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दवा की कीमतों पर पासवान का ‘दर्द’

Last Updated- December 06, 2022 | 10:44 PM IST

पिछले कई वर्षों से रसायन और उर्वरक मंत्री रामविलास पासवान ने देश के दवा उद्योग के खिलाफ जंग छेड़ रखी है।


पासवान का आरोप है कि घरेलू दवा कंपनियां काफी ज्यादा कीमतें वसूलती हैं। वह दवा उद्योग पर लगातार कीमत और मार्जिन नियंत्रण लगाए जाने की वकालत करते रहे हैं।


वह कह चुके हैं कि 74 बल्क ड्रग्स (ऐसी कच्ची दवाएं जिनका इस्तेमाल खुद भी दवा के तौर पर होता है और दूसरी दवाओं के निर्माण में भी होता है) और इनके इस्तेमाल से बनने वाली सैकड़ों दवाओं पर कीमत और मार्जिन नियंत्रण लागू किया जाना जरूरी है।


दरअसल, पासवान ने उस परंपरा को तोड़ने की कोशिश की है, जिसके तहत वर्षों से यह बात की जा रही थी कि दवाओं पर कीमत नियंत्रण का शिकंजा धीरे-धीरे कम किया जाए। एनडीए सरकार ने 2002 में प्रस्ताव रखा था कि महज 30 बल्क ड्रग्स पर ही कीमत नियंत्रण जारी रखा जाए।


अपने तर्क को मजबूत करने के लिए पासवान नेशनल फार्मास्युटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एनपीपीए) के आंकड़ों के हवाले से यह दलीली दी थी कि किस तरह कंपनियां 50 पैसे लागत वाली दवाओं को 10 गुनी ज्यादा कीमत पर बेचती हैं।


पर दवा उद्योग ने तर्क दिया कि पासवान का बयान सिर्फ बिना ब्रांड वाली जिनेरिक दवाओं (छोटी कंपनियों द्वारा नकल कर बनाई गई दवाएं, जिन्हें किसी तरह का ब्रांड नेम भी नहीं दिया जाता है और जिन्हें दवाओं के घटकों के नाम से बेचा जाता है) पर ही लागू होता है और इनका हिस्सा घरेलू दवा कारोबार के कुल टर्नओवर का महज 5 से 10 फीसदी है।


इसके बाद पासवान ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा 2003 में दिए गए आदेश की दुहाई दी और कहा कि इस आदेश के तहत कंपनियों पर कीमत नियंत्रण को कानूनी रूप से अनिवार्य बनाया गया है। इस विवादास्पद समस्या के हल के लिए मंत्रिसमूह (जीओएम) का गठन किया गया।


पासवान ने एनपीपीए के आंकड़ों के हवाले से कहा था कि कीमतें बढ़ रही हैं, जबकि दवा उद्योग ने अपने तर्कों के समर्थन में ओआरजी-आईएमएस के आंकड़ों का सहारा लिया और इसके हवाले से कहा कि पिछले 5 वर्षों में दवा की कीमतों में सालाना 5 फीसदी के हिसाब से कमी दर्ज की गई है।


जब पासवान ने बड़ी दवा कंपनियों पर आपसी मिलीभगत से कीमतें बढ़ाने का आरोप लगाया, तो उद्योग जगत ने कहा कि देश के कुल दवा करोबार के 40 फीसदी से भी कम हिस्से पर देश की टॉप 10 दवा कंपनियों का कब्जा है (देश में दवा बनाने वाली करीब 15 हजार कंपनियां हैं)।


सिप्रोफ्लॉक्सास्लिन जैसी दवाओं के बारे में इंडस्ट्री का कहना है कि इस दवा के 101 ब्रांड बाजार में मौजूद हैं। इसी तरह, इंडस्ट्री के मुताबिक गाटीफ्लॉक्सासिन के 67, सिट्रिजिन के 83 और दूसरी कई दवाओं के कई ब्रांड बाजार में हैं।


दवा उद्योग ने मंत्रिसमूह के सामने एक प्रेजेंटेशन भी पेश किया। इसमें बताया गया कि अमेरिका में भारत के मुकाबले दवा की कीमतें 100 गुना ज्यादा हैं। यानी भारत में यदि किसी दवा की कीमत 1 रुपये है, तो अमेरिका में उसकी कीमत 100 रुपये है। इसी तरह जीओएम को यह जानकारी भी दी गई कि पाकिस्तान में भी दवा की कीमतें भारत के मुकाबले 10 गुना ज्यादा हैं।


