव की जरूरत उनके दिल में भी होगी। कर्मचारियों के दिमाग में भी तस्वीर उतनी ही साफ होगी, जितनी उनके दिमाग में है।
यह एक अच्छी सोच हो सकती है, लेकिन बदलाव के शुरुआती दौर में ऐसे मामलों की गुंजाइश न ही रखी जाए। अक्सर एक आम कर्मचारी की बदलाव के बारे में सोच ऊंचे ओहदों पर बैठे लोगों की सोच से अलग ही होती है। बड़े अधिकारियों के पास बदलाव के बारे में सोचने-विचारने का पूरा वक्त होता, लेकिन कर्मचारियों को अक्सर आखिरी वक्त में पता चलता है।
एक तरफ तो सीईओ जैसे अधिकारी बदलाव की वजह से बड़े स्तर पर विकास और मुनाफे को देखते हैं, लेकिन दूसरी ओर कर्मचारी, क्या हो रहा और क्यों हो रहा है, जैसे सवालों में उलझे रहते हैं। हो सकता है कि बदलाव को लेकर बड़े अधिकारियों के दिमाग में तस्वीर काफी साफ हो और इसके लिए उनमें काफी उत्साह हो, लेकिन कर्मचारी तो इसके संभावित प्रभावों से परेशान और डरे हुए रहते हैं।
एक तरफ तो बड़े अधिकारी कंपनी को आगे बढ़ाने के लिए पूरी ताकत रहते हैं, लेकिन भ्रम में पड़े कर्मचारी उनके पांवों में जंजीर डालते रहते हैं। मेर्सर के मुताबिक, अक्सर सीईओ जल्द से जल्द से आगे बढ़ने के लिए बेसब्र रहते हैं, लेकिन कर्मचारियों के दिमाग में बड़े अधिकारियों की समझ पर सवालिया निशान लगते रहते हैं। इससे बदलाव की पूरी प्रक्रिया पर ही संकट के बादल मंडराने लगते हैं।
इस बात की वकालत करने वाले सैंकडों नहीं, हजारों आंकड़े आपको आराम से मिल जाएगें। मिसाल के तौर पर अमेरिकी संस्था साराटोगा इंस्टीटयूट के दुनिया भर की 200 कंपनियों के रिसर्च को ही ले लीजिए। उनमें से केवल नौ फीसदी कंपनियों का यह कहना था कि उनके यहां बदलाव की बयार जबरदस्त कामयाबी का सबब बनकर आई।
उन 200 कंपनियों में से केवल 4 फीसदी का यह कहना था कि बदलाव उनके यहां थोड़ी-बहुत कामयाबी लेकर आई। दूसरी तरफ, 25 फीसदी से ज्यादा कंपनियों के मुताबिक बदलाव की वजह से उन्हें कोई बड़ी कामयाबी नहीं मिली। 33 फीसदी कंपनियों को इस बारे में पता ही नहीं था, जबकि 27 फीसदी ने इस बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर दिया।
खुद को बदलने से इनकार, बदलाव की कोशिश का बंटाधार होनी की सबसे बड़ी वजह रही है। ऐसा लोग-बाग इसलिए करते हैं क्योंकि वे जो है, कम से कम से उसे तो बरकरार रखना चाहते हैं। चूंकि एक ही तरीके से काम करके कंपनी बाजार में नहीं टिक सकती है, तो इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या होना चाहिए। बहुमत के आधार पर भी बदलावों को लागू नहीं किया जा सकता है।
इस हालत से बचने का एक ही रास्ता है कि कर्मचारियों से अच्छी तरीके से बात की जाए। उन्हें बताया जाए कि बदलाव की जरूरत क्यों है और इससे उनका क्या फायदा होगा। पुराने तरीकों, जहां बड़े अधिकारी सिर्फ फैसले लेते हैं, से कंपनी में नकारात्मक सोच और बदलाव की मुखालफत को ही बढ़ावा मिलेगा।