आरुषि तलवार की मौत से पूरा का पूरा मुल्क हैरान रह गया। पूरे मुल्क में आज भी इस कत्ल और उसके बाद उस प्यारी सी बच्ची के पूरे खानदान पर लगे कलंक के दागों के बारे में खूब बातें हो रही हैं।
कोई यह भरोसा करने के लिए तैयार नहीं है कि कोई माता-पिता इतना घिनौना जुर्म कर सकता है। लेकिन जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी के सामाजिक विज्ञान विभाग के पीएम कुलकर्णी के एक अध्ययन की मानें तो हर दिन करीब 1900 आरुषियों को मौत के घाट उतार दिया जाता है, वह भी उनके पैदा होने से पहले।
आंकड़ों की मानें तो 2001 से लेकर 2005 के बीच हर साल 6,82,000 लाख कन्या भ्रूणहत्याएं हुईं। इनके हत्यारे उनके अपने माता-पिता थे। इस जुर्म में उनके मददगार थे अत्याधुनिक अल्ट्रासोनिक मशीनों से लैस ऐसे लालची डॉक्टर, जिनके लिए जन्म से पहले लिंग निर्धारण और मां की कोख में पल रही बच्चियों को मारने का हरेक मामला अपनी तिजोरियों को भरने का मौका बनकर आता है।
परमाणु करार पर वामदलों की रार झेल रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हाल ही में मुल्क में लड़कियों की तेजी से कम होती तादाद पर गंभीर चिंता जताई थी। उन्होंने कहा था कि, ‘मेरी एक नहीं, तीन-तीन बेटियां हैं। मैं चाहता हूं वतन का हरेक शख्स अपनी बेटियों के बारे में उसी तरह से सोचे जैसा मैं अपनी बेटियों के बारे में सोचता हूं।’ लेकिन क्या इस मुद्दे पर भी वह उसी तरह से गंभीर हैं, जैसा परमाणु समझौते पर हैं। क्या परमाणु डील की तरह इस मामले ने भी उनकी नींद उड़ा रखी है?
अगर ऐसा है भी तो जिस तरीके से कन्या भ्रूणहत्या के खिलाफ बने कानून, प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण कानून को अमल में लाया जा रहा है, उसे देखकर यह बात सच नहीं लगती। इस कानून के तहत पूरे जिले में यह सुनिश्चित करवाने की जिम्मेदारी डीएम पर डाली गई है कि वहां जन्म से पहले बच्चों का किसी प्रकार का लिंग निर्धारण हो पाए। लेकिन इसे लागू करवाने की बात तो छोड़ दीजिए, इस कानून के बारे में काफी कम कलेक्टरों ने ही सुना है।
अगर लड़कियों की घटती तादाद से सरकार असल में काफी परेशान होती, आलम कम से कम इतनी बदतर तो नहीं होता। इस समस्या के विकराल रूप की बानगी भर का अंदाजा आप 2002 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे में माताओं के एक जवाब को सुनकर लगा सकते हैं। इस सर्वे में देश की माताओं से पूछा गया था कि उनमें से कितनी महिलाएं अब और कोई संतान नहीं चाहतीं।
इसके जवाब में जो महिलाएं एक बेटे या दो बेटे या फिर एक बेटे और एक बेटी की मां थी, उनमें से 90 फीसदी औरतों ने आगे कोई और संतान न पैदा करने की इच्छा जताई। लेकिन जो महिलाएं दो बेटियों की मां थीं, उनमें से कई औरतों के बीच और बच्चे पैदा करने इच्छा काफी प्रबल थी। बिहार में तो ज्यादा बच्चों की चाह रखने वाली महिलाओं की तादाद तो सबसे ज्यादा है। इस सूबे में तो ऐसी मांओं की तादाद भी सबसे कम है जो ऊपर के तीनों मामलों की तरह बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं।
यहां दो बेटियों की केवल 20 फीसदी मांएं ऐसी हैं, जो उनके बाद बच्चे नहीं पैदा नहीं करना चाहती हैं। पंजाब भी में ऐसी माताओं की तादाद केवल 45 फीसदी है। मध्य प्रदेश में तो केवल 37.6 फीसदी माएं ऐसी हैं, जो दो बेटियों के बाद और बच्चे पैदा नहीं करना चाहतीं। वहीं तमिलनाडु में ऐसी मांओं की तादाद 90 फीसदी है। ये आंकड़े एक तरह का टाइम बम हैं, जिनके ऊपर बिहार, पंजाब और मध्यप्रदेश जैसे राज्य बड़े आराम के साथ बैठे हुए हैं।
रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया में काम कर चुके आर.जी. मित्रा जैसे विश्लेषकों की मानें तो यह बम ऐसा है, जिसके ट्रिगर को छूने भर से बिहार जैसे सूबों में लड़कियों का नामोनिशान तक मिट जाएगा। यह ट्रिगर आबादी को कम करने की कोई प्रयास हो सकता है। मिसाल के तौर पर मध्य प्रदेश को ही ले लीजिए। यहां ‘हम दो, हमारे दो’ अभियान के तहत कन्या संतानों के माता-पिताओं को एक लाख की बीमा पॉलिसी सौंपने का काम किया जा रहा है।
अगर बिहार जैसे राज्यों में ऐसी पॉलिसी लागू कर दी गई तो इसका सबसे ज्यादा बुरा असर लड़कियों पर ही होगा। पंजाब जैसे अमीर सूबे भी इसकी मार से बच नहीं पाएंगे, जहां कई जिलों में लैंगिक अनुपात का स्तर 1000 लड़कों पर 700 लड़कियों के खतरनाक स्तर से भी नीचे चला गया है। 1981 में भारत में लैंगिक अनुपात की दर 1000 लड़कों पर 962 लड़कियों का था, जो 2001 में घटकर केवल 927 लड़कियों का रह गया।
लेकिन इस बीच में केवल तीन डॉक्टर प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण के खिलाफ बनाए गए कानून के जाल में फंस पाए। उन पर आरोप भी केवल अल्ट्रासाउंड टेस्ट करवाने, मरीजों का रिकॉर्ड न रखने या इसके बारे मे हर महीने अधिकारियों को नहीं बताने के लगाए गए।
इस मामले में कंपनियों में होने रेग्युलर अकाउंट ऑडिट की तर्ज पर होने वाला रेग्युलर मेडिकल ऑडिट कई चमत्कार कर सकता है। इस मामले में अगर थोड़ी सी भी कोशिश की जाए, तो कई बड़े डॉक्टरों की गर्दन कानून के लंबे हाथों में आ सकती है। लेकिन हमारे देश पर राज कर रहे अर्थशास्त्रियों के पास लैंगिक अनुपात की बदतर होती हालत के बारे में चिंता करने का वक्त है कहां?