विकसित देशों के केंद्रीय बैंक आज यूक्रेन में छिड़े युद्ध को लेकर वशीभूत हैं जबकि उभरते बाजारों के केंद्रीय बैंक अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा उठाए जा रहे कदमों के अधीन हैं। जो लोग हाल के महीनों में मुद्रास्फीति को लेकर केंद्रीय बैंकों की भूमिका को गलत मान रहे हैं, वे शायद तथ्यों की अनदेखी कर रहे हैं।
2007 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान केंद्रीय बैंकों को पता था कि उन्हें क्या करना है। उन्हें अपनी मौद्रिक नीति शिथिल करनी थी और ऐसा करते रहना था। महामारी के दौरान भी यही करना था। अब हालात उतने स्पष्ट नहीं हैं। यूक्रेन युद्ध ने मौद्रिक नीति की गतिविधियों को अत्यधिक कठिन बना दिया है। अभी भी यह पता नहीं है कि वहां आगे चलकर हालात क्या मोड़ लेंगे? रूस के खिलाफ पश्चिमी देशों के प्रतिबंध असाधारण रूप से गंभीर हैं। ऐसे में यह कहा नहीं जा सकता है कि विवाद बढ़ने पर रूस किस प्रकार प्रतिक्रिया देगा।
अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के सामने भी एक बड़ी चुनौती है। अमेरिका में मुद्रास्फीति की दर जून में 9.1 फीसदी थी। इस बीच विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि मंदी का आना तय है। कुछ विश्लेषकों का तो यह भी दावा है कि अमेरिका पहले ही मंदी का शिकार हो चुका है। इसका अर्थ यह हुआ कि फेडरल रिजर्व अब मुद्रास्फीति से मुकाबला करने के लिए दरों में धीमी गति से इजाफा करेगा। जुलाई में फेडरल रिजर्व की मुक्त बाजार समिति की पिछली बैठक के बाद फेड के चेयरमैन जेरोम पॉवेल ने मंदी की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर दिया था। जुलाई में अमेरिका में बेरोजगारी की दर 3.5 फीसदी थी। यह स्तर महामारी के पहले निर्धारित किया गया था। इसका अर्थ यह था कि फेड और आक्रामक ढंग से सख्ती बरतेगा। अगर यह बात पर्याप्त भ्रामक नहीं है तो यूक्रेन में छिड़ी जंग की थाह लगाना बहुत मुश्किल है। क्या हमें अंदाजा भी है कि यूक्रेन की घटनाओं ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कितना असर डाला है? यदि केंद्रीय बैंक यह मानते हैं कि तेल कीमतें 100 से 110 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में रहेंगी तो उनका यह निष्कर्ष उचित माना जाएगा कि फिलहाल मुद्रास्फीति ज्यादा बड़ी चुनौती है। बहरहाल, अगर रूस आपूर्तियों में नाटकीय कटौती करता है तो तेल कीमतों को लेकर लगाए जा रहे अनुमान धरे रह जाएंगे।
जेपी मॉर्गन चेज ने चेतावनी दी है कि अत्यधिक अतिरंजित परिस्थितियों में पश्चिम द्वारा तेल कीमतों पर लगाए गए प्रतिबंध के बदले रूस तेल आपूर्तियों में नाटकीय कटौती कर सकता है। तब तेल कीमतें बढ़कर 380 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं। उस कीमत पर वैश्विक वृद्धि ढह जाएगी और मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंकों की प्राथमिकता नहीं रह जाएगी।
यूक्रेन से उत्पन अनिश्चितता इतनी अधिक है कि पिछली बैठक के बाद पॉवेल ने आगे कुछ भी कहने से दूरी बनाई। ऐसे में यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि आने वाले समय में दरों में कितना इजाफा हो सकता है। फेड भी ऐसी किसी जल्दी में नहीं है कि मुद्रास्फीति के लक्ष्य को अमेरिका में में दो फीसदी के दायरे में लाया जाए। वह 2023 के अंत तक उस लक्ष्य को हासिल करके प्रसन्न रहेगा। अगर फेड के लिए काम इतना जटिल है तो भारतीय रिजर्व बैंक समेत उभरते बाजारों के केंद्रीय बैंकों के लिए चुनौती का अंदाजा लगाया जा सकता है। वृद्धि और मुद्रास्फीति के पूर्वानुमान के अलावा उन्हें विनिमय दर पर भी नजर रखनी होगी। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) ने इस महीने के आरंभ में जो रुख अपनाया उसे इस बात से समझा जा सकता है। एमपीसी ने 2022-23 के लिए वृद्धि और मुद्रास्फीति के अपने पूर्वानुमान में कोई बदलाव नहीं किया। उसने नीतिगत दरों में 50 आधार अंकों का इजाफा जरूर किया। एमपीसी ने कहा कि मुद्रास्फीतिक अनुमानों को थामने और दरों को 4 फीसदी के दायरे में लाने के लिए यह बढ़ोतरी आवश्यक थी।
