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गजराज का राज

Last Updated- December 07, 2022 | 1:41 PM IST

भोला, गंगाराम, गुलाबु जैसे दिल्ली के पालतू हाथी जब रोजाना आईटीओ वाले पुल के पास से गुजरते हैं तो यह उनके और महावतों के लिए अकेलेपन में असहाय रूप से पैर घसीट कर चलने जैसा है।


एक ऐसे शहर में वे बेमन से पैर घसीटते जाते हैं, जो उनको तवाो नहीं देता। लेकिन ये ही हाथी उनके घरों में होने वाली शादियों में दूल्हे को अपनी पीठ पर बैठा कर उनकी शान में चार चांद ही लगा देते हैं। शानदार होटलों में पर्यटकों को सवारी भी कराते हैं ये हाथी और इसके लिए तकरीबन 2,000 रुपये खर्च करने पड़ते हैं।

उनकी सुबह इस शहर की सड़कों पर चहलकदमी से शुरू होती है तो दिन भी इन्हीं कंक्रीट की पगडंडियों पर धींगामुश्ती करते हुए बीतता है। इसके लिए उन्हें ट्रैफिक पुलिस का शुक्रगुजार होना चाहिए। तकरीबन 200 किलोमीटर दूर उत्तराखंड के घने जंगलों में राजाजी पार्क है। यह एशिया में हाथियों का शरणगाह माना जाता है। जल्द ही यहां से 6 लेन वाला राजमार्ग गुजरने वाला है। लेकिन हाथियों की चहलकदमी से यह योजना प्रभावित हो रही है और इससे निपटने के लिए रास्ते की तलाश की जा रही है।

इस प्रस्ताव पर भी विचार चल रहा है कि हाईवे के ऊपर एक ओवरपास बनाया जाए और उसके नीचे एक अंडरपास बनाया जाए। इन दो कहानियों का सार मौजूदा भारत में एशियाई हाथियों की कहानी  बयां करने के लिए काफी है। जहां तक संख्या की बात है तो जंगली और पालतू हाथियों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ ही रही है। आने वाले समय में हमें इस बारे में और भी बढ़िया खबरें सुनने को मिलेंगी। इस कहानी का एक डरावना पहलू भी आपको पश्चिम बंगाल के उत्तरी क्षेत्र के गांवों और जंगलों में देखने को भी मिल जाएगा।

जहां हाथी की एक झलक लोगों में दहशत पैदा कर देती है। यहां जब हाथी आता है तो लगता है कि तूफान आ गया है। भारतीय उपमहाद्वीप में हाथी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। एक बड़ा तबका हाथी को बहुत पवित्र मानता है और इस बात की भी प्रबल संभावना जताई जा रही है कि देश में होने वाले अगले आम चुनाव में हाथी अपने आकार के अनुरूप असर भी डाल सकता है। लेकिन इस कहानी में हकीकत और भावनाओं की लड़ाई भी है। वर्ष 1985 में इनकी संख्या घटकर 15,627 रह गई थी जो 2002 में बढ़कर 26,413 हो गई है। इसके लिए हाथी संरक्षण योजना को धन्यवाद देना चाहिए।

वर्ष 2000 में पालतू हाथियों की संख्या जहां 3,700 थी, अनुमान लगाया जा रहा है कि जब भी हाथियों की गिनती होगी तब पालतू और जंगली हाथियों की संख्या में अच्छा खासा इजाफा नजर आएगा। हाथियों के संरक्षण लिए केंद्र सरकार हर साल 20 करोड़ रुपये खर्च कर रही है। लेकिन संरक्षण की इस कवायद में आदमी और जानवर के बीच कुछ निर्मम झड़पें भी सामने आई हैं। हाल ही में उड़ीसा में एक जंगली हाथी को जिंदा जला देने का प्रयास और केरल में एक हाथी का महावत को पटक-पटक कर मार देना इस बात का पुख्ता उदाहरण हैं। इसमें से केरल वाली घटना का तो टीवी पर सीधा प्रसारण तक हुआ है।

जानवरों की प्रजातियों पर लिखने वाले वैज्ञानिक अजय देसाई इस बाबत कहते हैं कि मानव-हाथी संघर्ष बहुत उलझा हुआ विषय है। केवल हाथी ही ऐसा जानवर है जो इंसान से पार पाकर लंबे समय तक जिंदा रह सकता है। उनके मुताबिक अभी तक तात्कालिक राहत का ही मॉडल तैयार हो पाया है। हाथियों के साथ संघर्ष 2003-04 में अपने चरम पर था और  इसी साल यह मॉडल सामने उभर कर आया। इसी तरह की योजना पश्चिम बंगाल के उत्तरी इलाके में अमल में लाई जाएगी। राजाजी नैशनल पार्क से रेलवे लाइन भी लगी हुई है और जिसकी वजह से कई हाथी कट कर मर चुके हैं।

