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उत्पादन संबंधी चिंता

Last Updated- December 11, 2022 | 4:32 PM IST

मुख्य खरीफ सत्र  की बोआई का मौसम अपने अंतिम दौर में है। अब यह लगभग तय लग रहा है कि मध्य अगस्त तक हुई 10 प्रतिशत अतिरिक्त बारिश फसल उत्पादन में बढ़ोतरी के रूप में सामने नहीं आएगी। ब​ल्कि बारिश का असमान प्रसार न केवल कुछ प्रमुख फसलों की बोआई बल्कि उनके उत्पादन पर भी नकारात्मक असर डाल सकता है। इसमें खरीफ सत्र की प्रमुख फसल चावल शामिल है।
हालांकि कपास, गन्ना और सोयाबीन जैसी वा​णि​ज्यिक फसल का रकबा बढ़ा है लेकिन बारिश के कारण उत्पादन में कमी का अनुमान जताया जा रहा है। हालांकि अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करेगा कि बाकी बचे दिनों में मॉनसून का प्रदर्शन कैसा रहता है और अक्टूबर में मॉनसून के बाद किस तरह की बारिश होती है। परंतु कुछ अहम फसलों के उत्पादन में कमी की चिंता और मुद्रास्फीति के ऊंचे स्तर पर बने रहने की आशंकाओं को नकारा नहीं जा सकता।
सबसे बड़ी चिंता गंगा के मैदानी इलाके वाले प​श्चिम बंगाल और झारखंड तथा धान की खेती वाले आसपास के राज्यों में इसकी बोआई में होने वाली देरी है। इस क्षेत्र में मॉनसूनी बारिश की कमी की बात करें तो प​श्चिम बंगाल में बारिश सामान्य से 35 फीसदी कम है जबकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में यह 47 फीसदी कम है। इसकी वजह से सूखे जैसे हालात बन गए हैं। इस बात ने पूरी दुनिया को चिंतित किया है क्योंकि भारत न केवल चावल का सबसे बड़ा निर्यातक है ब​ल्कि यूक्रेन-रूस युद्ध के बाद से वह वै​श्विक खाद्य सुरक्षा में भी बड़ा योगदान कर रहा है। गत वर्ष भारत ने रिकॉर्ड 2.1 करोड़ टन चावल का निर्यात किया जो वै​श्विक कारोबार के 40 फीसदी के बराबर था। अगर भारत गेहूं और चीनी की तरह चावल के निर्यात पर भी रोक लगाता है तो यह वै​श्विक खाद्यान्न उपलब्धता और कीमतों को बुरी तरह प्रभावित करेगा।

देश के उत्तरी भाग में हालात कुछ ऐसे हैं जबकि मध्य और प्रायद्वीपीय इलाके को अत्य​धिक बारिश झेलनी पड़ रही है।मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ इलाकों में अत्य​धिक बारिश ने फसलों को नुकसान पहुंचाया है और कई जगह तो दोबारा फसल लगानी पड़ी है। वा​णि​ज्यिक फसलों की बात करें तो देश भर में कपास के रकबे में काफी इजाफा हुआ है। ऐसा मोटेतौर पर इसलिए हुआ है कि घरेलू और निर्यात बाजार में इसकी अच्छी कीमत मिलती है। परंतु खबर यह भी है कि देश के कई हिस्सों में कीट-पतंगों के कारण कपास की खड़ी फसल पर बहुत बुरा असर हुआ है। उत्तर भारत में कपास की खेती वाले राज्यों पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में फसल सबसे अ​धिक प्रभावित हुई है।

पिंक बॉलवर्म जैसे कीट के ​खिलाफ जीन संवर्द्धित बीटी-कॉटन की कमजोर पड़ती प्रतिरोधक क्षमता के कारण ही यह हानिकारक कीट फसल को नये सिरे से नुकसान पहुंचा रहा है। ऐसे में बीटी-हाइब्रिड किस्म भी इसे लेकर खतरे में आ गई है जो कपास के मौजूदा रकबे में 95 फीसदी की हिस्सेदार है। इस किस्म की जगह नयी किस्म इसलिए नहीं आ पा रही है कि सरकार नयी जीएम फसलों के विकास की इजाजत नहीं दे रही है। 
 बहरहाल, कीटनाशकों का छिड़काव करके कपास की फसल को तो आं​शिक रूप से बचाया जा सकता है लेकिन चावल के मामले में सरकार को अपनी अनाज प्रबंधन योजना में बदलाव लाना होगा। चावल निर्यात किसी भी तरह की रोक लगाना सही नहीं होगा क्योंकि सरकार के पास पर्याप्त चावल मौजूद है। फिलहाल जितना चावल भंडारित करके रखने की आवश्यकता है उससे ढाई गुना अनाज भंडार में है। ऐसे में एथनॉल उत्पादन के लिए चावल के इस्तेमाल पर भी विचार किया जाना चाहिए। 

First Published - August 18, 2022 | 10:59 AM IST

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