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अब वोडाफोन कर रही है ‘दुनिया मुट्ठी में’

Last Updated- December 07, 2022 | 5:41 PM IST

पिछले साल मार्च में अरुण सरीन खासी सुर्खियों में थे और ऐसा लग रहा था मानो वह उत्साह में ही कुछ ज्यादा उम्मीद कर रहे थे। सरीन ने हाल ही में वोडाफोन के मुख्य कार्य अधिकारी का पदभार छोड़ा है।


पिछले साल जब वोडाफोन ने दूरसंचार कंपनी हचिसन एस्सार में हिस्सेदारी खरीदी थी तो सरीन ने दावा किया था कि ब्रिटेन की यह दिग्गज दूरसंचार कंपनी (वोडाफोन) अगले तीन सालों में भारत की सबसे बड़ी दूरसंचार कंपनी बन कर उभरेगी।

इस अधिग्रहण के पहले भले ही सरीन के बयानों को कुछ लोग बड़बोलापन करार देते हों पर हचिसन एस्सार में हिस्सेदारी खरीदने के बाद ऐसे लोगों ने अपना नजरिया उनके प्रति बदल लिया। पिछले साल फरवरी में जब वोडाफोन हचिसन एस्सार में हिस्सेदारी खरीदने जा रही थी, उस समय कंपनी के पास भारत में करीब 2.53 करोड़ उपभोक्ता थे और इस तरह कंपनी की बाजार हिस्सेदारी 15.7 फीसदी थी।

कुल 21.9 फीसदी बाजार हिस्सेदारी के साथ भारती एयरटेल पहले स्थान पर थी। दूसरे और तीसरे स्थान पर रिलायंस कम्युनिकेशंस और बीएसएनएल का कब्जा था जिनकी बाजार हिस्सेदारी क्रमश: 20 और 17.2 फीसदी थी। हालांकि सरीन ने एक शाम एस्सार के रुइया बंधुओं के घर पर पार्टी के दौरान पहले ही यह संकेत दे दिया था कि जल्द ही कंपनी अपनी हिस्सेदारी को बढ़ा लेगी।

उस बात को अब करीब 18 महीने बीत चुके हैं और सरीन ने यह साबित कर दिया है कि तब उन्होंने जो दावे किए थे वे काफी हद तक सही थे और जिन लोगों ने इस दावे पर तब संदेह व्यक्त किया था, वे गलत थे। भारत में वोडाफोन के ग्राहकों की संख्या 4.92 करोड़ हो गई है जो तब के मुकाबले दोगुनी है और कंपनी की बाजार हिस्सेदारी भी बढ़कर 17.2 फीसदी हो गई है।

अगर अब भी कुछ लोग वोडाफोन के ग्राहकों के बीच तेजी से पैर पसारने से प्रभावित नहीं हैं तो वे जरा विभिन्न दूरसंचार कंपनियों से वोडाफोन की तुलना कर देखें तो कहानी और साफ हो जाएगी। देश की जो दूसरी सबसे बड़ी दूरसंचार सेवा कंपनी है यानी रिलायंस कम्युनिकेशंस उसके कुल ग्राहकों की संख्या 5.07 करोड़ है जो कि वोडाफोन से कुछ लाख ही ज्यादा है।

रिलांयस की बाजार में मौजूदा हिस्सेदारी भी महज 17.7 फीसदी है जो वोडाफोन से कुछ ही अधिक है। यहां यह भी ध्यान रखें कि वोडाफोन की मौजूदगी पूरे देश भर में नहीं है। कंपनी देश के कुल 23 सर्किलों में से 16 में ही सेवा प्रदान करती है जबकि जिस दूसरी कंपनी से हम उसकी तुलना कर रहे हैं (रिलायंस) उसकी मौजूगी पूरे देश भर में है। यानी कम सर्किलों में होने के बावजूद वोडाफोन के उपभोक्ताओं की संख्या में खासा इजाफा हुआ है और कंपनी दूसरी कंपनियों को कड़ी टक्कर दे रही है।

सीडीएमए बनाम जीएसएम

रिलायंस पर नजर डालें तो उसके खिलाफ जाने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि वह आज भी मुख्य रूप से सीडीएमए आधारित मोबाइल सेवा उपलब्ध कराती है (कुछ इलाकों में रिलायंस जीएसएम सेवा भी देती है पर इसकी संख्या बहुत कम है) जिसे जीएसएम की तुलना में ग्राहकों का उतना अधिक रिस्पॉन्स नहीं मिला है।

सीडीएमए सेवा के साथ एक सबसे बड़ी परेशानी यह है कि बाजार में इन दिनों बड़ी संख्या में नई नई खूबियों वाले फोन आ रहे हैं, पर अगर कोई सीडीएमए का ग्राहक चाहे तो इतनी आसानी से वह अपने हैंडसेट को नहीं बदल सकता जितनी आसानी से कोई जीएसएम उपभोक्ता कर सकता है।

इसके बावजूद आज अगर दूरसंचार के क्षेत्र में रिलायंस को नंबर दो का स्थान मिला है तो उसकी एक वजह है कि कंपनी की प्राइसिंग रणनीति काफी आकर्षक है। पर अगर उपभोक्ताओं की संख्या के लिहाज से देखें तो रिलायंस ने पिछले पांच महीनों में औसतन 16 लाख नए उपभोक्ता ही अपने साथ जोड़े हैं, हालांकि जून का महीना कुछ बेहतर रहा है और कंपनी के साथ इस दौरान 17 लाख नए उपभोक्ता जुड़े हैं।

