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युद्ध के लिए अर्थव्यवस्था तैयार करना: भारत को संघर्ष-प्रधान दुनिया के लिए अनुकूल होना होगा

भारत को अब यह स्वीकार करना होगा कि दुनिया में टकराव की स्थिति बनी रह सकती है ऐसे में युद्ध के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को तैयार करना चाहिए। बता रहे हैं आर जगन्नाथन

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आर जगन्नाथन   
Last Updated- March 12, 2026 | 9:49 PM IST

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सितंबर 2022 में शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के समरकंद शिखर सम्मेलन के दौरान दिया गया बयान समय के साथ सही साबित नहीं हुआ है। रूस के राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन से हुई मुलाकात के दौरान उन्होंने कहा था, ‘मुझे पता है कि आज का दौर युद्ध का नहीं है।’ यह बयान यूक्रेन युद्ध शुरू होने के सात महीने बाद आया था जब दुनिया रूस की आक्रामकता के खिलाफ स्पष्ट रुख न लेने के लिए भारत की आलोचना कर रही थी।

आज स्थिति यह है कि रूस-यूक्रेन युद्ध अभी तक खत्म नहीं हुआ है जबकि पश्चिम एशिया में एक और बड़ा संघर्ष भड़क उठा है जिसमें इस बार अमेरिका, इजरायल के साथ खड़ा है। ईरान केवल उनके खिलाफ ही नहीं बल्कि पड़ोसी इस्लामी देशों के खिलाफ भी जवाबी कार्रवाई कर रहा है।

पिछले वर्ष भारत को भी पहलगाम आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान के साथ लगभग चार दिनों तक युद्ध जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा था। अब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के खिलाफ भी अपना संघर्ष शुरू कर दिया है। इसके अलावा अफ्रीका के कई हिस्सों में चल रहे युद्धों का तो यहां जिक्र भी नहीं किया गया है। आदर्श रूप से देखा जाए तो वाकई यह समय युद्ध का नहीं होना चाहिए क्योंकि मानवता आज कई साझा चुनौतियों का सामना कर रही है जैसे जलवायु परिवर्तन और तकनीकी बाधाओं से पैदा हो रही समस्याएं आदि लेकिन वास्तविकता यह है कि यह दौर शांति का भी नहीं है।

भारत के लिए जरूरी है कि सीमा पर मौजूदा अपेक्षाकृत शांत स्थिति का उपयोग अपनी सैन्य तैयारी मजबूत करने में किया जाए ताकि भविष्य में युद्ध को रोका जा सके। आज दुनिया भर में दोबारा हथियारों से लैस होने की होड़ चल रही है। यूरोप अपनी सैन्य ताकत बढ़ा रहा है और जापान भी ऐसा ही कर रहा है। चीन और अमेरिका के बीच सैन्य प्रतिस्पर्धा तो कभी रुकी ही नहीं। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान, चीन, तुर्किये और अजरबैजान के बीच सहयोग ने यह संकेत दिया है कि भारत का पड़ोस बेहद संवेदनशील है।

एक छोटी सी सामरिक-रणनीतिक गलती भी पूरे उपमहाद्वीप में बड़े युद्ध का रूप ले सकती है जिसमें भारत को कई ताकतों से एक साथ कुछ प्रत्यक्ष और कुछ अप्रत्यक्ष रूप से लड़ाई लड़नी पड़ सकती है। भारत की बांग्लादेश से लगी पूर्वी सीमा भी अब पहले जितनी सुरक्षित नहीं मानी जा सकती जैसी कि शेख हसीना के शासनकाल में थी।

खासतौर पर तब जब वहां जमात-ए-इस्लामी मुख्य विपक्षी दल बनकर उभरा है और उसने भारत से सटे सीमावर्ती इलाकों में कई संसदीय सीटें जीती हैं। भारत लंबे समय तक रक्षा और सुरक्षा खर्च के मामले में कुछ हद तक लापरवाह रहा है। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार के दौरान इस दिशा में बदलाव जरूर आया है लेकिन वैश्विक और पड़ोसी देशों से बढ़ते खतरों के मुकाबले यह बदलाव अभी भी पर्याप्त तरीके से तेज नहीं माना जा सकता है।

