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निकम्मेपन का चोला ओढतीं निजी कंपनियां

Last Updated- December 07, 2022 | 2:43 PM IST

आजकल एक अजीब सी बात हो रही है। इसने अब तक एक बड़े बदलाव की शक्ल अख्तियार नहीं की है, और न ही यह इतने बड़े पैमाने पर हो रहा है कि माकपा की बांछें खिल जाएं।


लेकिन आज आपको एक अजीब सा बदलाव देखने को मिल रहा है। कभी खून चूसने वाले और निकम्मे कहकर ठुकराए जा चुके सरकारी दफ्तरों की तरफ लोग-बाग अब वापस लौट रहे हैं। वजह है, प्राइवेट सेक्टर और उसके काम करने के तरीके से लोगों का मोहभंग होना।

मेरे मुताबिक तो प्राइवेट कंपनी को किसी सरकारी कंपनी से भी गया गुजरा कहना, प्राइवेट सेक्टर की सबसे बड़ी गाली हो सकती है। लेकिन अब काफी उलझन में हूं। दरअसल, प्राइवेट सेक्टर के लोग अब सरकारी तरीके से काम करने लगे हैं और सरकारी अफसर अब निजी क्षेत्र के अधिकारियों के माफिक काम कर रहे हैं।

अगर आपको इस बात का भरोसा नहीं हो रहा है, तो इसके सबूत आपको टेलीकॉम, नागरिक विमानन, मीडिया और बैंकिंग में मिल सकते हैं। आप सोच रहे होंगे कि मैंने इन्हीं सेक्टरों के नाम क्यों लिये? दरअसल इन्हीं सेक्टरों ने पिछले कुछ सालों से कामयाबी की सीढ़ियां तेजी से चढ़ी हैं। लेकिन आज इन चारों के चारों सेक्टरों में प्राइवेट कंपनियों की सर्विस क्वालिटी की हालत बद से बदतर हो चुकी है। इन सेक्टरों में काम करने वाली कंपनियां उपभोक्ताओं को बोझ समझती हैं। उनके साथ बिल्कुल उसी तरह बर्ताव कर रही हैं, जैसे पहले सरकारी कंपनियां किया करती थीं।

दूसरी तरफ, लगता है कि अपनी गलतियों से सरकारी कंपनियों ने अच्छी तरह से सीख ले ली है। वे अब जान गई हैं कि अगर आप अपनी सेवा थोड़ी सी भी बेहतर करते हैं तो उसका काफी अच्छा असर होता है। प्राइवेट मोबाइल फोन कंपनियों के अधिकारियों के काम करने का स्टाइल तो बिल्कुल सरकारी बाबूओं की तरह हो गया है। जब तक आप उनसे आधे-एक घंटे तक बहस नहीं करते, तब तक तो वे आपकी बात ही नहीं समझ सकते। उन्हें सब कुछ लिखित में चाहिए। चाहे आपको कनेक्शन भी क्यों न कटवाना हो, वे आपसे कहेंगे कि इसके बारे में भी अर्जी लिखकर दीजिए।

मैं तो आपको इस बारे में कम से कम दर्जन भर से ज्यादा कहानी सुना सकता हूं क्योंकि मेरे परिवार में ही एक ही मोबाइल फोन कंपनी के पांच से छह कनेक्शन हैं। मुझे अब नंबर पोटर्ेबिलिटी का इंतजार है, ताकि मैं नंबर बदले बिना, कनेक्शन तो बदल सकूं। दूसरी तरफ, एक बड़ी एयरलाइंस कंपनी की कहानी भी बड़ी दुख भरी है। अभी कुछ ही साल पहले इसने पंख फैलाकर हवा में उड़ाना शुरू किया था, लेकिन 18 महीनों के बाद ही इसका मुनाफा दम तोड़ने लगा। अब इसके मुनाफे का प्लेन क्रैश होने की कई वजह है और ये सारी वजहें काफी हद तक जायज भी हैं। लेकिन सरकारी एयरलाइंस को भी तो ये परेशानियां हो रही होंगी?

खैर, आखिर में तो नतीजे ही अहमियत रखते हैं। मैं जिस एयरलाइन की बात कर रहा हूं, उसकी सेवा दिनोदिन बदतर होती जा रही है। दूसरी तरफ, सरकारी एयरलाइंस कंपनी, एयर इंडिया की सेवा में अब काफी सुधार आया है। अब बात करते हैं बैंकों की। आज की तारीख में भी आप बड़े से बड़े प्राइवेट बैंकों की कार्यप्रणाली और 1980 के दशक के स्टेट बैंक की कार्यप्रणाली में काफी समानता देख सकते हैं। यहां भी बात वही है। बार-बार होने वाली दिक्कतों से लोग काफी परेशान हैं। यहां तक कि प्राइवेट बैंकों की ऑनलाइन सेवा से भी लोग काफी ज्यादा परेशान हैं।

