संसद में पिछले मंगलवार को जो नजारा देखने को मिला उससे ज्यादातर लोग हतप्रभ हैं। वोट के लिए नोट दिए जाने के मामले में सरकार के हाथ भी बंधे हुए हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) सांसदों के रिश्वत मामले में 3:2 के बहुमत से 19 अप्रैल 1998 को संविधान के अनुच्छेद 105(2) का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। जैसा कि स्वाभाविक है, न्यायालय इस मामले में जल्दी में नही था।
मूल फैसले के 2 महीने बाद न्यायालय ने सीबीआई की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें मामले पर फिर से विचार किए जाने की बात कही गई थी। इसके बाद 2000 में इस फैसले को बड़ी पीठ को सौंप दिया गया, जिसने इस मामले में अब तक कोई फैसला नहीं लिया है।
अगर न्यायालय इस मामले में कुछ नहीं करने जा रही है तो जरूरत इस बात की है कि संसद इस बारे में कुछ कदम उठाए। इसकी जरूरत कई कारणों से है। पहला, फैसले में समय समय पर होने वाले इस तरह के घृणित कार्यों के मामले में शासन करने वाली पार्टी और खासकर स्पीकर का हाथ खुला रखा गया है।
एनडीए के शासनकाल में दल बदल कानून को कड़ा कर दिया गया (अब दूसरी पार्टी को समर्थन करने के लिए किसी भी पार्टी के दो-तिहाई सदस्यों को अलग होना होगा, जबकि पहले एक तिहाई सांसद भी दूसरे पाले को समर्थन दे सकते थे।) लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन या अजित सिंह की पार्टी जैसे छोटे दलों के लिए कोई नियम नहीं बन पाया है।
यहां तक कि बड़ी पार्टियों के मामले में भी गड़बड़ियों की तमाम संभावनाएं हैं। तकनीकी रूप से देखा जाए तो अध्यक्ष के पास बहुत ज्यादा अधिकार नहीं है, लेकिन वह उन सदस्यों को सदस्यता के अयोग्य घोषित कर सकता है, जिन्होंने पार्टी व्हिप का उल्लंघन किया है। उदाहरण के लिए जय नारायण मिश्र को राज्य सभा की सदस्यता के अयोग्य घोषित कर दिया गया था, जब उन्होंने लालू प्रसाद के लिए प्रचार करना शुरू कर दिया था।
और उत्तर प्रदेश में भाजपा के विधानसभा अध्यक्ष केसरी नाथ त्रिपाठी ने मायावती के 13 विधायकों की सदस्यता खत्म करने से इनकार कर दिया था, जिन्होंने 2003 में विश्वास मत के दौरान मुलायम सिंह के पक्ष में मतदान किया। उन्हें पिछले साल तब सदस्यता के अयोग्य ठहराया गया, जब न्यायालय ने आदेश जारी किया, लेकिन तब तक तो जो नुकसान होना था, हो चुका था। इस बार तो मामला बहुत पेंचीदा हो गया है। सोमनाथ चटर्जी को सदस्यों को सदस्यता के अयोग्य ठहराए जाने के बारे में फैसला लेना है, पार्टियों ने तो दलबदलू सांसदों को निकाल दिया है।
अगर वे दलबदलू सांसदों को संसद से बाहर कर देते हैं तो उन्हें खुद भी मुसीबत का सामना करना पड़ेगा क्योंकि उन्हें भी पार्टी से बाहर किया जा चुका है। बहरहाल अगर ऐसा किया जाए कि जो सांसद विश्वास मत के दौरान मौजूद नहीं रहे या विश्वास मत के खिलाफ मतदान किया है उनकी सदस्यता स्वत: खत्म होती है तो उनकी स्थिति दूसरी होगी। लेकिन क्या संसद के पास यह अधिकार है कि वे न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करें, और क्या ऐसा होगा? दोनों के लिए जवाब सकारात्मक है।
