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ईशनिंदा का प्रश्न और मान-अपमान पर दृष्टि

Last Updated- December 11, 2022 | 5:41 PM IST

अगर आप मुझसे पूछें कि क्या मुझे ऑल्ट न्यूज के मोहम्मद जुबैर से कोई शिकायत है तो मैं इसके तीन जवाब दूंगा जिसमें दो ना और एक हां होगा। मैं पहले दो ‘ना’ को स्पष्ट करूंगा।
पहली बात तो यह कि किसी को भी उसके विचारों के लिए जेल में नहीं डाला जाना चाहिए या उस पर मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिए। खासतौर पर तब जबकि यह विचार सोशल मीडिया तक सीमित हो। एक लोकतांत्रिक देश में रहने वाले लोग चाहे उदार हों या नहीं लेकिन उन्हें अतिसंवेदनशील नहीं होना चाहिए। चाहे जो भी हो अगर वे किसी व्यक्ति को ‘दुख पहुंचाने वाला’ भी मानते हों तो भी उसकी आजादी छीनने का विकल्प नहीं होना चाहिए।
मेरी पहली ‘ना’ को इसी बात से समझा जा सकता है। मैं पूरी तरह उनकी आजादी के पक्ष में हूं।
इतना ही नहीं कथित रूप से अपमानित लोग भारतीय दंड संहिता की जिन धाराओं 153 और 295ए के तहत मुकदमे दर्ज करा रहे हैं वे अपने आप में बेहूदा हैं। धारा 296 को 1860 में आईपीसी में शामिल किया गया था जबकि धारा 295ए को 1927 में एक खास संकट के समय इसमें शामिल किया गया। संकट काल में बने सभी कानून खतरनाक होते हैं।
वह उथलपुथल से भरा दशक था जब सन 1929 में एक हिंदू महाशय राजपाल की हत्या की गई थी। उन्होंने 1924 में एक छद्म लेखक की पुस्तक प्रकाशित की थी जिसके बारे में मुस्लिमों का मानना था कि उसमें हजरत पैगंबर मुहम्मद के बारे में ऐसी बातें लिखी थीं जो ईशनिंदा के दायरे में आती थीं। हत्यारे के बचाव में मोहम्मद अली जिन्ना समेत प्रमुख मुस्लिम अधिवक्ताओं ने पैरवी की। सारे जहां से अच्छा लिखने वाले मशहूर शायर इकबाल उसके जनाजे में शामिल हुए और उसे ‘गाजी’ कहा गया। पाकिस्तान में आज भी उसे राष्ट्रीय नायक जैसा माना जाता है।
इसके पिछले दशक में अंग्रेजों को हिंदू-मुसलमानों की बढ़ती समस्याओं से जूझना पड़ा था। केरल के मलाबार में मोपला विद्रोह हुआ। पंजाब में मुस्लिमों और आर्य समाजी हिंदुओं के बीच तीखे वाद-विवाद हुए।
मुस्लिम पक्ष की ओर से भी एक किताब प्रकाशित की गई जिसे हिंदुओं ने रामायण की सीता के लिए अपमानजनक माना और जल्दी ही उन्होंने पैगंबर पर एक किताब छाप दी। किताब के संदिग्ध लेखक और प्रकाशक की हत्या की कई नाकाम कोशिशों के बाद आखिरकार अप्रैल 1929 में इल्मुद्दीन नामक 20 वर्षीय युवक हत्या करने में कामयाब रहा।
इसी संकटपूर्ण दशक के दौरान ब्रिटिश शासन ने एक विधिक और नौकरशाही आधारित हल तलाश करने का प्रयास किया और भारत के लिए ईशनिंदा जैसा कानून बनाया। इस प्रकार सन 1927 में उप धारा 295ए जोड़ी गयी। आशा की जा रही थी कि एक बार जब लोगों के पास ईशनिंदा को लेकर कानूनी रास्ता उपलब्ध होगा तो हिंसा रोकी जा सकेगी। लेकिन इससे राजपाल की जान नहीं बची। लगभग 100 साल बाद कन्हैया लाल या उमेश कोल्हे की जानें भी नहीं बच सकीं।