मोदी सरकार को घरेलू रक्षा खरीद बढ़ाने और स्वदेशी सैन्य क्षमता विकसित करने की दिशा में कदम उठाने में भी कई साल लग गए। यहां तक कि जब विदेश से रक्षा साजो-सामान का आयात किया गया तब भी इस निर्णय में काफी हिचक थी। वर्ष 2016-17 में फ्रांस से लड़ाकू विमान खरीदते वक्त यह नहीं सोचा गया कि केवल दो स्क्वाड्रन हमारी रक्षा जरूरतों के लिए पर्याप्त होंगे या नहीं। उस समय मिग, जगुआर और मिराज जैसे कई पुराने विमान अपनी उपयोगिता की अवधि पार कर चुके थे।

आज स्थिति यह है कि भारतीय वायुसेना की स्वीकृत क्षमता 42 स्क्वाड्रन की है जबकि हमारे पास लगभग 30 या उससे भी कम स्क्वाड्रन ही हैं। अब हम जल्दबाजी में 114 राफेल लड़ाकू विमान खरीदने की योजना बना रहे हैं लेकिन उन्हें भी आने में कई साल लगेंगे। वहीं स्वदेशी एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (स्टेल्थ फाइटर) के उत्पादन और उसकी तैनाती में अभी कम से कम एक दशक लग सकता है।

इस स्थिति में सबसे बड़ी जरूरत हमारे सोचने के तरीके में बदलाव की है। अब हमें केवल एक शांतिप्रिय गणराज्य बनकर परिस्थितियों को सहने की मानसिकता से आगे बढ़ना होगा और हर संभावित चुनौती के लिए तैयार रहना होगा। हमें यह स्वीकार करना होगा कि दुनिया अब पहले की तुलना में अधिक संघर्षपूर्ण हो चुकी है। हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि भारत को पूरी तरह युद्ध पर आधारित अर्थव्यवस्था बनना चाहिए। लेकिन हमें ऐसी अर्थव्यवस्था बनानी होगी जो जरूरत पड़ने पर तेजी से अपनी औद्योगिक और तकनीकी क्षमता का इस्तेमाल करते हुए युद्ध सामग्री तैयार कर सके।

इससे हम किसी भी युद्ध का सामना करने और दुश्मनों को रोकने की क्षमता हासिल कर सकेंगे। आज के आधुनिक युद्ध केवल सीमाओं पर ही नहीं लड़े जाते। वे हवा, समुद्र और साइबर स्पेस में भी लड़े जा सकते हैं। ड्रोन और मिसाइलों के इस्तेमाल के कारण कई बार दुश्मन से सीधे संपर्क की भी जरूरत नहीं पड़ती। यूक्रेन और ईरान से जुड़े युद्धों से एक और महत्त्वपूर्ण सबक मिलता है कि केवल मजबूत होना पर्याप्त नहीं है विशेषतौर पर तब जब विरोधी पक्ष युद्ध की आंच को नागरिक और औद्योगिक ढांचे तक फैलाने में सक्षम हो।

रूस ने व्यवस्थित तरीके से यूक्रेन के बिजली तंत्र और अन्य बुनियादी ढांचे को नष्ट किया है जबकि इजरायल ने गाजा में भी इसी तरह के हमले किए। अब ईरान भी केवल अमेरिका और इजरायल के सैन्य ठिकानों को ही नहीं बल्कि कई देशों के नागरिक ठिकानों को निशाना बना रहा है जैसे कि कतर, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), बहरीन, कुवैत, इराक, ओमान और यहां तक कि सऊदी अरब तथा साइप्रस को भी।

