facebookmetapixel
रेट कट का असर! बैंकिंग, ऑटो और रियल एस्टेट शेयरों में ताबड़तोड़ खरीदारीTest Post कैश हुआ आउट ऑफ फैशन! अक्टूबर में UPI से हुआ अब तक का सबसे बड़ा लेनदेनChhattisgarh Liquor Scam: पूर्व CM भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य को ED ने किया गिरफ्तारFD में निवेश का प्लान? इन 12 बैंकों में मिल रहा 8.5% तक ब्याज; जानिए जुलाई 2025 के नए TDS नियमबाबा रामदेव की कंपनी ने बाजार में मचाई हलचल, 7 दिन में 17% चढ़ा शेयर; मिल रहे हैं 2 फ्री शेयरIndian Hotels share: Q1 में 19% बढ़ा मुनाफा, शेयर 2% चढ़ा; निवेश को लेकर ब्रोकरेज की क्या है राय?Reliance ने होम अप्लायंसेस कंपनी Kelvinator को खरीदा, सौदे की रकम का खुलासा नहींITR Filing 2025: ऑनलाइन ITR-2 फॉर्म जारी, प्री-फिल्ड डेटा के साथ उपलब्ध; जानें कौन कर सकता है फाइलWipro Share Price: Q1 रिजल्ट से बाजार खुश, लेकिन ब्रोकरेज सतर्क; क्या Wipro में निवेश सही रहेगा?Air India Plane Crash: कैप्टन ने ही बंद की फ्यूल सप्लाई? वॉयस रिकॉर्डिंग से हुआ खुलासा

अब प्रशांत पार हो रहा है महाशक्ति का उदय

Last Updated- December 07, 2022 | 7:42 PM IST

पॉल केनेडी ने अपनी किताब दी डिक्लाइन ऐंड फॉल ऑफ ग्रेट पावर्स में कहा था कि विश्व की जितनी प्रमुख शासन शक्तियों का अंत हुआ है, उनके पीछे वजह यह रही है कि उन्होंने कुछ ऐसे वित्तीय वादे कर दिये थे जिनका भार उनकी अर्थव्यवस्था के लिए उठा पाना मुमकिन नहीं था।


क्या अमेरिका में वित्तीय हालात कुछ ऐसे बन रहे हैं जिन पर किसी का नियंत्रण मुश्किल लग रहा है। राष्ट्रपति बुश ने अमेरिकियों को कर में भारी छूट दी थी और इराक युद्ध में बेतहाशा खर्च किया था जिसका परिणाम है कि देश में वित्तीय आधिक्य (सरप्लस) अब घाटे में बदलने जा रहा है और ऐसा अनुमान है कि राजकोषीय घाटा 400 अरब डॉलर के करीब होगा।

अगर देश की दो प्रमुख वित्तीय मॉर्गेज कंपनियों की देनदारियों को भी राष्ट्रीय कर्ज में जोड़ दिया जाए, जिसके पूरे आसार भी हैं तो यह आंकड़ा सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी से भी अधिक हो सकता है। इस कर्ज में से एक बड़ा हिस्सा विदेशियों को भी चुकाया जाना है।

अपने मौजूदा घाटे और वित्तीय योजनाओं को निवेश उपलब्ध कराने के लिए अमेरिका कर्ज तो ले ही रहा है साथ ही अपने चांदी के भंडार को भी बेचकर खाली कर रहा है। पिछले साल अमेरिकी कंपनियों ने विदेशी अधिग्रहणों पर करीब 400 अरब डॉलर खर्च किए हैं। वहीं दूसरी ओर विदेशी अमेरिका में आवासीय और कारोबारी अचल संपत्तियां खरीद रहे हैं(पिछले साल उन्होंने इस खरीद में 100 अरब डॉलर खर्च किए)।

अगर इस सच्चाई पर नजर डालें कि एशियाई सॉवरेन वेल्थ फंडों को खस्ताहाल अमेरिकी बैंकों की मदद के लिए आगे आने पड़ा था तो सच्चाई खुद ब खुद सामने आ जाती है (एशियाई सॉवरेन वेल्थ फंडों का कुल मूल्य 30 खरब डॉलर का है और वॉल स्ट्रीट के कई आला कार्यकारी अब एशिया का रुख करने लगे हैं)। खस्ताहाल बैंक और वित्तीय संस्थान तो पूरी बदहाल स्थिति का एक हिस्सा भर हैं।

इराक युद्ध के बाद और एक तरह से रूस के साथ शीत युद्ध शुरू हो जाने के बाद अमेरिका के दोस्तों की सूची छोटी होती जा रही है और  विश्व पर उसका प्रभुत्व भी कम होता जा रहा है। अमेरिका जिस तरह से इजरायल को बिना शर्त के समर्थन दे रहा है और कुछ मामलों में दोहरे मानदंड अपना रहा है (इजरायल सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों का उल्लंघन कर रहा है और अमेरिका ने इस मामले में आंखें बंद कर ली हैं।

वहीं अमेरिका पश्चिम एशिया के कुछ देशों में भ्रष्ट राजतंत्र का भी समर्थन कर रहा है जबकि ऐसे वह कहता फिरता है कि पूरे विश्व में लोकतंत्र की स्थापना करना उसका प्रमुख लक्ष्य है।) जिससे एक तरीके से चीन की भूराजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को ही समर्थन मिल रहा है।

