ज्यादातर लोगों को अब शायद याद नहीं होगा कि आज से दशक भर पहले अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें इकाई में हुआ करती थीं।
यह अब सैकड़े के आंकड़े को भी पार कर चुकी है। यानी कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर जा चुकी हैं। स्टील, अनाज और कृषि से संबंधित दूसरी कमोडिटी के दाम भी कुलांचे भर रहे हैं।
इसका एक नतीजा यह है कि थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआई) पर आधारित मुद्रास्फीति की दर इतनी ज्यादा हो गई है कि इससे राजनीतिक हलका बेचैन हो चुका है। ऐसा तब है जब ग्लोबल लेवल पर कच्चे तेल की मौजूदा कीमतों का असर घरेलू स्तर पर 4 महत्वपूर्ण पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों पर पड़ना अभी बाकी है।
यह भी सच है कि डब्ल्यूपीआई ग्राहकों द्वारा महसूस की जाने वाली महंगाई को मापने का बहुत सही पैमाना नहीं है। पहली बात यह कि इसके तहत लिए जाने वाले अलग-अलग वस्तुओं के भारांक तात्कालिक होते हैं। दूसरी बात यह कि डब्ल्यूपीआई के निर्धारण में सेवा क्षेत्र को शामिल नहीं किया जाता है।
ऐसी खबरें हैं कि डब्ल्यूपीआई के निर्धारण के तौर-तरीकों में बदलाव किया जा रहा है और इसकी गुणवत्ता इस हिसाब से सुधारी जा रही है कि इसके आधार पर निकाले जाने वाले अनुमान सचाई के ज्यादा से ज्यादा करीब हों। पर जिस बात की सबसे ज्यादा जरूरत है वह यह है कि कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (सीपीआई) की गणना देशव्यापी आधार पर की जाए।
दरअसल, कीमतों का आकलन करने वाले अधिकारी और दुनिया के ज्यादातर केंद्रीय बैंक सीपीआई को कीमतों में बढ़ोतरी के आकलन का ज्यादा सटीक जरिया मानते हैं। कुछ केंद्रीय बैंक को ‘कोर मुद्रास्फीति’ की निगरानी करते हैं, जिनके निर्धारण में ऊर्जा और अनाज की कीमतों को शामिल नहीं किया जाता है। इसके पीछे धारणा यह है कि इस दोनों कैटिगरी के पदार्थ ऐसे हैं, जिनकी कीमतों में उठापटक होती रहती है। मौद्रिक नीति का इन पदार्थों की कीमतों पर कोई खास असर नहीं पड़ता।
भारत में तेजी से बढ़ रही महंगाई दर पर काबू पाने के लिए अब तक जो कदम उठाए गए हैं, वे ज्यादातर सरकारी दखल से संबंधित हैं। सरकार ने कुछ प्रॉडक्ट्स के आयात शुल्क में कटौती की है और कुछ के निर्यात पर पाबंदी लगाई है।
स्टील और सीमेंट के उत्पादकों को दिल्ली बुलाया गया और हिदायत दी गई कि वे कीमतों में कटौती करें। अनाज की जमाखोरी करने वालों के यहां छापेमारी की गई और आवश्यक कमोडिटी कानून की जद में ज्यादा से ज्यादा कमोडिटी को लाए जाने की भी बात हो रही है। वामपंथी पार्टियों की ओर से इस बात का दबाव है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) को दुरुस्त किया जाए।
लोक लेखा समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पीडीएस के तहत वितरण के लिए जारी किए जाने वाले अनाज का महज 50 फीसदी हिस्सा ही सही लोगों तक पहुंच पाता है। इन प्रशासनिक और वित्तीय कदमों के अलावा मौद्रिक नीति का इस्तेमाल भी महंगाई दर को नियंत्रित करने के लिए किया जाता है।
पर अब तक इस पूरे मामले को बहुत व्यापक संदर्भ में नहीं देखा जा रहा है और समस्या के दूरगामी पहलुओं पर किसी तरह की बहस नहीं हो रही है। मेरी राय में तेल और खाद्य पदार्थों की परवान चढ़ती कीमतों को समस्या के रूप में नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखे जाने की जरूरत है। इसकी बानगी देखिए।
