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सितारों की छांव में हैं ओम प्रकाश चौटाला

Last Updated- December 07, 2022 | 7:04 PM IST

भारतीय ज्योतिष के अनुसार आप किसी अनहोनी को टालने की चाहे जितनी कोशिश करें, अगर आपके सितारों की दशा अनुकूल नहीं है तो वह होकर ही रहेगी।


उन सितारों के आगे किसी की भी नहीं चलती। कुछ ऐसा ही हो रहा है आज कल हरियाणा की विपक्षी दल इंडियन नैशनल लोकदल (आईएनएलडी)के साथ, जो आज भी 2005 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के हाथों मिली शर्मनाक हार से उबर नहीं पा रही है।

हुड्डा सरकार अपना आधा कार्यकाल पूरा कर चुकी है, लेकिन अभी तक आईएनएलडी एक ऐसा मुद्दा नहीं ढूंढ़ पाई, जिसके जरिये वह लोगों को अपने साथ कर सरकार को घेर सके। कोई क्यों सुने इसकी बात? विधानसभा चुनाव में इसे जनता पूरी तरह से नकार चुकी है। यह पार्टी हरियाणा की 90 विधानसभा सीटों में से केवल 9 ही जीत पाई। ओम प्रकाश चौटाला के दोनों बेटे चुनाव हार गए।

सिरसा से इसका उम्मीदवार तो डबवाली इलाके से भी वोट नहीं जुटा पाया। डबवाली वही इलाका है, जहां चौटाला का गांव स्थित है। लोगों ने आईएनएलडी ने पूरी तरह से नकार दिया और विधानसभा चुनाव के दौरान उसकी बेइज्जती अपने चरम पर पहुंच गई थी। लेकिन चौटाला के साथ हुआ क्या था और क्या इतिहास खुद को 2009 के आम चुनाव में फिर से दोहराएगा।

हरियाणा में इस वक्त तो अजीब सी शांति है। मुख्यमंत्री भूपिंदर सिंह हुड्डा के खिलाफ बगावत का झंडा बुलंद किए हुए भजनलाल को पार्टी से बाहर निकाल दिया गया है। इस तरह कांग्रेस में बगावत का सिर कुचल दिया गया है। ऐसी बात भी नहीं है कि हुड्डा सरकार बिल्कुल पाक साफ है। उस पर भी भाई-भतीजावाद और भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं। किसी कांग्रेस सरकार के लिए यह कोई नई बात नहीं है।

हकीकत में तो कांग्रेस ने हरियाणा में जीत इसलिए हासिल नहीं की क्योंकि लोग वहां उसे पसंद करते हैं। दरअसल, वे ओम प्रकाश चौटाला से ज्यादा नफरत करते थे। वे चौटाला से इस हद तक नफरत करते थे कि उन्होंने आईएनएलडी के शासनकाल में हुए विकास के कामों को भी सिरे से नजरअंदाज कर दिया। यह हालत आज भी कायम है।

इस बात में कोई दो राय नहीं है कि देवीलाल की छाया से बाहर निकल कर चौटाला एक सख्त और जिद्दी मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने चीजों को अपने तरीके से किया। फिर चाहे वह सही हो या गलत। एक ऐसे प्रांत में जहां ट्रांसफर और पोस्टिंग एक तरह का उद्योग बन गया हो और इसकी वजह से जहां मंत्रियों की कुर्सी तक चली जाती हो, वहां चौटाला ने काफी सख्ती से राज किया। वह इसके बारे में खुलकर कहने से भी बाज नहीं आए।

उनका मंत्रिमंडल पूरे मुल्क में सबसे छोटा था, जिसमें केवल 11 मंत्री शामिल थे। यह सदन की 15 फीसदी की निर्धारित सीमा से काफी कम था। आपने आईएनएलडी में किसी भी तरह की बगावत के बारे में भी नहीं ही सुना होगा। दूसरी तरफ, कांग्रेस में कभी भी चार या पांच धड़ों से कम नहीं रहा है।

उनके शासनकाल में ही हरियाणा ने बिजली सेक्टर में अपने काफी महत्वाकांक्षी सुधारों को लागू किया था। सूबे में एक स्वायत्तशासी नियामक है, जिसने पिछले चार सालों में दो बार बिजली की कीमत में इजाफा किया है। चौटाला का नजरिया बिजली के मामले में हमेशा साफ था – हर किसी को बिजली की कीमत चुकानी पड़ेगी।

