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अनाथ जिंदगी को मिली आशा भरी नई दिशा

Last Updated- December 07, 2022 | 6:41 AM IST

आरती और उसके  पति को अपने बेटे के इलाज के लिए ज्यादा पैसों की जरूरत थी। उनके बेटे को थैलीसीमिया की बीमारी थी।


आरती कहती हैं, ‘मेरे पति एक छोटे फोटोग्राफर हैं और वह महीने में 4000 रुपये कमा लेते हैं। पर हमें अपने बेटे बेटे के इलाज के लिए ज्यादा पैसे चाहिए थे।’ आरती और उसका पति पश्चिम बंगाल में झुग्गी झोपड़ी वाले इलाके में रहते हैं।

आरती का कहना है, ‘यहां के एक स्थानीय राजनीतिक दल के दफ्तर से मुझे जानकारी मिली कि कोई गाड़ी चलाने का प्रशिक्षण मुफ्त में दे रहा है। मैंने इसमें शामिल होने का फैसला कर लिया। इसकी वजह यह थी कि जब एक बार मुझे ड्राइविंग लाइसेंस मिल जाता तो मुझे रोजगार मिलने की संभावना भी बन सकती थी।’

यह ड्राइविंग की क्लास ‘नई दिशा’ और ‘आशा संचार’ नाम के एनजीओ चला रहे थे जिसे आरती ने ज्वाइन कर लिया। आज आरती को नौकरी भी मिल चुकी है। वह एक घर में काम कर रही है और  लगभग हर महीने 4000 रुपये कमा लेती है। आरती कहती है, ‘मैं जिस घर में काम करती हूं, वहां लोग अपनी युवा बेटियों के लिए महिला ड्राइवर ही पसंद करते हैं। मैं उन्हें स्कूल या टयूशन क्लासेज के लिए ले जाती हूं। अगर उन्हें किसी पार्टी में भी जान होता है तो भी उन्हें मैं ही ले जाती हूं।’

यह केवल आरती का ही किस्सा नहीं है बल्कि इस तरह की कई महिलाएं और पुरुष प्रोजेक्ट सनशाइन से अपनी जिंदगी की नई राह तलाश रहे हैं। प्रोजेक्ट सनशाइन कोलकाता के रियल एस्टेट डेवलपर पी. एस. गु्रप द्वारा चलाया जा रहा है। पी. एस. गु्रप इस प्रोजेक्ट को अपनी कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के तहत कर रहा है। इस ग्रुप ने नई दिशा नाम का एनजीओ बनाया है और आशा संचार के साथ मिलकर एक संयुक्त उपक्रम चला रहा है।

आशा संचार ने गरीब लोगों को ड्राइविंग का प्रशिक्षण देने और सभी तरह के प्रबंध का जिम्मा लिया है वहीं नई दिशा इस प्रोजेक्ट के लिए फंड दे रही है। पी. एस. गु्रप के चेयरमैन प्रदीप चोपड़ा कहते हैं, ‘पहले मैंने जब कभी  कुछ अनाथालयों में बात की तो पता चला कि बच्चे 18 साल के बाद कभी घर में नहीं रह सकते। अगर उनकी ढंग से पढ़ाई-लिखाई नहीं हुई है तो उन्हें कोई नौकरी भी नहीं मिलेगी। नतीजे में वे गैरकानूनी काम करने के लिए मजबूर होंगे।’

चोपड़ा का कहना है कि ऐसे लोगों के लिए ड्राइविंग सीखना बेहद आसान है और इसमें खास बात यह है कि अच्छे ड्राइवरों की जरूरत हमेशा ही रहती है। पी. एस. गु्रप ने ड्राइविंग सिखाने के लिए टे्रनर भी रख लिए हैं। यह ग्रुप हर एक उम्मीदवार के  ड्राइविंग प्रशिक्षण पर लगभग 3000 रुपये खर्च करता है। इसमें टे्रनर को दी जाने वाली फीस के अलावा प्रशिक्षण के लिए ली जाने वाली कार का किराया भी शामिल है।

आशा संचार के एक अधिकारी का कहना है, ‘हम आस-पास के गली मोहल्लों और नगरपालिकाओं में प्रचार-प्रसार के लिए पर्चे भी बांटते थे। हमारी कोशिश यह थी कि इस प्रोग्राम के  फायदे के संदर्भ में लोगों की जागरुकता बढ़े। हमारे पास ज्यादातर आवेदन किशोर सुधार गृह और अनाथालयों से आए। किसी के व्यक्तिगत आवेदनों पर विचार के लिए हम उनकी वास्तविक स्थिति की जानकारी के लिए उनके घर जाते हैं।

हमारा उद्देश्य उन लोगों को प्रशिक्षण देना होता है जिनके पास कोई साधन नहीं होता है।’ एक साल पहले शुरू हुए इस प्रोजेक्ट के तहत 70 छात्र ड्राइविंग सीख चुके हैं और उन्हें लाइसेंस भी मिल गया है। 23 साल के प्रसेनजीत का कहना है, ‘दसवीं की पढ़ाई खत्म करने के बाद मैंने सड़कों पर अखबार बेचने का काम शुरू कर दिया। एक दिन मैंने अपने दोस्त से यह सुना कि कोई ड्राइविंग की ट्रेनिंग मुफ्त में दे रहा है। मैंने यह ट्रेनिंग ली।

उसके बाद नजदीक के ही एक गैरेज में मुझे ड्राइवर की नौकरी भी मिल गई। अब मैं हर एक महीने लगभग 3000 रुपये कमा लेता हूं।’ इसी तरह 20 वर्षीय अमित ने भी 3 महीने ड्राइविंग का कोर्स किया। उसका कहना है, ‘मैं सप्ताह में वहां दो दिन जाता था और तीन घंटे वहां ट्रेनिंग लेता था। टे्रेनिंग के दौरान जब मैंने 200 किलोमीटर ड्राइविंग की तब मुझे लाइसेंस मिल गया। उसके बाद मुझे अपने घर के पास ही किसी के यहां ड्राइवर की नौकरी मिल गई।’

ड्राइविंग के अलावा इस कोर्स के जरिए ट्रैफिक मैनेजमेंट, सुरक्षा-बचाव के उपाय और इमरजेंसी में कार की रिपेयरिंग कैसे की जाए, यह भी सिखाया जाता है। नई दिशा लड़कियों को घर का काम काज सिखाने के लिए भी ट्रेनिंग देती है। नई दिशा की टे्रेनिंग ले रही 19 साल की टी. नसीमा स्वादिष्ट हक्का नुडल्स बनाती है और साथ ही रंगोली बनाना भी उन्हें बेहद अच्छा लगता है।

नई दिशा हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में अवसर की तलाश कर रही है। इसके अलावा 24 घंटे की नौकरी का इंतजाम भी शहर में किया जा रहा है ताकि अपने प्रशिक्षुओं को नौकरी मुहैया कराई जा सके। नई दिशा की नई योजना गरीब बच्चों को कंप्यूटर हार्डवेयर की मुफ्त ट्रेनिंग देने की है ताकि कंप्यूटर रिपेयर सेंटर खोल कर इसके जरिए वे अपने गुजर-बसर के लिए पैसे जुटा सकें। 

First Published - June 19, 2008 | 10:25 PM IST

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