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विनियंत्रण के लिए है सही समय

Last Updated- December 07, 2022 | 7:48 PM IST

खाद्य एवं उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय ने चीनी को विनियंत्रित करने का जो प्रस्ताव रखा है, उसे केंद्रीय मंत्रिमंडल की ओर से मंजूरी नहीं दिया जाना समझ से परे है।


वह भी ऐसे समय में जब आपूर्ति की कोई समस्या नहीं है और ऐसी उम्मीद है कि आने वाले समय में आपूर्ति और बेहतर होगी क्योंकि 50 लाख टन का बफर स्टॉक अब खत्म कर दिया गया है। अगले महीने गन्ने की पेराई का मौसम शुरू होने वाला है, इस वजह से आपूर्ति और बेहतर होने की उम्मीद है।

इस सच्चाइयों का आर्थिक मामलों की सुरक्षा समिति (सीसीईए) पर कोई असर नहीं पड़ा है और उसने 10 फीसदी लेवी और मासिक कोटे को खत्म करने के प्रस्ताव को टाल दिया गया है। यह सही है कि चीनी के विनियंत्रण में सबसे बड़ी समस्या यह है कि इससे कीमतों के बढ़ने का खतरा है और सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठाना चाहेगी जो महंगाई रोकने के उसके प्रयासों पर पानी फेर दे।

पर इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि चीनी के विनियंत्रण के लिए यही सबसे उचित समय है। खुद कृषि और खाद्य मंत्री शरद पवार का भी यही मानना है। पिछले मौसम में जितनी चीनी का उत्पादन किया गया था उसमें से 1.1 करोड़ टन चीनी अभी बची हुई है यानी भंडार की हालत भी ठीक है।

हालांकि ऐसा माना जा रहा है कि आने वाले मौसम में चीनी का उत्पादन कुछ कम होगा फिर भी उत्पादन 2 करोड टन की सालाना खपत से कम होने की उम्मीद नहीं है। इसका मतलब है कि अगले मौसम के लिए भी हमारे पास चीनी बची ही रहेगी। इन संकेतों से साफ होता है कि आपूर्ति फिर भी मांग से बेहतर ही रहेगी और ऐसे में कीमतों के ऊपर चढ़ने की आशंका नहीं है।

वास्तव में अगर इस समय चीनी पर से नियंत्रण खत्म किया जाता है तो कीमतें और नीचे आ सकती हैं क्योंकि फैक्ट्रियों को यह आजादी होगी कि वे अपने भंडार को थोड़ा खाली करने के लिए चीनी बेच सकेंगे। यह तर्क दिया जा सकता है अगर लेवी शुगर की व्यवस्था खत्म कर दी जाती है तो राज्य सरकारों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए चीनी की जरुरत को पूरा करने के लिए वाणिज्यिक दर पर खरीद करनी पड़ेगी जो उन्हें महंगा पड़ सकता है।

पर खाद्य मंत्रालय के चीनी को विनियंत्रित करने के प्रस्ताव में इससे बचने के सुझाव भी दिए गए हैं। प्रस्ताव में कहा गया है कि अगर इससे राज्यों पर वित्तीय बोझ पड़ता है तो केंद्र इसकी भरपाई करे। पीडीएस के लिए अब तक जो सब्सिडी दी जाती है उसका भार चीनी उद्योग उठाता है पर अगर इस प्रस्ताव को मान लिया गया तो सारा भार सरकार पर आ जाएगा जो शायद गलत भी नहीं है।

एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि चीनी के विनियंत्रण का पूरा फायदा तभी मिल सकेगा जब इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकार गन्ने की कीमत तय करने की व्यवस्था को खत्म कर दें। अगर ऐसा लगता है कि इस कदम से गन्ना किसानों का चीनी मिल मालिकों की ओर से शोषण होगा, तो शायद अब इसे परखने की जरूरत है।

हो सकता है कि स्थिति ठीक इससे उलट हो। चीनी मिलों को पेराई के लिए गन्ने की जरूरत होती है और अगर किसानों को इसके लिए उचित कीमत नहीं चुकाई जाती तो हो सकता है कि गन्ने की खेती को छोड़कर कोई और फसल उगाने लगें।

First Published - September 4, 2008 | 10:09 PM IST

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