यह बात बहुत विश्वसनीय नहीं लगती। अब तक जो कदम उठाए गए हैं उनके अनुसार तो आरबीआई अधिक से अधिक यही आशा कर सकता है कि मुद्रास्फीति की दर को 2023 के अंत तक ही वांछित स्तर तक लाया जा सकेगा। ठीक फेडरल रिजर्व की तरह। फेड की तरह आरबीआई ने भी आगे के लिए कोई निर्देश नहीं दिया है। ज्यादा विश्वसनीय व्याख्या यह है कि आरबीआई फेड के 75 आधार अंकों के इजाफे के बाद रुपये की विनिमय दर का प्रबंधन करने को उत्सुक है। अन्य मुद्राओं के मुकाबले रुपये की वास्तविक प्रभावी विनिमय दर बीते वर्ष स्थिर रही है। विश्लेषकों ने कहा है कि निर्यात बढ़ाने के लिए वास्तविक प्रभावी विनिमय दर में अवमूल्यन किया जा सकता है।
बहरहाल जब बात पूंजी प्रवाह के प्रबंधन की आती है तो डॉलर के मुकाबले विनिमय दर मायने रखती है। डॉलर फंड के मामले में सुरक्षित है। पूंजी प्रवाह को बढ़ाने के लिए यह अहम है कि रुपया डॉलर के मुकाबले अधिक अवमूल्यित न हो। यदि पोर्टफोलियो निवेशकों को डॉलर के मुकाबले तीव्र गिरावट का अहसास हो जाता है तो रुपये का साथ छोड़ देंगे। आरबीआई के नीतिगत दर संबंधी कदम काफी हद तक फेड से संचालित हैं। ऐसे में आश्चर्य की बात है कि अगर फेड ने मामूली बढ़ोतरी की होती तो क्या आरबीआई ने रीपो दर बढ़ाई होती?
व्यापक स्तर पर सोचें तो केंद्रीय बैंक के आलोचक कहते हैं कि केंद्रीय बैंक महामारी के बाद मुद्रास्फीति को थामने में विफल रहे। कई लोग मानते हैं कि केंद्रीय बैंकों ने वैसी मुद्रास्फीति जनित मंदी की बुनियाद रख दी है जैसी 1973 और 1979 में तेल के झटके के बाद दिखी थी। बैंक ऑफ इंटरनैशनल सेटलमेंट्स (जून 2022) की वार्षिक आर्थिक रिपोर्ट यह स्पष्ट करती है कि आलोचक गलत हैं। इस बार जिंस कीमतों का आचरण सन 1970 के दशक से अलग है। आर्थिक परिदृश्य और मौद्रिक नीति व्यवस्था पर भी यही बात लागू होती है। पहली बात तो यह कि तेल कीमतों का झटका इस बार उतना गंभीर नहीं है। 2021 के मध्य से अब तक तेल कीमतों में 50 फीसदी का इजाफा हुआ है जो उनके दीर्घावधि के औसत के अनुरूप ही है। सन 1973 में तेल कीमतें एक महीने में दोगुनी हो गई थीं और ऐतिहासिक स्तर तक पहुंच गई थीं। दूसरी बात, ऊंची ईंधन कीमतें आज वृद्धि को कम प्रभावित करती हैं क्योंकि सकल घरेलू उत्पाद में ऊर्जा घनत्व कम हुआ है। तीसरी बात, सन 1973 में कीमतों में इजाफा कई वर्षों की मुद्रास्फीति के बाद हुआ था। इसके विपरीत इस बार ऐसा कई वर्षों की धीमी मुद्रास्फीति के बाद हो रहा है। आखिर में मौद्रिक नीति के लिए संस्थागत ढांचा और मुद्रास्फीतिक अनुमानों को संभालने की काबिलियत आज ज्यादा है।
आने वाले वर्ष में आर्थिक मंदी के पूर्वानुमान अपरिपक्व हैं और केंद्रीय बैंक की आलोचना करना सही नहीं है। मुद्रास्फीति के मामले में केंद्रीय बैंक बहुत पीछे नहीं हैं और न ही अमेरिका में सॉफ्ट लैंडिंग (अर्थव्यवस्था का स्वीकार्य ढंग से धीमा होना) सोच से बाहर है। यकीनन अगर यूक्रेन में हालात और बिगड़ते हैं तो जीवन में नाटकीय बदलाव आएंगे। लेकिन केंद्रीय बैंक इसकी तैयारी नहीं कर सकते।