उन्होंने कुछ वक्त पहले पत्रकारों को बताया था कि, ‘मत भूलिए, मैंने खेती सेक्टर को मुफ्त बिजली देने का खुले तौर पर विरोध किया था। एक समय हमने इसका वादा जरूर किया था, लेकिन हमें बाद में पता चला कि यह मुमकिन नहीं होगा।’ उनके शासनकाल में बिजली की हालत में काफी सुधार आया था।

साथ ही, राजकोषीय घाटा कम हो जाने की वजह से राज्य सरकार के खजाने की हालत भी काफी अच्छी हो गई थी। चौटाला अच्छी तरह से जानते थे कि सूबे में काफी बड़ा तबका किसानों का है, इसलिए उन्होंने ज्यादा उपज की हालत में बाजार में जबरदस्त तरीके से हस्तक्षेप करने की नीति बनाई थी। साथ ही, उन्होंने सड़कों की हालत भी काफी अच्छी बनाई।

कुछ साल पहले तक तो लोग-बाग सूबे की गङ्ढों से भरी सड़कों से गुजरने के बजाए पंजाब की चिकनी सड़कों से गुजरना ज्यादा पसंद किया करते थे। लेकिन उनके बेटों की मनमानी और आतंक ने सब गुड़ गोबर कर दिया। चौटाला को सबसे बड़ा झटका तब लगा, जब आईएनएलडी और उसकी पुरानी साथी भाजपा के बीच समझौता नहीं हो सका।

लोगों के जबरदस्त गुस्से के बावजूद भी आईएनएलडी को कम से कम 22 फीसदी वोट मिले, लेकिन वह नौ सीटें जीतने में कामयाब हो सकी। हरियाणा अपनी खास चुनावी पसंद के लिए काफी मशहूर रहा है। यहां मौजूदा सरकार दुबारा सत्ता हासिल करने में कामयाब नहीं रही है। अगर लोकसभा और विधानसभा चुनाव साथ-साथ होते हैं तो सूबे पर काबिज पार्टी को लोकसभा चुनाव में भी लोगों की नफरत झेलनी पड़ती है।

हालांकि, यह सूबा लोकसभा को केवल 10 सदस्य देता है, लेकिन लोकसभा के चुनाव यहां का मूड सेट करता है। जब राज्य की राजनीति में उनके लिए जगह नहीं बची है, तो स्वाभाविक ही है कि चौटाला अब राष्ट्रीय राजनीति में अपने हाथ आजमाएंगे। वह पहले से अपनी पार्टी का बेस राजस्थान, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में फैलाने को जबरदस्त कोशिश कर रहे हैं।

राजस्थान विधानसभा में तो आईएनएलडी के कम से कम पांच सदस्य हैं। अब वह क्षेत्रीय क्षत्रपों के साथ मिलकर तीसरा मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। अलग-अलग विचारधारा के दलों का यह मोर्चा राष्ट्रीय राजनीति पर क्या असर डाल सकता है, यह तो देखने की बात है। हालांकि, इस मोर्चे में शामिल ज्यादातर दल अपनी जनता द्वारा नकारे जा चुके हैं। इसका हरियाणा की राजनीति पर असर पड़ने की उम्मीद कम ही है।

लेकिन हरियाणा के चार बार मुख्यमंत्री रह चुके चौटाला आसानी से हार मानने वालों में से नहीं हैं। ज्यादा लोगों को पोलियो से ग्रस्त उनके बचपन की जानकारी नहीं होगी, जब उन्हें काफी मुसीबतों का सामना करना पड़ा था। हाल ही में, 70 साल की उम्र में जब वह अपने पोलियो से ग्रस्त अपने पैर को ऑपरेशन के जरिये ठीक करवाने अमेरिका गए थे, तो उन्होंने अपने दर्द के बारे में खुलकर बताया था।

वह दर्द, जो एक विकलांग बच्चा होने की वजह से लोगों से मिला था। आज तीन सालों के बाद भ्रष्टाचार के कई मामलों में सीबीआई जांच का सामने करते हुए भी उन्हें उम्मीद है कि वह मुख्यमंत्री की कुर्सी पर वापस आएंगे। लेकिन सितारे क्या इस बार उनके साथ हैं, इस बारे में कुछ कहना अभी जल्दबाजी होगी।

First Published - August 29, 2008 | 10:14 PM IST

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