मीडिया मुगल के नाम से मशहूर न्यूज कॉर्पोरेशन के मुखिया रूपर्ट मर्डोक ने कुछ हफ्ते पहले अपनी भारत यात्रा के दौरान एक बड़ी घोषणा की थी।
मर्डोक ने घोषणा की थी कि उनकी कंपनी अगले एक साल में 6 भारतीय भाषाओं के चैनलों में 10 करोड़ डॉलर निवेश करेगी। अब ऐसी कौन सी बात है जिसके चलते इतना बड़ा मीडिया महारथी भारत की क्षेत्रीय भाषाओं का रुख कर रहा है, जबकि स्टार के जरिये वह पहले से ही भारतीय बाजार में मौजूद हैं। इसका जवाब भी सीधा-सादा है, भारत में क्षेत्रीय विज्ञापन बाजार बहुत तेजी से बढ़ रहा है।
इंडिया मीडिया एक्सचेंज के मुताबिक वर्ष 2007-08 में क्षेत्रीय विज्ञापनों का बाजार 22.7 फीसदी की दर से बढ़ा। वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय विज्ञापनों के बाजार में इस दौरान 14.6 फीसदी की दर से तेजी आई। इसका सीधा सा अर्थ यही है कि अब दर्शक राष्ट्रीय चैनलों की बजाय क्षेत्रीय चैनलों की ओर मुखातिब हो रहे हैं।
इंडिया मीडिया एक्सचेंज की स्ट्रेटिजिक इन्वेस्टमेंट की भारत में प्रमुख मोना जैन कहती हैं, ‘देर से ही सही स्टार नेटवर्क ने भी इस हकीकत को स्वीकार तो किया है।’ इस मामले में भी जी नेटवर्क इसका बड़ा प्रतिद्वंद्वी साबित हो सकता है क्योंकि उसके मराठी, बांग्ला, तेलुगू और गुजराती के अलावा कई अन्य भाषाओं में चैनल मौजूद हैं। उनके चैनल बढ़िया मुनाफा भी कमा रहे हैं।
क्षेत्रीय मीडिया के लिहाज से तमिलनाडु, महाराष्ट्र, केरल, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य बेहद अहम हैं। जैन का कहना है कि केवल अकेले महाराष्ट्र में क्षेत्रीय विज्ञापनों का 13 फीसदी बाजार है और कुल विज्ञापन बाजार का 2.5 फीसदी का ताल्लुक भी महाराष्ट्र से ही है। गुजरात और पंजाब में भी क्षेत्रीय चैनलों का चलन जोर पकड़ता जा रहा है।
मीडिया प्लानरों को भी कई कारणों से क्षेत्रीय मीडिया लुभा रहा है। विज्ञापनदाताओं के लिए भी क्षेत्रीय चैनल अधिक फायदेमंद नजर आ रहे हैं। दरअसल इन चैनलों पर विज्ञापनों के लिए जहां कम कीमत अदा करनी पड़ती है, वहीं इन चैनलों की पहुंच बढ़िया होने से विज्ञापन अधिक लोगों द्वारा देखा भी जाता है।
मुद्रा मैक्स (मीडिया, एनालिटिक्स और कनवर्जेंस) के प्रमुख और अध्यक्ष चंद्रदीप मित्रा कहते हैं, ‘धोनी इफेक्ट और रिएलिटी शो के प्रभाव ने ग्रामीण भारत की उम्मीदों को एक नई हवा दी है। विज्ञापनदाता अब इस अवसर को भुनाना चाहते हैं। अब वे स्थानीय ग्राहकों पर ध्यान दे रहे हैं। कुल मिलाकर नये उत्पादों को लाँच करने का मामला हो या फिर किसी उत्पाद के आदर्श परीक्षण की बात हो, ग्रामीण भारत एक उभरता हुआ बाजार है।’
पहले तो विज्ञापन हिंदी या फिर अंग्रेजी में तैयार किए जाते थे लेकिन बदलते वक्त के साथ अब विज्ञापन दूसरी क्षेत्रीय भाषाओं में भी बनने लगे हैं। जैन कहते हैं, ‘ पेप्सी, जीएसके और नेस्ले जैसी कंपनियां अब स्थानीय हीरो को लेकर विज्ञापन तैयार कर रही हैं।’ मौजूदा मंदी की वजह से भी कंपनियों ने क्षेत्रीय बाजारों का रुख किया है। गौरतलब है कि इन दिनों छोटे बाजारों में कई चीजों की बिक्री बहुत तेजी से बढ़ी है।
सैमसंग इंडिया के उप प्रबंध निदेशक आर.जुत्शी कहते हैं, ‘हमारी योजना क्षेत्रीय स्तर पर अधिक विज्ञापन देने की है। कई वस्तुओं की कीमतों में तेजी आने से ग्रामीण लोगों की आमदनी में बहुत इजाफा हुआ है।’ वर्ष 2007-08 में क्षेत्रीय मीडिया को (प्रिंट, टीवी सहित सभी माध्यमों में) 2046.2 करोड़ रुपये के विज्ञापन मिले।
भारत में राष्ट्रीय और क्षेत्रीय विज्ञापनों का अनुपात 81:19 का है, जिससे पता चलता है कि अभी भी विज्ञापनों पर राष्ट्रीय मीडिया का ही दबदबा है। हालांकि, ऐड ऐक्स मीडिया (टैम मीडिया रिसर्च की ही शाखा)के मुताबिक टेलीविजन पर क्षेत्रीय विज्ञापनों का हिस्सा मामूली सा ही है। वर्ष 2008 की पहली छमाही में राष्ट्रीय चैनलों को जहां 59 फीसदी विज्ञापन मिले तो 41 फीसदी विज्ञापन क्षेत्रीय चैनलों को मिले।
दरअसल शिक्षा, हॉस्पिटेलिटी, रियल एस्टेट और ज्वैलरी क्षेत्र में आई तेजी ने क्षेत्रीय विज्ञापनों का दायरा बढ़ाया है। दरअसल कुछ उत्पाद ऐसे हैं जिनकी शहरों में मांग कम हो चुकी है या फिर खत्म सी हो गई है, ऐसे में इन उत्पादों से जुड़ी कंपनियां दूसरे बाजारों का रुख कर रही हैं।
वर्ष 2008 में प्रिंट मीडिया में जितने विज्ञापन मिले उनमें से 48 फीसदी अंग्रेजी अखबारों को मिले जबकि 52 फीसदी विज्ञापन हिंदी और दूसरी भाषाओं के अखबारों को मिले। वहीं टेलीविजन पर यही कहानी एकदम उलट दिखी, केवल 20 फीसदी विज्ञापन अंग्रेजी चैनलों को मिले तो बाकी के 80 फीसदी विज्ञापन हिंदी और दूसरी भारतीय भाषाओं के चैनलों को मिले।