बड़े चुनावों से पहले अक्सर जनता की नब्ज टटोलने के लिए सर्वेक्षण कराए जाते हैं। इन सभी सर्वेक्षणों में मोटे तौर पर यह निकल कर आता है कि बेरोजगारी मतदाताओं के लिए सबसे अहम मुद्दों में एक है। अक्सर ऐसा देखा गया है कि अधिकांश राजनीतिक दल सत्ता में आने पर बड़े पैमाने पर रोजगार मुहैया करने का वादा करते हैं। लेकिन रोजगार उपलब्ध कराना एक ऐसा वादा है जो राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद कभी पूरा नहीं कर पाते। यह बात उन राजनीतिक दलों पर भी लागू होती है जो लंबे समय से सत्ता में हैं या रहे, चाहे वह पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस (15 वर्ष) हो या बिहार में जनता दल (यूनाइटेड)। अन्य राज्यों में भी स्थिति बेहतर नहीं है और उन राज्यों में भी नहीं जहां तुलनात्मक रूप से राजनीतिक स्थिरता है। सिद्धांत रूप में अगर हम यह मान भी लें कि रोजगार से जुड़ी समस्या का कोई अल्पकालिक समाधान नहीं है तो यह बात भी उतनी ही सच है कि लंबे समय तक सत्ता पर काबिज रहने के भी कोई खास परिणाम नहीं दिखे हैं।
ऐसा इसलिए है क्योंकि न तो अर्थशास्त्री और न ही राजनीतिज्ञ इस कठोर वास्तविकता को स्वीकार करना चाहते हैं। जब तक हम इसे स्वीकार नहीं नहीं करते तब तक रोजगार की समस्या का प्रभावी ढंग से समाधान नहीं किया जा सकेगा। हमें यह बात अच्छी लगे या न लगे मगर सच तो यह है कि भारत में व्यापक स्तर पर रोजगार का भविष्य या तो गिग व्यवस्था (अस्थायी) और अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) आधारित होगा या वर्ष 2030 तक रोजगार बाजार में कदम रखने वाले अधिकांश युवाओं के लिए स्व-रोजगार ही सहारा होगा। हमारी युवा आबादी यानी 15-29 वर्ष की आयु वर्ग के कामकाजी लोगों की संख्या तब तक चरम पर पहुंचने की बात कही जा रही है। इस सच्चाई को स्वीकार करने के लिए नीति-निर्माताओं और नौकरी की चाह रखने वालों, दोनों की मानसिकता में बदलाव की जरूरत है।
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) और स्वचालन (ऑटोमेशन) के बीच कंपनी क्षेत्र के सामने पेश आ रही आंतरिक और बाहरी प्रतिस्पर्द्धी चुनौतियों और सरकार नियंत्रित क्षेत्रों (शिक्षा, स्वास्थ्य, कानून-व्यवस्था) में सार्थक नौकरियां सृजित करने की क्षमता घटने के कारण स्थिर आय वाली उच्च गुणवत्ता की औपचारिक नौकरियां स्थिर हो सकती हैं या कम भी हो सकती हैं।
रोजगार के रुझानों पर उपलब्ध आंकड़े स्पष्ट तस्वीर पेश करते हैं। सरकार के वर्ष 2025 के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के मुताबिक आजीविका कमाने वाले 56.2 फीसदी लोग स्वरोजगार में हैं, अन्य 20.2 फीसदी आकस्मिक श्रमिक हैं। केवल 23.6 फीसदी वेतनभोगी या पारिश्रमिक पाने वाले लोग हैं। उद्योग जगत के वार्षिक सर्वेक्षण के वर्ष 2023-24 के आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले 25 वर्षों में संविदा श्रमिकों की संख्या दोगुनी हो गई है। यह इस शताब्दी की शुरुआत में 20 फीसदी से बढ़कर 42 फीसदी हो गई है।