अगर ध्यान दें तो पता चलता है कि एक ओर जहां अमेरिका ने अपनी साख खुद गिराई है और अपने दोस्तों को खुद से दूर किया है, इसके ठीक उलट चीन ने अपने सारे सीमा विवादों (भारत के साथ सीमा विवाद को छोड़ दें) को सुलझाने में कामयाबी पाई है। साथ ही चीन ने अफ्रीका  को वित्तीय सहायता, कारोबारी मदद और राहत पहुंचाने की कोशिश की है।

खासतौर पर ताइवान और जापान के साथ विवादों को सुलटा कर चीन ने राजनीतिक परिपक्वता का उदाहरण पेश किया है। हालांकि 1930 में जापान और चीन के बीच की झड़प को देखते हुए यह शांति प्रक्रिया इतनी आसान भी नहीं थी। पर अब जरा एक बार फिर से आर्थिक शक्तियों पर फिर से ध्यान केंद्रित करते हैं।

कई सालों तक विश्व के कुल जीडीपी में लगभग 40 फीसदी योगदान अमेरिका का हुआ करता था। पर चीन ने अमेरिका को पछाड़ दिया है और पिछले साल कुल वैश्विक विकास में 25 फीसदी हिस्सा चीन का ही था। चीन का औद्योगिक एवं वाणिज्यिक बैंक (आईसीबीसी) विश्व में सबसे अधिक मुनाफा कमाने वाला बैंक बन कर उभरा है बाजार पूंजीकरण के लिहाज से भी यह सबसे आगे है।

इतना ही नहीं बाजार पूंजीकरण के लिहाज से जो पांच सबसे बड़े बैंक हैं उनमें से तीन चीनी ही हैं। चीन ने निर्यात के मामले में अमेरिकी बाजारों पर अपनी निर्भरता को भी काफी कम कर लिया है। चीन से होने वाले कुल निर्यात का महज 8 फीसदी हिस्सा ही अमेरिका को जाता है, जबकि एशियाई देशों के साथ चीन का कारोबार बढ़ा है (पहले चीनी उतपादों की सबसे अधिक खपत अमेरिका में होती थी पर अब इसकी जगह एशियाई देशों ने ले ली है)।

चीन ने एक और बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है और वह यह है कि अब वह अपने उत्पादों को हाई टेक बनाने की अधिक से अधिक कोशिश कर रही है। अगर हम परंपरागत उत्पादों की बात करें, जैसे कपड़े और खिलौने तो इन क्षेत्रों में भी अब चीन ऐसे उत्पाद नहीं बेच रहा जो वह बनाता है बल्कि वह ऐसे उत्पाद बना रहा है जो ग्राहक खरीदना चाहते हैं। यानी कि अब देश में उत्पादों की डिजाइनिंग उपभोक्ताओं की पसंद को ध्यान में रख कर की जा रही है।

हालांकि यह भी याद रहे कि देश की जीडीपी विकास दर 2008 में घट कर 10 फीसदी रहने की संभावना है और चालू खाते के सरप्लस में ठहराव आ सकता है। अब हम एक ऐसे क्षेत्र की बात करेंगे जो इन सबसे बिल्कुल जुदा है। हाल ही में पेइचिंग ओलंपिक के दौरान चीन ने सबसे अधिक 51 स्वर्ण पदक जीते, वहीं अमेरिका 36 स्वर्ण पदकों के साथ दूसरे स्थान पर था।

मैं अक्सर यह सोचता हूं कि अर्थव्यवस्था समेत दूसरे तमाम क्षेत्रों में बेहतर प्रदर्शन करने का जोश किसी देश में कहां से आता है? क्या यह किसी राष्ट्रीय प्रतिबद्धता का नतीजा है या फिर चीन ने कुछेक दशकों तक विदेशियों के शासन के दौरान जो यातनाएं झेली थीं यह उनका ही नतीजा है। अगर इतिहास की ओर भी देखें तो पता चलता है कि चीन को हमेशा से अपनी सभ्यता पर फक्र रहा है।

हालांकि अब भी चीन में कुछ समस्याएं ऐसी हैं जिनका समाधान नहीं ढूंढा जा सका है। देश में अब भी आय को लेकर समानता नहीं है यानी जहां कुछ लोगों की जेबें मोटी तनख्वाहों से गर्म हैं वहीं कुछ अभी भी गुजर बसर के लायक कमाई नहीं कर पा रहे हैं। साथ ही देश में शहर और गांवों के बीच की खाई भी बढ़ती ही जा रही है।

देश में विश्वविद्यालयों तक पहुंचने वाले छात्रों की संख्या तेजी से बढ़ी है (1992 में इनकी संख्या जहां महज 6 लाख थी वहीं अब यह बढ़कर 2010 में इसके बढ़कर 2 करोड़ तक पहुंचने की उम्मीद है) फिर भी गुणवत्ता युक्त शिक्षा अब भी एक समस्या है। पर इसके बावजूद अगर तमाम पहलुओं पर नजर डालें तो क्या ऐसा लगता है कि 21 वीं सदी में वैश्विक महाशक्ति का रुतबा अमेरिका से छिनकर चीन के पास चला आएगा।

हालांकि अब भी शोध और अनुसंधान के क्षेत्र में अमेरिका की पकड़ को नकारा नहीं जा सकता। देश में एक से बढ़कर एक विश्वविद्यालय हैं और काफी कुछ ऐसा भी है जिनसे प्रवासियों को यह देश हमेशा से आकर्षित करता आया है और यह दस्तूर अब भी जारी है। पर क्या इन खूबियों के दम पर ही चीन की सशक्त दावेदारी को खत्म किया जा सकता है? क्या अमेरिका इन खूबियों के बलबूते ही अपने सिंहासन की रक्षा कर पाएगा?

First Published - September 2, 2008 | 10:38 PM IST

संबंधित पोस्ट