(क) जहां तक खाद्य पदार्थों की बात है, हमारे देश की आबादी में सालाना करीब 2 करोड़ का इजाफा होता है। आबादी में जिस दर से बढ़ोतरी हो रही है, उस हिसाब से कृषि क्षेत्र का विकास नहीं हो रहा है। इस शताब्दी के मध्य तक दुनिया की आबादी भी 10 अरब हो जाने का अनुमान है और माना जा रहा है कि इसके बाद इसमें स्थिरता आएगी।
क्या इससे यह साबित नहीं होता कि ब्रिटिश अर्थशास्त्री थॉमस माल्थस द्वारा आज से 200 वर्ष पहले की गई भविष्यवाणी सही थी। जैसे-जैसे एशियाई देशों में समृध्दि आती जा रही है, खानपान के मामले में यहां के लोगों का जीवनस्तर बेहतर होता जा रहा है। (एक किलोग्राम मीट के लिए पशु को 9 से 10 किलो के बीच अनाज खिलाने की जरूरत पड़ती है।)। इन चीजों पर गौर फरमाने की जरूरत है।
(ख) तमाम नए स्रोतों की खोज के बावजूद तेल और गैस संसाधनों की किल्लत इस शताब्दी के अंत तक महसूस की जाने लगेगी। ऐसे में सही वक्त है जब इनके संरक्षण पर ध्यान दिया जाए, हाइड्रोकार्बन ऊर्जा स्रोतों पर निर्भरता कम की जाए और नवीकरणीय ऊर्जा की तकनीकें विकसित की जाएं।
(ग) गांवों में रहने वाली देश की कुल 60 फीसदी आबादी (जहां कृषि आजीविका का मुख्य साधन है) का जीडीपी में योगदान महज 20 फीसदी है जबकि शहरों में रहने वाली बाकी 40 फीसदी आबादी जीडीपी में अपना 80 फीसदी योगदान देती है।
इस लिहाज से गांवों और शहरों की प्रति व्यक्ति आय में 6 गुना का अंतर है। इससे आने वाले दशक में जबर्दस्त सामाजिक अस्थिरता आने का खतरा है और आवश्यकता इस बात की है कि शहरी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण इलाकों में स्थानांतरित किया जाए।
साथ ही खेतिहर मजदूरों का औद्योगिक मजदूरी के लिए पलायन होना भी उतना ही जरूरी है। ऐसे में कृषि पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी ग्रामीण आबादी के हित में है, बशर्ते सारी चीजें एक व्यवस्था के तहत हों। किसानों को दी गई कर्जमाफी के मुकाबले यह काफी बेहतर है। कर्जमाफी से तो कम से कम कृषि अर्थव्यवस्था का भला नहीं होने वाला।कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि कीमतों को लेकर मौजूदा माहौल को एक संभावना के तौर पर भी देखा जा सकता है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की तेजी से बढ़ रही कीमतों से कम से कम पेट्रो पदार्थों के संरक्षण और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश संबंधी कार्यों को शिद्दत से अमल में लाया जाएगा। इसी तरह संगठित रिटेल के तेज विकास को भी एक संभावना के रूप में देखे जाने की जरूरत है। इससे कम से कम प्राइवेट सेक्टर द्वारा ग्रामीण इन्फ्रास्ट्रक्चर मसलन सड़क, स्टोरेज सुविधाओं आदि का विकास किया जाएगा और खाद्य पदार्थों की बर्बादी रोकी जा सकेगी।
नैनो कार का कामयाब उत्पादन हमारी नई पहलें करने की क्षमताओं का गवाह है। अब वक्त का तकाजा यह है कि हम ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश पर जोर दें। साथ ही पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के जरिये ग्रामीण आमदनी बढ़ाए जाने की भी घोर जरूरत है।