वर्ष 2003 में जब वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) बना और पशु कल्याण के लिए अंतरराष्ट्रीय कोष बनाया गया तब से इस तरह का कोई समाचार नहीं मिला है। हाथी परियोजना के निदेशक ए एन प्रसाद कहते हैं, ‘रेलों की आवाजाही के बीच हाथियों के घूमने का अध्ययन करते हुए हमने रेल की गति सीमा 25 किलोमीटर प्रति घंटा तय कर दी। इसके अलावा गश्त भी होती है जिसके  जरिये रेल चालकों को चेतावनी भी दी जाती है।’ प्रसाद जानकारी देते हैं कि इस तरह की योजना को जल्द ही बक्सा टाइगर रिजर्व में भी बड़े पैमाने पर लागू किया जाएगा।

इसके अलावा हाथियों पर ग्लोबल पोजिशनिंग सर्विस (जीपीएस) के जरिये भी 1,000 किलोमीटर के दायरे में नजर रखी जा सकती है। नजर रखने का यह काम उत्तरी-पश्चिम बंगाल के जलपाड़ा रिजर्व में किया जा रहा है। भारतीय विज्ञान संस्थान, बेंगलुरु के पारिस्थितिकी विज्ञान केंद्र के डा. रामन सुकुमार ने एक अध्ययन किया है। इस अध्ययन के अनुसार हाथी कुछ मौसमी फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। सुकुमार बताते हैं कि हम सही समय में उचित विभाग को जानकारी दे सकते हें और जानकारी के अनुसार गांवों को भी समय रहते चेतावनी दे सकते हैं।

जीपीएस तकनीक की सहायता से एसएमएस अलर्ट तो आसानी से भेजा जा सकता है। सुकुमार को एशियाई हाथियों पर दुनिया के सबसे प्रमुख विशेषज्ञों में से एक माना जाता है, उनका कहना है कि यह सिस्टम तभी तक कारगर रह सकता है जब तक कि हाथी से जुड़ी बैटरी साथ निभा पाए। वहीं दूसरी ओर दिल्ली में वाइल्डलाइफ एसओएस नाम की संस्था 2004 से दिल्ली के पालतू हाथियों को वेटरनिटी ट्रीटमेंट मुहैया करा रही है। यह संस्था हरियाणा के यमुनानगर जिले में देश का हाथियों का पहला अस्पताल खोलने जा रही है।

थाइलैंड में चल रही योजना में भी इसी तरह की बढ़िया सुविधाएं दी जा रही हैं। वाइल्डलाइफ एसओएस के कार्तिक सत्यनारायण बताते हैं कि इस अस्पताल में दिल्ली और आगरा क्षेत्र के हाथियों का इलाज किया जाएगा। इसे जंगलात की 400 एकड़ जमीन में बनाया जाएगा जिससे कि हाथियों के लिए पर्याप्त जगह का इंतजाम हो पाए। इसमें हाथियों से जुड़ी खास बीमारियों का विशेष तौर पर इलाज किया जाएगा। गौरतलब है कि पैरों में कुछ चीजें धंस जाने से हाथियों को बहुत तेज दर्द होता है और इस अस्पताल में उनका उचित इलाज किया जाएगा।

निभा नंबूदरी एक जैव वैज्ञानिक है और केरल में महावत भी हैं। उन्होंने इसी तरह की एक कोशिश को अंजाम दिया। केरल ही देश का ऐसा राज्य है जहां सबसे ज्यादा पालतू हाथी हैं। उनकी संख्या लगभग 1000 होगी। इस राज्य में कई ऐसी भयानक घटनाएं हुई हैं जब पालतू हाथी आवेश में आकर भाग गए और जिसके कारण कई हादसे हुए, कई लोग इससे हताहत भी हुए। कुछ साल पहले हाथियों की देख-रेख के लिए एक केंद्र बनाया गया। नंबूदरी की कोशिश यह थी हाथियों को लेकर अगर किसी के मन में कुछ संदेह होता है तो वह उसे दूर करें।

उनका कहना है, ‘शुरुआत में इसे लेकर लोगों की प्रतिक्रियाएं उतनी उत्साहजनक नहीं कहीं जा सकतीं। इसकी वजह कुछ लैंगिक भेदभाव की बात भी थी। बाद में इस तरह की चर्चा फैल गई थी कि इस तरह के हाथी अपने मालिकों के लिए कष्ट का कारण बन जाते हैं। हालांकि उनकी कोशिश यही थी कि इस बात को दबाए रखा जाए। अब मुझे और भी फंड की जरूरत है। सरकार ने केरल के हाथियों के पालने को लेकर कुछ कायदे-कानून बना रखे हैं। लेकिन इसमें भी समस्या इनको लागू करने और इनका निरीक्षण करते रहने की है।