कुल मिलाकर प्रेजेंटेशन में यह कहा गया कि देश में लोगों द्वारा हेल्थकेयर पर किए जाने वाले कुल खर्च का महज 15 फीसदी दवाओं पर खर्च किया जाता है। रिसर्च ऐंड डेवलपमेंट (आरऐंडडी) के लिए उपलब्ध कराए जाने वाले फंड और दवाओं की उपलब्धता के मुद्दे पर भी जीओएम ने विचार किया। मिसाल के तौर पर, डीपीसीओ ड्रग्स को ही लें। इन दवाओं में प्रॉफिट मार्जिन काफी कम होता है और इनके उत्पादन में सालाना 1 फीसदी के हिसाब से गिरावट दर्ज की जा रही है।


यदि कीमतें कम होंगी तो आरऐंडडी गधिविधियां कम होंगी। औसतन 12 साल तक प्रयोग के स्तर तक चलने के बाद कोई भी नई दवा बाजार में दस्तक दे पाती है। इसी तरह, हर 5 से से महज 1 दवा प्रयोग के स्तर तक पहुंच पाती है। खर्च के लिहाज से बात की जाए, तो किसी नई दवा के बाजार में पहुंचने तक की प्रक्रिया में 80 करोड़ डॉलर खर्च होते हैं।


इससे साफ है कि कम मुनाफा हासिल करने वाली कंपनियां आरऐंडडी पर खर्च नहीं कर पाएंगी। इस बात को गंभीरता से लिया जाना इसलिए भी जरूरी है कि गर्म प्रदेशों में होने वाली बीमारियों (मलेरिया, डेंगू, कालाजार आदि) की दवाओं के आरऐंडडी पर जानीमानी ग्लोबल दवा कंपनियां न के बराबर ध्यान देती हैं।


शायद यही वजह है कि 30 अप्रैल को हुई जीओएम की चौथी बैठक पासवान के लिए एक बड़े झटके जैसी साबित हुई होगी। बैठक शुरू होते ही इसके चेयरमैन शरद पवार ने कहा कि केमिकल डिपार्टमेंट और एनपीपीए के द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े दिग्भ्रमित करने वाले हैं। इसके बाद विज्ञान और तकनीक मंत्री कपिल सिब्बल ने बोलना शुरू किया। सिब्बल ने एनपीपीए के आंकड़ों की खिंचाई की।


उन्होंने कहा – एनपीपीए ने जिन दवाओं का जिक्र अपने आंकड़ों में किया है, उन दवाओं की हिस्सेदारी महज 10 फीसदी बाजार में है और स्पर्ध्दी कंपनियां इनसे एक तिहाई या 2 तिहाई तक कम कीमत पर बाजार में ये दवाएं उपलब्ध करा रही हैं। सिब्बल ने इस पूरे मसले पर मीटिंग में एनपीपीए चेयरमैन की भी जमकर खिंचाई की। बाद में जब मैंने एनपीपीए चेयरमैन से बात की, उन्होंने जीओएम की मीटिंग के बारे में कुछ भी बताने से इनकार कर दिया।


इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का आदेश क्या है? कोर्ट ने अपने आदेश में साफ तौर पर कहा है कि कीमत नियंत्रण लागू किए जाने के बारे में वह किसी तरह की मंशा नहीं रखता है। पर चूंकि पासवान बार-बार सुप्रीम कोर्ट के आदेश की दुहाई दे चुके हैं, लिहाजा जीओएम ने यह तय किया है कि कानूनी मामलों से संबंधित विभाग को यह जिम्मेदारी सौंपी जाए कि वह कोर्ट के आदेश का अध्ययन कर यह बताए कि कोर्ट ने अपने आदेश में आखिर कहा क्या है।


यदि दवाओं की ज्यादा कीमत वसूले जाने के मुद्दे पर पासवान और एनपीपीए की दलीलें सही पाई जाती हैं, तो कंपनियों के आपसी गठजोड़ की जांच की जानी चाहिए। पर यदि पासवान गलत पाए जाते हैं तो उन्हें यह कहे जाने की जरूरत है कि वह कीमत नियंत्रण के मुद्दे पर दवा उद्योग को धमकाना बंद करें।

First Published - May 11, 2008 | 11:59 PM IST

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