यह एक खराब कानून था जिसे ऐसी औपनिवेशिक सत्ता ने बनाया था जिसके भारत में स्थायी हित नहीं थे। लेकिन यह कानून न केवल बना रहा बल्कि सन 1957 में सर्वोच्च न्यायालय के एक बड़े पीठ ने भी इसे स्वीकृत कर दिया। पाकिस्तान में जिया उल हक ने इसमें और उपधाराएं जोड़कर कुरान के अपमान के लिए आजीवन कारावास और मौत तथा कुरान के अपमान के लिए मृत्युदंड का प्रावधान कर दिया। अगर भारत में किसी ने 75 वर्ष तक इस कानून को हाथ नहीं लगाया तो भला पाकिस्तान में ऐसा करने की किसकी हिम्मत होगी? अब भारत में प्रतिपक्षों द्वारा एक दूसरे के खिलाफ जवाबी प्राथमिकी दर्ज कराने का  चलन अवश्य चला है।
अगर यह कानून बेहूदा है तो इस कानून के तहत जुबैर या किसी अन्य व्यक्ति की गिरफ्तारी भी बेहूदा ही है। नूपुर शर्मा की गिरफ्तारी की मांग के बारे में भी यही सच है।
जुबैर से मुझे कोई  शिकायत है या नहीं इस सवाल के जवाब में पहली ‘ना’ जहां सैद्धांतिक थी वहीं दूसरी एक आस्थावान हिंदू के रूप में मेरे दिल से आती है। मैं समझता हूं कि जुबैर की एक पुरानी सोशल मीडिया पोस्ट अचानक सामने आ गई और उसने बड़ी तादाद में हिंदुओं को भड़का दिया। अब वह नयी है।
पीढि़यों से हम हिंदू अपने देवताओं को लेकर आलोचनात्मक रहे हैं और सवाल भी करते रहे हैं। शायद यही वजह है कि हमारे यहां इतने देवता हैं। एक देवता की कमी पूरी करने के लिए दूसरे की जरूरत होती है। हमारे देवी-देवताओं में कमजोरियां हैं। ऐतिहासिक रूप से हिंदू धार्मिकता में थोड़ा हास्यबोध शामिल रहा है। हमारे देवताओं में भी वह मौजूद रहा है।
इंडियन एक्सप्रेस से जुड़ा एक किस्सा मशहूर है जिसे अरुण शौरी ने अपने संस्मरणों में जगह दी है। यह वाकया जनसत्ता के संपादक स्वर्गीय प्रभाष जोशी और रामनाथ गोयनका से जुड़ा है। जोशी ने गोयनका से पूछा वह इंडियन एक्सप्रेस के तत्कालीन संपादक बी जी वर्गीज का अनुबंध आगे क्यों नहीं बढ़ा रहे जबकि वह तो ‘संत आदमी’ हैं। गोयनका ने कहा, ‘यही तो दिक्कत है। वह संत जॉर्ज वर्गीज हैं और मेरा एक्सप्रेस शिव जी की बारात है।’ अगर आप जानना चाहते हैं कि शिव की बारात कैसी थी तो सन 1955 में आई देवानंद की फिल्म मुनीमजी का एक गाना देख ले। सात दशकों तक किसी ने इसे अपमान नहीं माना न ही कोई मामला दर्ज किया गया।
हमें यह भी याद होगा कि कैसे स्वर्गीय सुषमा स्वराज स्टूडेंट ऑफ द इयर फिल्म के गाने ‘राधा ऑन द डांस फ्लोर’ से बेहद नाराज हुई थीं और उन्होंने सवाल उठाया था कि हर बार ऐसे गानों में हिंदी देवी-देवताओं का ही नाम क्यों आता है। लेकिन तब भी कोई हो-हल्ला नहीं हुआ। शादी-समारोहों में लाखों हिंदू इस गाने पर नाचे होंगे। अपनी फिल्म फायर में दीपा मेहता ने दो मध्यवर्गीय हिंदू महिला रिश्तेदारों के बीच समलैंगिक संबंध दिखाये थे। उन्होंने उनको राधा और सीता नाम दिया था। थोड़ी बहुत चर्चा हुई बस।
