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OLA के CEO भाविश अग्रवाल का पारंपरिक ICE दोपहिया वाहनों की मांग गिरने का अनुमान कितना सही ?

Last Updated- December 13, 2022 | 3:05 PM IST

देश में एक वो समय भी था जब सरकार किसी कंपनी को लाइसेंस जारी करती थी जिससे बाजार में बदलाव आता था। वहीं, आज के समय में नई टेक्नोलॉजी और ग्राहकों के व्यवहार में बदलाव के मद्देनजर परिवर्तन आ रहा है।

उदाहरण के तौर पर मोबाइल फोन बनाने वाली कंपनियों ने अपने कारोबार की शुरुआत लैंडलाइन से की थी। इन कंपनियों ने पहले कीपैड वाले मोबाइल फोन को बाजार में पेश किया। हालांकि, बदलते दौर के साथ इनमें भी परिवर्तन आया और उनकी जगह टच स्क्रीन मोबाइल फोन ने ले ली।

इसी तरह का बदलाव ऑटोमोबाइल बाजार में भी आया, जो बदलते समय के साथ एडवांस होती चली गई। पेट्रोल-डीजल से चलने वाली गाड़ियां आज बिजली समेत बायोमास से भी चल रही हैं और इस दिशा में लगातार बदलाव आ रहा है।

Hyundai ने भारत में अपनी पहली कार सेंट्रो नौ अक्टूबर, 1998 को लॉन्च की थी। लॉन्च करने के छह महीने बाद कंपनी भारतीय बाजार में दूसरी सबसे बड़ी वाहन कंपनी बन गई थी। इसी के साथ दक्षिण कोरिया की कंपनी ने अपने वाहनों में मल्टिपल पॉइंट फ्यूल इंजेक्शन (MPFI) की सुविधा शुरू की थी जबकि घरेलू बाजार में 88 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाली मारुति ने कार्बोरेटर प्रणाली पर ही काम करना जारी रखा था।

मारुति को कंप्यूटर आधारित MPFI को अपनाने के लिए अधिक कड़े एमीशन मानदंडों में बदलाव के लिए सुप्रीम कोर्ट को समय सीमा तय करनी पड़ी। नए मानदंडों के लिए इंजन में एक निश्चित वायु-ईंधन मिश्रण की आवश्यकता होती है जिसे केवल कार्बोरेटर बनाए नहीं रख सकता।

सदी के अंत में MPFI के आने साथ जलवायु को लेकर सजगता एक मुद्दा बनने लगी थी। अब स्थिति बहुत अलग है। अब भारतीय वाहन बाजार में नंबर दो का स्थान रखने वाली Hyundai को TATA Motars से चुनौती मिल रही है, जिसने अपने इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) के उत्पादन में तेजी से वृद्धि की है।

हालांकि, दोपहिया श्रेणी में इलेक्ट्रिक वाहनों के लिए लड़ाई तेज हो गई है। इसमें OLA इलेक्ट्रिक के CEO भाविश अग्रवाल अधिक मुखर अधिकारियों में से एक हैं। हीरो मोटोकॉर्प, बजाज ऑटो समेत स्टार्टअप्स के एक बड़ा समूह भी तेजी से इस क्षेत्र में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहा हैं।

OLA इस क्षेत्र में महत्वाकांक्षी बनी हुई है और अपने दोपहिया वाहनों की उत्पादन क्षमता को चार गुना कर 40 लाख इकाई करने की योजना बना रही है।

अग्रवाल ने बिज़नेस स्टैंडर्ड के साथ हाल में साक्षात्कार में कहा कि ICE टेक्नोलॉजी से चलने वाले दोपहिया वाहनों का पूरा बाजार अगले तीन साल में इलेक्ट्रिक में बदल जाएगा और यह ”पहाड़ से नीचे गिर जाएगा’। पेट्रोल या डीजल इंजन से चलने वाले पारंपरिक वाहन इंटरनल कंबशन इंजन (ICE) श्रेणी में आते है।

हालांकि, सामान्य दोपहिया वाहनों के इलेक्ट्रिक वाहन में बदलने का अनुमान बहुत हद तक सरकार के समर्थन पर निर्भर करता है। हाल में दोपहिया इलेक्ट्रिक वाहनों में आग लगने की घटनाओं ने सरकार के FAME कार्यक्रम के तहत सब्सिडी ले रही कंपनियों का अधिक ऑडिट करने की मांग को उठाया है।

सरकार ने स्थानीयकरण नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों को दी जा रही 30,000 से 50,000 रुपये की सब्सिडी को वापस भी लिया है। विशेषज्ञों के अनुसार, सब्सिडी तब ही कम हो सकती है जब ICE वाहनों से इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाने की दर 20 फीसदी पर पहुंच जाए। यह वर्तमान में पांच फीसदी है।

इस अंतर को कम करने के लिए दोपहिया इलेक्ट्रिक वाहन बनाने वाली कंपनियों को कई खामियों को दूर करना होगा और कई मुद्दों के हल होने की उम्मीद करनी होगी।

रिपोर्ट्स के अनुसार, Komaki Ranger ने सिंगल में चार्ज में दोपहिया इलेक्ट्रिक वाहन के 220 किलोमीटर चलने का दावा किया है, जो उद्योग में सबसे अधिक है। जबकि ज्यादातर दोपहिया वाहनों की रेंज एक बार चार्ज होने पर 140 से 180 किलोमीटर है।  

वहीं, दूसरी तरफ ICE श्रेणी की दिग्गज हीरो स्प्लेंडर फुल टैंक पर 750 किलोमीटर तक चल सकती है। बेशक ICE वाहनों की रनिंग कॉस्ट ज्यादा है लेकिन वाहन की कीमत भी उतनी ही कम है। 1.85 लाख रुपये की इलेक्ट्रिक दोपहिया Komaki Ranger की तुलना में स्प्लेंडर प्लस 70,000 रुपये की है। साथ ही इलेक्ट्रिक वाहन को चार्ज होने में कई घंटे लगते है और चार्जिंग का अच्छा इंफ्रास्ट्रक्चर भी चाहिए।

इस आधार पर ICE दोपहिया वाहन बाजार से कम से कम अगले कुछ वर्षों में तो कम नहीं होंगे। वहीं, लंबी अवधि में शायद ICE वाहनों की मांग शायद नरम हो सकती है लेकिन यह गिरेगी नहीं।

First Published - December 13, 2022 | 3:05 PM IST

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