इंस्टीटयूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंस ऑफ इंडिया (आईसीएआई) के नए नियमों के लिए उसकी पीठ थपथपानी चाहिए।
इसके कंपनियों के कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिल्टी (सीएसआर) कार्यक्रमों के लिए बनाए गए नए नियमों की वजह से अब कंपनियों को सामाजिक और पर्यावरण के मद में किए गए खर्च का हिसाब देना पड़ेगा।
संस्थान का यह कदम दुनिया के उस ट्रेंड को दिखलाता है, जिसके तहत जो कंपनियां सामाजिक दायित्वों पर खर्च किए गए एक-एक पाई का हिसाब नहीं देती उनकी प्रतिष्ठा पर उंगुलियां उठने लगती हैं। यह कारोबार के लिए तीन स्तरों पर अपनाए जाने रवैये के बारे में बताता है, जिसमें आर्थिक बातों के साथ-साथ सामाजिक और पर्यावरण के मुद्दों को भी ध्यान में रखा जाता है। इस मद में खर्च किए गए पैसों को सही सही तरीके से बताने के अपने वित्तीय फायदे भी हैं।
दुनिया की कई बड़ी कंपनियां इस बात की मिसाल हैं, जिनके शेयरों की कीमत में इस मद खर्च किए गए पैसों का पूरा हिसाब देने के बाद इजाफा ही हुआ है। ऐसा इसलिए क्योंकि आज की तारीख में यह कई देशों के शेयर होल्डरों के लिए काफी अहम मुद्दा बन चुका है। साफ बात है, भारतीय कंपनियां भी इस मामले में पीछे नहीं रह सकती हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि चूंकि कई कंपनियों ने सामाजिक सरोकारों से जुड़े खर्चों के बारे में खुद बताना शुरू कर दिया था, इसलिए आईसीएआई के इस नए कदम की कोई जरूरत नहीं थी। हालांकि, यह तर्क काफी कमजोर है। इससे होने फायदों के बारे में जानकारी होने के बावजूद वे इस बारे में या तो काफी सतही जानकारियां दे रहे थे या फिर अपने होंठे सिले बैठे रहते थे।
केपीएमजी के एक सर्वे के मुताबिक केवल 25 फीसदी कंपनियों ने ही सीएसआर रिपोर्ट दाखिल की थी। और तो और केवल आठ फीसदी कंपनियों ने ही सामाजिक सरोकारों पर खर्च किए गए पैसों को अपने बही खातों में जगह दी थी। इस बारे में होने वाले खर्चों के खुलासे के लिए रूपरेखा तैयार करने के लिए आईसीएआई संयुक्त राष्ट्र के ग्लोबल रिपोर्टिंग इनिशिएटिव (जीआरआई) के तहत बनाए गए दिशा-निर्देशों का सहारा ले सकती है।
सामाजिक सरोकारों पर ज्यादातर कंपनियां खर्च की गई अपनी रकम के बारे में जानकारी इसी रूपरेखा में देती हैं। इसका इस्तेमाल अपनी सीएसआर रिपोर्ट देने के लिए 60 देशों के कम से कम 1000 संस्थान करते हैं। इस बारे में जीआरआई का तरीका काफी सरल है। इसमें आर्थिक, पर्यावरणीय और सामाजिक मुद्दे पर कंपनियों के परफॉर्मेंस को नापा जाता है और इसे वित्तीय नतीजों की तरह ही मापा जा सकता है।
साथ ही, इससे इन मामलों में भी सतत विकास को बढ़ावा मिलता है क्योंकि इससे कंपनियों के परफॉर्मेंस को मापा जा सकता है। इस वजह से वे उन इलाकों की पहचान कर सकती हैं, जहां उन्हें अभी और काम करने की जरूरत है। इस वजह से उनके परफॉर्मेंस में भी इजाफा आएगा। इसलिए यह इन कंपनियों के लिए भी फायदे का सौदा साबित होगा।