यह अक्सर कमजोर पक्ष की रणनीति होती है जिसमें वह इतनी व्यापक तबाही मचाने की कोशिश करता है कि ताकतवर दुश्मन भी यह सोचने लगता है कि यह लड़ाई जारी रखना उचित भी है या नहीं। अगर भारत और पाकिस्तान के बीच संघर्ष कुछ दिनों से अधिक लंबा खिंचता है तब पाकिस्तान भी इसी तरह की रणनीति अपना सकता है। वह भारत के नागरिक, औद्योगिक और सेवा क्षेत्र के ढांचे को निशाना बनाने की कोशिश करेगा। इसके साथ ही वह देश के भीतर सांप्रदायिक तनाव पैदा करने की कोशिश भी कर सकता है ताकि भारत को बाहरी मोर्चे के साथ-साथ अंदरूनी मोर्चे पर भी संघर्ष करना पड़े। आज ईरान भी अपने विरोधियों के खिलाफ इस्लामी दुनिया में जनभावनाएं भड़काने की कोशिश कर रहा है।

हमारी प्राथमिकताएं कुछ इस प्रकार होनी चाहिए: पहला, हमारे सभी सैन्य साजो-सामान मसलन टैंक, लड़ाकू विमान, पनडुब्बियां, युद्धपोत, रॉकेट और ड्रोन फोर्स आक्रामक रूप से अधिक से अधिक स्वदेशी होने चाहिए। जरूरत पड़ने पर निजी क्षेत्र को रक्षा क्षेत्र में सक्षम बनाने के लिए सरकार के सहयोग से कुछ निजी कंपनियों के एकाधिकार वाली स्थिति बनाई जा सकती है ताकि वे बड़े पैमाने पर उत्पादन कर सकें।

दूसरा, हमें अपनी साइबर और सूचना युद्ध क्षमताओं को तेजी से बढ़ाना होगा। तीसरा, नागरिक उत्पादन क्षमता को युद्ध सामग्री में जल्दी बदलने के लिए नागरिक और रक्षा उद्योग के बीच साझेदारी जरूरी है। चौथा, सार्वजनिक और निजी रक्षा इकाइयों को शैक्षणिक संस्थानों के साथ जोड़कर तकनीक को अत्याधुनिक बनाने की प्रक्रिया और अधिक तेज करनी होगी।

पांचवा, सिर्फ तकनीक या उपग्रह निगरानी से काम नहीं चलेगा, इसलिए पारंपरिक मानव खुफिया तंत्र और तकनीकी निगरानी दोनों में भारी निवेश जरूरी है। उदाहरण के लिए ईरान के शीर्ष नेतृत्व को केवल आसमान से निगरानी या तकनीकी जासूसी से हटाया नहीं जा सकता।

छठा, यदि औद्योगिक और नागरिक ढांचे को लक्षित किया जाता है मसलन बिजली, रिफाइनरी या जल आपूर्ति बाधित होती है तब सरकार और पुलिस के बीच प्रभावी समन्वय होना चाहिए ताकि जनता को शांत रखा जा सके और आपूर्ति बहाल की जा सके। सातवां, हमें केवल युद्ध सामग्री ही नहीं बल्कि ऊर्जा और अन्य आवश्यक वस्तुओं के भी पर्याप्त भंडार रखने चाहिए। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को बाधित करना दिखाता है कि तेल भंडार, युद्ध और नागरिक दोनों की जरूरतों के लिए कितना महत्त्वपूर्ण है।

आठवां, हमें युद्ध के दौर के लिए मीडिया और सोशल मीडिया प्रोटोकॉल तैयार करने होंगे ताकि दुश्मन फर्जी और भ्रामक जानकारी के जरिये जनता का मनोबल तोड़ न सके। दुनिया अब सुरक्षित नहीं है और हमें किसी भी चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार रहना होगा।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

First Published : March 12, 2026 | 9:42 PM IST