अजीम प्रेमजी विश्वविद्यालय की ‘स्टेट ऑफ वर्किंग इंडिया 2026’ रिपोर्ट बताती है कि स्नातक योग्यता रखने वाले लोगों की संख्या बढ़ने के बावजूद 15 से 25 आयु वर्ग के 40 फीसदी युवा बेरोजगार हैं और हालत तो यह है कि 25 से 29 आयु वर्ग में भी 20 फीसदी लोगों को नौकरी नसीब नहीं हो रही है।
सौरभ मुखर्जी की पुस्तक ‘ब्रेकपॉइंट: द क्राइसिस ऑफ द मिडिल क्लास ऐंड द फ्यूचर ऑफ वर्क’ इसी मुद्दे को रेखांकित करती है। इसमें कहा गया है कि स्नातक होने से नौकरी की गारंटी नहीं मिलती बल्कि इससे बेरोजगारी की आशंका बढ़ जाती है। मुखर्जी के मुताबिक मध्यम वर्ग में लगभग 5 लाख से 1 करोड़ रुपये कमाने वाले 4 करोड़ करदाता शामिल हैं मगर रोजगार सृजन के लिए महत्त्वपूर्ण यह समूह स्वचालन, एआई और अत्यधिक विनियमन (अन्य कारकों के साथ) के कारण पेश आ रही बाधाओं के कारण बढ़ नहीं रहा है। सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवाएं, बैंकिंग एवं वित्त और दूरसंचार जैसे उच्च रोजगार सृजन वाले क्षेत्र अब पहले की तरह रोजगार देने में सक्षम नहीं हैं।
मुखर्जी के विचार में भारत के 4 करोड़ से अधिक मजबूत मध्यम वर्ग की व्यय क्षमता ठिठकने और उन पर बढ़ते कर्ज रोजगार के अवसरों में इजाफा होने नहीं देंगे। इसका कारण यह है कि लगभग 20 करोड़ अन्य भारतीय प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इसी वर्ग से अपनी आजीविका कमाते हैं जिनमें रसोइये, घरेलू सहायक, डिलिवरी एजेंट, राइड-हेलिंग प्लेटफॉर्म कर्मचारी आदि आते हैं। मध्यम कौशल और मध्यम स्तर की नौकरियों में रोजगार सबसे अधिक कम हुए हैं। स्वचालन और एआई इसके लिए जिम्मेदार रहे हैं। बैंकों में यह बदलाव देखा जा सकता है जहां मध्यम कौशल वाली नौकरियां कम हो रही है और अधिकारियों के पक्ष में पलड़ा भारी होता जा रहा है।
जिन नौकरियों की उपलब्धता थोड़ी अधिक है वे उच्च कौशल और निम्न कौशल की जरूरत वाली हैं। रोजगार बाजार में ध्रुवीकरण हो चुका है और हमें इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा। रोजगार के प्रति निराशावादी दृष्टिकोण नहीं रखने पर भी अधिकांश नीतियों को इसी मुद्दे पर केंद्रित करना होगा। सवाल यह नहीं है कि रोजगार में असमानता को समाप्त किया जा सकता है या नहीं बल्कि यह है कि हम निचले स्तरों पर रोजगारों को कैसे बढ़ा सकते हैं और उन्हें आजीविका के सार्थक स्रोत के रूप में कैसे स्थापित कर सकते हैं।
इस स्थिति से निपटने के लिए अर्थशास्त्री जो उपाय सुझा रहे हैं उनमें कौशल विकास, विनियमन में ढील, प्रशिक्षु कार्यक्रमों में वृद्धि और शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार आदि शामिल हैं। ये सभी उपाय हैं मगर इन्हें अच्छी तरह से लागू करने पर भी तत्काल कोई परिणाम नहीं मिलेंगे। पहला बात तो यह कि कौशल विकास कार्यक्रम सिर्फ सरकारी पहल के माध्यम से सफल नहीं होगा क्योंकि यह आपूर्ति पक्ष से जुड़ी समस्या नहीं बल्कि मांग आधारित समस्या है।