अगर कुल उपभोक्ताओं की बात करें तो जहां रिलायंस जून में केवल 17 फीसदी ग्राहक ही जोड़ पाई है वहीं वोडाफोन ने यहां भी बाजी मार ली है और उसके कुल उपभोक्ताओं की संख्या में इस दौरान 21.3 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। हालांकि यह भी देखना जरूरी होगा कि पिछले 18 महीनों के दौरान वोडाफोन ने जितनी तेजी से अपने पैर पसारे हैं अब उतनी तेजी की उम्मीद नहीं की जा सकती है।

पहली वजह है कि अब कंपनी को रिलायंस से  कड़ी टक्कर मिलेगी क्योंकि कंपनी अब कुछ ही महीनों में देश भर में पूरे दमखम के साथ जीएसएम क्षेत्र में कदम रखने की तैयारी में है। दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि भले ही वोडाफोन उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ाने के लिए रिलायंस से कड़ी टक्कर ले रही है, पर कंपनी राजस्व के मामले में अब भी रिलायंस से पीछे है।

यह भी ध्यान देना जरूरी है कि रिलायंस कम्यूनिकेशंस कई सारी और सेवाएं भी उपलब्ध कराती है। रिलायंस का वायरलेस कारोबार खासा मुनाफे वाला है। इस क्षेत्र में कंपनी का ऑपरेटिंग मार्जिन 40 फीसदी है जबकि वोडाफोन का ऑपरेटिंग मार्जिन महज 32 से 33 फीसदी के करीब है। अगर रिलायंस के ब्रॉडबैंड और ग्लोबल कारोबार पर नजर डालें तो पता चलता है कि मार्च 2008 में कंपनी के कुल राजस्व का एक तिहाई इन्हीं कारोबारों से प्राप्त हुआ है।

राह इनकी भी नहीं आसान

हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिन रिलायंस के लिए भी सुखद नहीं रहने वाले हैं। ब्रोकरेज हाउस सिटी ने हाल की एक रिपोर्ट में अनुमान व्यक्त किया है कि रिलायंस इस वर्ष अनुमानित 21.3 फीसदी उपभोक्ताओं की जगह पर महज 18.2 फीसदी ग्राहकों को ही अपने साथ जोड़ पाएगी।

यानी कंपनी के साथ 18 लाख उपभोक्ताओं के स्थान पर महज 17 लाख नए ग्राहक ही जुड़ पाएंगे और अगले साल नए उपभोक्ताओं की संख्या घटकर 16 लाख रह जाने का अनुमान है। अगर रिलायंस सिटी के इस अनुमान को झुठलाने के लिए कुछ खास नहीं कर पाती है तो इसका मतलब यह होगा कि कंपनी को मार्च 2009 तक महज 6.7 करोड़ ग्राहकों के साथ ही संतोष करना पड़ेगा।

अगर बाजार की नब्ज टटोलें तो पता चलता है कि सीडीएमए का कारोबार दिन पर दिन ढलान की ओर जा रहा है। भले ही रिलायंस ने सीडीएमए सेवा के लिए टैरिफ को काफी कम किया हो पर उसके बावजूद कंपनी के लिए जून 2008 तिमाही में प्रति उपभोक्ता प्रति माह प्रति मिनट इस्तेमाल में 1.4 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है और 424 मिनट पर पहुंच गया है।

जबकि प्रति मिनट राजस्व में भी 10 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है और यह 66 पैसे पर पहुंच गया है। वहीं दूसरी ओर जीएसएम सेवा प्रदाता कंपनियों के लिए हालात अब भी बेहतर हैं। बाजार की अग्रणी कंपनी भारती एयरटेल के लिए जून तिमाही के दौरान प्रति उपभोक्ता प्रति मिनट प्रति माह इस्तेमाल मिनट 507 मिनट से बढ़कर 537 मिनट हो गया है।

अगर 2009 तक वोडाफोन को रिलायंस को पीछे करना है तो उसे हर महीने 20 लाख नए ग्राहकों को अपने साथ जोड़ना होगा। तब तक कंपनी 6 नए सर्किलों में दस्तक भी दे चुकी होगी, पर उसके बावजूद यह एक मुश्किल लक्ष्य है। कुछ विश्लेषकों का कहना है कि वोडाफोन के लिए सहूलियत वाली बात यह है कि तब उसकी मौजूदगी मध्य प्रदेश, बिहार और उड़ीसा जैसे घनी आबादी वाले राज्यों में होगी।

ऐसे में तेजी से नए ग्राहकों को अपने साथ जोड़ना और आसान हो जाएगा। कंपनी के मार्केटिंग और नए कारोबारी निदेशक हरित नागपाल भी समझते हैं कि यह लक्ष्य आसान तो नहीं पर नामुमकिन भी नहीं है। नागपाल कहते हैं, ‘हम जानते हैं कि नए सर्किलों में दस्तक देना इतना आसान नहीं होता, अगर हम बेहतर सेवाओं के साथ नए सर्किलों में प्रवेश कर पाते हैं तो हमारे लिए राह नामुमकिन नहीं होगी।’

First Published - August 19, 2008 | 1:07 AM IST

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