जब बात आती अपने ग्राहकों को खुश रखने की तो प्राइवेट बैंक के लिए यह चीज ना पूरा हो सकने वाला सपना बन जाता है। आखिर में बात करते हैं इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की। जितने लोगों को मैं जानता हूं, उनमें से ज्यादातर अब खबरों के लिए वापस दूरदर्शन और आकाशवाणी का रुख कर रहे हैं। वजह काफी सिंपल है। दूरदर्शन और आकाशवाणी पर पूरी खबरें मिल जाती हैं, जो आज की तारीख में निजी खबरिया चैनलों पर कम ही देखने को मिलती है। दूरदर्शन और आकाशवाणी ने आज भी खबरों की गंभीरता को बरकरार रखा है, जबकि निजी खबरिया चैनल अपनी टीआरपी की खातिर खबरों के अलावा सबकुछ दिखा रहे हैं।

तो आखिर प्राइवेट सेक्टर के साथ दिक्कत क्या है? मेरे मुताबिक उनमें बाजार के ज्यादा से ज्यादा हिस्से पर कब्जा करने के साथ-साथ अपनी लागत को कम से कम रखने की भी होड़ चल रही है। नतीजा वही हो रहा है, जो पब्लिक सेक्टर के साथ हुआ था – घटिया सेवा। हालांकि, यहां एक छोटा सा अंतर काम करने के तरीके को लेकर है। पब्लिक सेक्टर की सेवा भ्रष्टाचार और धीमी कार्यप्रणाली की वजह से घटिया हुई थी। वहां लागत को कम रखने का कोई दबाव नहीं था।

प्राइवेट सेक्टर के साथ दिक्कत यह है कि जब तक उनके ग्राहकों की तादाद कम होती है, तब तो उनकी लागत कम रखते हुए बाजार को फैलाने की कोशिश के परिणाम काफी अच्छे होते हैं। लेकिन जिस पल आपके ग्राहकों की तादाद काफी ज्यादा होती जाती है, तो आपके लिए मुसीबतें सिर उठाना शुरू कर देती हैं। वजह बहुत आसानी से समझ में आने वाली है, अब आपको मोटा निवेश करना पड़ता है। अपनी सेवाओं की गुणवत्ता को बरकरार रखने के लिए आपको मोटा निवेश करना पड़ता है, जो आपको जायज भी नहीं लगेगा।

ऐसा इसलिए क्योंकि अब आप बाजार के बड़े हिस्से पर काबिज हो चुके होंगे और आपको इतना मोटा निवेश ठीक नहीं लग रहा होगा। ऐसी हालत में तो बिल्कुल भी नहीं, जब आपका बाजार में हिस्सा बहुत धीरे-धीरे बढ़ रहा होगा। इसलिए आप निवेश में कमी करने की कोशिश करेंगे, जिससे आपकी सेवा की गुणवत्ता पर असर पड़ेगा। मैं जो कहना चाहता हूं, वह कोई नई बात नहीं है, न ही वह इस आलेख का मुख्य बिंदु है। बड़ी बात यह है कि जब आप ग्राहकों की बड़ी तादाद के साथ जुड़ते हैं, तो उनके लिए यह अहमियत नहीं रखती कि कौन सी कंपनी सेवा दे रही है।

मैं भी इस बात को मानने लगा हूं। पब्लिक सेक्टर हो या प्राइवेट सेक्टर, लोगों को अच्छी सेवा से मतलब होता है। एक बार मैंने ऑक्सफोर्ड के एक गणितज्ञ का इंटरव्यू किया था। आम सवालों के बाद मैंने उनसे पूछा था कि, ‘क्या जूपिटर इफेक्ट (जब रोशनी बृहस्पति ग्रह के पास से गुजरती है, तो वह मुड़ जाती है) का इस्तेमाल बड़ी तादाद में लोगों को मैनेज करने किया जा सकता है? आखिर, जब आप ज्यादा लोगों के साथ जुड़े होते हैं, तो आपको बिल्कुल अलग नियमों की जरूरत होती है?’ इस पर उन्होंने कहा था कि उन्हें इस बारे में सोचना होगा।

मुझे आज भी उनके जवाब का इंतजार है। इसलिए तो मुझे लगता है कि हम हिंदुस्तानी घटिया सेवा पाने के लिए अभिशप्त हैं। यहां बाजार इतना बड़ा है कि कोई भी सेवा प्रदाता लोगों को अच्छी सेवा नहीं दे सकता है। इसके लिए हमें छोटी-छोटी कंपनियों की बड़ी तादाद की जरूरत होगी, न कि बड़ी-बड़ी कंपनियों की बड़ी तादाद की। लेकिन ऐसा होना इतना आसान नहीं है। इसलिए गीता के उपदेश, ‘कर्म कर, फल की इच्छा न कर’ को याद रखें और खुद को संतुष्ट रखें।

First Published - August 1, 2008 | 11:17 PM IST

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