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एक अकेला थक जाएगा मिलकर बोझ उठाना

Last Updated- December 07, 2022 | 10:41 AM IST

सरकार ने महंगाई पर रोक लगाने के लिए अब तक जो कदम उठाए हैं वे बहुत कारगर साबित नहीं हुए हैं और ऐसे में यह स्वाभाविक है कि सरकार की आलोचना भी होगी।


महंगाई कम होने का नाम नहीं ले रही है इसलिए अधिकांश लोगों को लगता है कि केंद्रीय बैंक को मौद्रिक नीतियां और कठोर करनी चाहिए। लोगों की आस अब रिजर्व बैंक पर है कि वह कुछ ऐसे कदम उठाएगा जिससे महंगाई की आग पर काबू पाया जा सकेगा। पर शायद लोग यह भूल रहे हैं कि कई बार नीतियों की हद से अधिक आलोचना करना भी फायदेमंद नहीं होता।

इसे कुछ इस तरीके से समझा जाए कि अगर दवा गलत दी जाती है तो वह हानिकारक होती ही है, पर अगर दवा की खुराक जरूरत से ज्यादा हो तो भी यह नुकसान ही पहुंचाती है। मर्ज का इलाज तभी हो सकता है अगर जब सही दवा की सही मात्रा में खुराक दी जाए।

माना कि हमें चुपचाप इस महंगाई का तमाशा देखने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता है और इसके लिए जो भी कदम जरूरी जान पड़े उसे उठाना भी चाहिए पर जब कठोर मौद्रिक उपाय अपनाने की बात हो तो हमें इस बात के लिए भी तैयार रहना होगा कि विकास की रफ्तार कुछ धीमी पड़ेगी। पर ऐसे हालात भी पैदा नहीं होने चाहिए जो 1996 के आस पास देखने को मिले थे जब महंगाई से निपटने के लिए मौद्रिक नीतियों को कठोर करना पड़ा था और बदले में विकास दर काफी धीमी हो गई थी।

और विकास दर में जो जबरदस्त गिरावट आई थी, उसका सिलसिला लंबे समय तक देखने को मिला था। यह आशंका जताई जा रही है कि कहीं इस बार भी हालात कुछ ऐसे ही न हों, यानी एक समय में देश की अर्थव्यवस्था पर दोहरी मार। एक तरफ तो महंगाई सुरसा की तरह मुंह फाड़े खड़ी हो और दूसरी ओर विकास दर की भी बलि चढ़ानी पड़ जाए। अब तक हम महंगाई को रोकने के लिए कुछ खास तरीके के नुस्खे ही अपनाते आए हैं, जैसे संवेदनशील उत्पादों के निर्यात पर रोक लगाना, आवश्यक पदार्थों के आयात शुल्क में कटौती और विभिन्न क्षेत्रों में सब्सिडी बढ़ाना।

जब हम सब्सिडी बढ़ाने की चर्चा करते हैं तो घरेलू तेल की कीमतों की चर्चा न की जाए, यह तो संभव ही नहीं है। सरकार ने महंगाई से निपटने के लिए काफी समय तक तेल मार्केटिंग कंपनियों को कीमतें बढ़ाने की इजाजत नहीं दी और बदले में उन्हें ऑयल बॉन्ड्स जारी करती गई। पर महंगाई को रोकने के लिए यह दूरगामी नजरिया नहीं हो सकता। आखिरकार जब तेल कंपनियों का नुकसान इतना बढ़ गया कि उनके पास निकट भविष्य में कच्चे तेल का आयात करने के लिए पैसे तक नहीं बचे थे तब जाकर सरकार की नींद टूटी और उसने कीमतों में बढ़ोतरी की। पर तब तक सरकार राजकोषीय घाटे का बोझ खुद पर काफी बढ़ा चुकी थी।

हालांकि जब सरकार ने घरेलू बाजार में तेल की कीमतें बढ़ाईं तो उसका असर कुछ ऐसा ही पड़ा जैसी आशंका जताई जा रही थी। महंगाई की आग और भड़क गई। पिछले महीने खाद्य पदार्थों और अन्य दूसरी कमोडिटीज की कीमतें कुछ इस तरह बढ़ गईं कि इससे आम आदमी का बजट बिगड़ने लगा। सबसे अजीब तो यह था कि लागत मूल्य में बढ़ोतरी नहीं होने के बाद भी बाजार में उत्पादों के दाम आसमान छूने लगे। जब खुले बाजार में कीमतें बढ़ती है और ऐसी संभावना होती है कि कीमतें कुछ समय तक ऊपर ही रहेंगी तो कारोबार के हर स्तर पर कीमतें बढ़ा दी जाती हैं।