हमारे देश में व्यापक हिंदू समुदाय के लिए ईशनिंदा जैसी कोई चीज नहीं रही। अब अगर वही हिंदू ऐसा महसूस कर रहे हैं और जुबैर की गिरफ्तारी पर खुशी मना रहे हैं तो इससे पता चलता है कि हिंदुओं का ‘अब्राह्मीकरण’ हो रहा है। यह अच्छी बात नहीं है। यह दूसरी वजह है जिसके चलते मैं अपना दूसरा जवाब ‘ना’ में दिया। मैं जुबैर को पीड़ित मानता हूं वह समझ नहीं पाए कि लोगों का मिजाज बदल गया है। यह बात मुझे तीसरे जवाब तक लाती है जो हां है। मोहम्मद जुबैर से मेरी शिकायत यह है कि भले ही उन्होंने और ऑल्ट न्यूज ने अपनी तथ्यात्मक पड़ताल वाली पत्रकारिता से मोदी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी की हों लेकिन उनकी ताजा दिक्कतों के पीछे असली वजह है नूपुर शर्मा प्रकरण।
टाइम्स नाऊ चैनल पर एक बहस में नूपुर शर्मा ने पैगंबर के निजी जीवन के बारे में कुछ बातें कहकर मुस्लिमों को नाराज कर दिया। यह बात उनकी माफी से खत्म हो जाती या केवल भारत में सीमित रहती लेकिन जुबैर ने उस छोटी सी क्लिप का प्रसार किया और इस्लामिक दुनिया में शोर मचते ही मोदी सरकार को शर्मिंदा होना पड़ा। उनकी गिरफ्तारी दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन यह उसी घटना का दुखद नतीजा है।
नूपुर शर्मा के हिंदू समर्थकों का कहना है कि वह केवल वही दोहरा रही थीं जो इस्लामिक रिकॉर्ड में पहले से दर्ज है। यह बात उतनी ही कमजोर है जितना कि लीना मणिमेकलाई का यह कहना कि काली को सिगरेट पीना यह दिखाता है कि देवी रूढि़यों को नहीं मानतीं। दोनों मामलों में संदर्भ मायने रखता है।
दूसरी ओर जुबैर और उनकी संस्था को देखिए। वे वामपंथी हों या नहीं लेकिन वे उदार और धर्मनिरपेक्ष तो हैं ही। क्या फिर भी उन्हें ईशनिंदा पर यकीन करना चाहिए? आखिर वह कैसा उदारवाद है जो ईशनिंदा के खिलाफ गुस्सा भड़काता हो।
अगर आप किसी श्रद्धालु मुस्लिम की तरह बोलें तब तो ठीक है। मेरी शिकायत यह है कि आपको शोहरत और इज्जत तो धर्मनिरपेक्ष उदारवादी होने की वजह से मिली है। यदि मुस्लिम समाज के अन्य लोगों की तरह आपको अब भी इस बात से परेशानी होती है कि किसी ने आपके धर्म की महान शख्सियत के बारे में कुछ गलत कह दिया है तो वह भी स्वीकार्य है। लेकिन इसी सिद्धांत को मानते हुए अन्य लोगों के देवताओं पर टिप्पणी करने से भी बचना चाहिए। मुझे वाम से कोई दिक्कत नहीं, बशर्ते कि वे अपनी विचारधारा को लेकर सच्चे हों और किसी देवता या धर्म में विश्वास न करते हों।
मुझे उन तथाकथित वाम उदारवादियों से एक दिक्कत है कि अपमानित करने या होने को लेकर चयनित नजरिया रखते हैं। मैं हिंदू या मुस्लिम के रूप में नहीं एक भारतीय के रूप में अपनी शिकायत दर्ज करा रहा हूं।

First Published - July 10, 2022 | 11:44 PM IST

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