कंपनी क्षेत्र (जिसे पता है कि स्थायी नौकरियों की मांग कहां है) को पाठ्यक्रम तैयार करने और कौशल विकास एजेंसियों के साथ मिलकर कौशल विकास को बढ़ावा देने की आवश्यकता है। सरकारें इन प्रयासों में केवल सहायता या सब्सिडी प्रदान कर सकती हैं। दूसरा बात यह कि विनियमन में ढील केंद्र के स्तर पर कोई बड़ी समस्या नहीं है। राज्य और नगर निकायों के स्तरों पर विनियमन की वजह से उत्पन्न टकराव वास्तव में रोजगार सृजन में बाधा उत्पन्न करते हैं। कारोबार विकास के लिए जरूरी अधिकांश चीजें (भूमि, बिजली, पानी और भौतिक और सामाजिक बुनियादी ढांचा, श्रम कानून) राज्य के अधिकार क्षेत्र में हैं।
अधिकांश भ्रष्टाचार और अनुचित लाभ कमाने की प्रवृत्ति भी सरकार के इन्हीं निचले स्तरों पर देखी जाती है। इन स्तरों में बदलाव बहुत धीमी गति से हो रहा है इसलिए स्वचालन एक आसान विकल्प है। तीसरी बात, मुफ्त की योजनाओं की संस्कृति जो अब हमारी चुनावी लोकतंत्र की एक प्रमुख विशेषता बन गई है, वह राज्यों के पूंजीगत व्यय और राजस्व व्यय, दोनों को प्रभावित कर रही है। तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल में हाल ही में हुए संपन्न चुनावों में (जहां डीएमके और तृणमूल को निःशुल्क योजनाएं चलाने के बावजूद हार का सामना करना पड़ा) से यह स्पष्ट है कि नई पार्टी के पास विकास और रोजगार में निवेश करने के लिए ज्यादा धन नहीं बचेगा।
चौथी बात जो सबसे महत्त्वपूर्ण है, वह यह कि कई दशकों से चली आ रही आरक्षण नीति की राजनीति (जो जाति सर्वेक्षणों के बाद और भी बदतर हो सकती है) ने नागरिकों के मन में यह बात बैठा दी है कि ठाठ की नौकरियां उपलब्ध कराना सरकार का काम है। सामाजिक अपेक्षाओं के अनुसार नौकरियां (विशेषकर सरकारी) आबादी के एक बड़े हिस्से के लिए आकांक्षाओं की सीढ़ी पर सबसे ऊपर हैं जबकि विनिर्माण या सेवा क्षेत्र में निजी नौकरियां उससे कहीं नीचे आती हैं। इंजीनियर भी आईटी कंपनियों के लिए कोडिंग करना चाहते हैं न कि उन कंपनियों में इंजीनियरिंग का काम करना जो राष्ट्र निर्माण में लगी हैं। कोई भी चुनावी उथल-पुथल इस स्थिति को नहीं बदल सकती जब तक हम गिग कार्य, स्वरोजगार और स्टार्टअप की वास्तविकता को स्वीकार नहीं कर लेते। आने वाले वर्षों में रोजगार बाजार में प्रवेश करने वाले करोड़ों लोगों के लिए आजीविका का जरिया तैयार करने में इनकी अहम भूमिका रहने वाली है।
हमारे बैंकों का विकास गैर-वेतनभोगी लोगों को ऋण देने और उनकी सेवा करने से होगा। सरकारों और बिजनेस स्कूलों को वेतनभोगी नौकरियों के बजाय उद्यमिता को बढ़ावा देना चाहिए। वेतनभोगी नौकरियां उपलब्ध होती रहीं तो यह निश्चित रूप से अच्छी बात होगी मगर स्वयं यह अपने आप में समाधान नहीं होगा। समाधान तभी निकलेंगे जब हम वास्तविकता को स्वीकार करने के लिए अपनी मानसिकता बदलेंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)