भले ही महंगाई बढ़ रही हो पर और कारोबार के लिहाज से वातावरण अनुकूल न हो तो भी विभिन्न कारोबारों ने मार्जिन को बनाए रखा है और इसकी पुष्टि उत्साहजनक अग्रिम कर की वसूली से ही हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में हुई बढ़ोतरी का भार जल्द से जल्द उपभोक्ताओं पर डाल देना ही उचित होता है और इससे उपभोक्ताओं को एक बार में झटका नहीं लगता। उनके लिए भी इस भार को धीरे धीरे उठाना आसान रहता।

अगर हम सभी को इस बात का एहसास है कि आने वाले समय में भी पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बहुत घटने वाली नहीं हैं तो बेहतर है कि कीमतें बढ़ाई जाएं ताकि कम से कम उपभोक्ताओं को यह एहसास तो हो कि उन्हें पेट्रोल और डीजल की खपत कम करनी चाहिए। ऐसा हो तो आने वाले समय में विभिन्न देश भी कुछ ऐसी परियोजनाओं पर विचार करने लगेंगे जिसमें ऊर्जा की कम खपत होती हो। पर खाद को दी जा रही सब्सिडी की कहानी इससे कुछ अलग है।

पिछले साल अनाज की अच्छी पैदावार होने और इस साल मानसून के जल्दी दस्तक देने से किसानों में उत्साह था और उन्होंने इस बार अनाजों की बुआई जल्दी शुरू कर दी। इससे स्वाभाविक था कि खाद की कमी होने लगेगी और इसको लेकर विरोध भी शुरू होने लगा। सरकार ने भी खरीफ मौसम के शुरू होने पर खादों की कीमतों पर फिर से विचार करना शुरू किया, पर अगर यह कदम पहले उठाया जाता तो निश्चित तौर पर किसानों के सामने खाद की जो समस्या खड़ी हुई वह नहीं होती।

यही नहीं, जिस हिसाब से सब्सिडी दी जा रही थी उससे सरकार पर भी बोझ बढ़ा जबकि इस मसले पर अगर पहले से ही कोई कदम उठाया जाता तो इतनी परेशानी ही नहीं होती। ऐसे में जबकि खाद्यान्न की किल्लत पूरे दुनिया भर में देखी जा रही है और इससे जल्द छुटकारा मिलने की गुंजाइश भी नहीं है तो हमें चाहिए कि पैदावार को बढ़ाएं। मौजूदा दौर में कोई भी ऐसा कदम जो खाद के संतुलित इस्तेमाल को बढ़ावा देता हो और जिससे किसानों का मुनाफा बढ़ता हो, स्वागत योग्य है।

भले ही सरकार ने तेल की कीमतों को बढ़ाने में देर की, पर महंगाई को रोकने के उसके प्रबंधन को सिरे से ही खारिज तो नहीं कर सकते। भले ही दूरगामी नजरिये को ध्यान में रखते हुए कीमतों को बढ़ाना बेहद जरूरी था और अगर ऐसा होता तो यह एक ठोस नीति भी होती, पर क्या तब महंगाई का आंकड़ा और नहीं बढ़ गया होता? जो पहले ही 11 फीसदी से ऊपर जाकर टीस पैदा कर रही है। अब सवाल यह है कि क्या रिजर्व बैंक महंगाई से निपटने के लिए और सख्त मौद्रिक नीतियां अपनाएगा।

कमोडिटी के आयात पर जो शुल्क लगता है, उसका बोझ सरकार अब तक खुद उठाती आई है, पर जरा इस बोझ को उपभोक्ताओं पर डालने की कोशिश भी की जाए। इससे महंगाई तो बढ़ेगी पर मांग खुद ब खुद कमजोर पड़ेगी। पर जब तक संभव हो सके बाजार से तरलता को कम करने से बचना चाहिए। इससे निवेश कमजोर होगा और बेरोजगारी भी बढ़ेगी। याद रखिए कि महंगाई की मार सबसे अधिक गरीब तबके पर पड़ती है और उन पर भी जिनके पास रोजगार नहीं है।

जहां तक कच्चे तेल के आयात की बात है तो हम (भारत) अगर तेल का आयात थोड़ा कम कर भी दें तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी कीमतों पर कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। हां इससे यह जरूर होगा कि जीवाश्म ईंधन के प्रति हमारी निर्भरता कुछ कम हो जाएगी और ऐसे में अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें चढ़ती भी हैं तो हम पर इसका असर सीमित ही रहेगा। इसलिए भारत को चाहिए कि वह कठोर मौद्रिक नीतियां अपनाए बगैर महंगाई की इस मौजूदा खाई को पार कर ले।

First Published - July 10, 2008 | 11:00 PM IST

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