संविधान में इस बात की अनुमति दी गई है कि न्यायालय, संसद द्वारा बनाए गए कानूनों का परीक्षण कर सकती है, संसद न्यायालयों के फैसले को पलटते हुए कानून बना सकती है। बहरहाल संसद, अनुच्छेद 9 के तहत विभिन्न कानूनों पर विचार कर सकती है और अगर वह किसी मामले को महत्त्वपूर्ण समझती है तो उस पर कानून बना सकती है। इस तरह से यूपीए सरकार ने आईटीसी के पक्ष में न्यायालय के फैसले को बदलते हुए कानून बनाया है, अवैध निर्माण को ढहाने से रोकने के लिए एक नया मास्टर प्लान लाया गया, और यह सिलसिला जारी है।
लेकिन यहां कानूनी मसले से ज्यादा यह मामला नैतिकता से जुड़ा है। बहरहाल- अगर कोई चीज कानूनी रूप से सही साबित हो जाती है तो यह जरूरी नहीं है कि वह नैतिक रूप से भी सही हो। और समय-समय पर सरकार इसका हवाला भी देती रही है। 1990 की शुरुआत में जब जस्टिस वी रामास्वामी पर भ्रष्टाचार को लेकर हमले हो रहे थे, सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा कि वे निर्दोष हैं। इसकी जांच के लिए तीन सदस्यों की समिति बनाई गई थी और यह मामला संसद में भी उठा था, जहां न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाया गया था।
हालांकि महाभियोग पारित नहीं हो सका था क्योंकि कांग्रेस ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया, जबकि न्यायाधीशों पर महाभियोग के लिए दो-तिहाई बहुमत जरूरी होता है। जस्टिस शमित मुखर्जी के मामले में, जिनका नाम डीडीए भूमि घोटाले से जुड़े बिचौलिये धर्मवीर खट्टर के साथ आया था, भी सरकार ने बहुत गंभीरता नहीं दिखाई। कानून मंत्री के रूप में अरुण जेटली ने कहा था कि सरकार न्यायाधीश के खिलाफ भी मुकदमा चलाने की इजाजत देगी । बहरहाल मुखर्जी ने इस्तीफा दे दिया और मामला आया-गया हो गया और न्यायाधीश इस मामले में कानूनी कार्रवाई का सामना कर रहे हैं।
पिछले मंगलवार को डॉ. मनमोहन सिंह को समर्थन देने के एवज में शिबू सोरेन ने कोयला मंत्री बनने के लिए सभी गोटियां बिठा ली हैं। पिछली बार सोरेन मंत्री थे, तब एक हत्या के मामले में उन पर आरोप लगे थे। उन्हें उम्मीद थी कि कैबिनेट मंत्री होने के नाते न्यायिक प्रक्रिया से बच सकेंगे, लेकिन उन्हें इस्तीफा देने को कहा गया। इसके साथ ही मामले का महत्त्व खत्म हो गया। अंतत: मामला न्यायालय के हवाले चला गया, लेकिन वह अलग मामला था।
संसद में सवाल पूछे जाने के एवज में सांसदों द्वारा पैसा लिए जाने के मामले में भी 105(1) के तहत दी गई बोलने की स्वतंत्रता और 105(2) के तहत दिए गए संरक्षण लागू होते हैं, जैसा कि जेएमएम मामले दिए गए फैसले में कहा गया। जैसा कि दिसंबर 2005 में एक स्टिंग आपरेशन के माध्यम से दिखाया गया, कुछ वैसा ही सीएनएन-आईबीएन ने पिछले मंगलवार को किया। सभी सांसद क्षतिपूर्ति में लग गए। यहां तक कि भाजपा ने भी इसमें साथ दिया, जिसके सबसे ज्यादा सांसद अयोग्य घोषित किए गए थे।
दूसरे शब्दों में कहें तो अगर बड़ी पार्टियां जेएमएम मामले जैसे मसलों का हल निकालने के बारे में नहीं सोच रही हैं तो यही कहा जा सकता है कि ऐसा इसलिए हो रहा है कि वे चाहती ही नहीं हैं। बहरहाल अगर अगली लोकसभा में भी तमाम पार्टियां उभरकर सामने आती हैं तो आखिर कौन ऐसा है जो कुछ दर्जन सांसदों को खरीदने का अवसर खोना चाहेगा?