कई मालिकों के साथ काम करना बेहद मुश्किल हो जाता है क्योंकि वे लोग दया और सहानुभूति जैसी चीजों को समझते ही नहीं हैं।’ प्रोजेक्ट एलीफेंट के तहत पालतू हाथियों के बेहतर रहन-सहन की व्यवस्था के लिए कानूनों को लागू किया जाता है जो राज्य का विषय है। इसी वजह से हाथियों के लिए हरियाणा, केरल, उड़ीसा, कर्नाटक, असम और त्रिपुरा में पुनर्वास कैंप बनाए जा रहे हैं। इत्तेफाक से तमिलनाडु ने नीलगिरि के मुदुमलाई नेशनल पार्क के टेप्पाकड में एक वार्षिक कैंप का आयोजन कर पुर्नवास कैंप के लिए एक मॉडल स्थापित कर दिया।

भारत के शहरी क्षेत्र भी जंगली जानवरों के कहर से अछूते नहीं रहे हैं। कुछ मिसाल तो बेहद भयानक भी है। मसलन, बेंगलुरु के आस पास के शहरों में सलाना औसतन 8 लोग मारे जाते हैं। कोयंबटूर, तमिलनाडु में कुछ आश्रम बने हुए हैं जहां लोग आध्यात्मिक शांति के लिए जाते हैं पर वहां भी हाथियों के द्वारा ऐसे उत्पात मचाए जाते हैं। वर्ष 1994 से लेकर 2004 तक यहां आस-पास के शहरों में हाथियों ने 23 लोगों को मार डाला। कोयंबटूर के  एक गैरसरकारी संगठन ओसाई के साथ कालीदासन काम करते हैं। उनका कहना है, ‘हम लोग सौर ऊर्जा से चलने वाले बाड़ा या घेरा बनाने की कोशिश में हैं।

हमारी कोशिश कुछ ऐसा नियंत्रण तंत्र बनाने की है कि जंगल विभाग की अनुमति से जो भी कंपनी जंगल में घेरा या बाड़ा बनाए, वह 5 साल तक इसकी देखरेख भी करे। हम यह भी चाहते हैं कि जंगल में आश्रम बनाने का सिलसिला खत्म हो क्योंकि इससे लोगों की जिंदगी में भले ही आध्यात्मिक शांति आती है लेकिन हाथियों या दूसरे जानवरों के लिए तो उनकी तबाही का सिलसिला शुरू होने जैसा है।’ यहां पर चिंताजनक बात यह भी है कि कंवेंशन ऑन इंटरनेशनल ट्रेड इन इंडेंजर्ड स्पेसीज (सीआईटीईएस) ने हाल में चीन को हाथी के दांत के आयात करने की अनुमति दे दी है।

इसकी वजह से अवैध शिकार का सिलसिला अब फिर से शुरू होने की आशंका है। प्रोजेक्ट एलीफेंट का कहना है कि इसने सभी हाथियों के लिए बनाए गए अभयारण्यों को चेतावनी भी दे दी है और वे अपनी निगरानी का काम अब बढ़ा रहे हैं। प्रसाद का कहना है, ‘चीन हमारा पड़ोसी देश है और वह यहां से ज्यादातर अवैध हाथी दांत ले लेता है। इसके अलावा भारत में अवैध शिकार के लिए लोगों को  प्रलोभन भी दिया जाता है।’ एशिया में पाए जाने वाले हाथी दांत अपने गुणवत्ता के लिए जाने जाते हैं। जापानी लोग इसे टोगावा कहते हैं।

अफ्रीका और एशिया के हाथी दांत में फर्क पहचानने की कोशिशें जारी हैं हालांकि इसे समझना उतना मुश्किल भी नहीं है। देसाई और डॉ. सुकुमार दोनों वैज्ञानिक हैं। उनका कहना है कि हाथी किसी खास मौसम में जंगल के एक से दूसरे हिस्से में चले जाते हैं तो वैसे हिस्से जहां ये हाथी रहते हैं, उन्हें बचाने की कोशिशें बढ़नी चाहिए। हाथियों की आबादी बढ़ती जा रही है जिससे उनके रहने की समस्या खड़ी हो सकती है। इसी वजह से उन्हें बचाए जाने की जरूरत है।

देसाई कहते हैं कि हाथियों को जंगल में रहने के लिए जगह नहीं मिलेगी तो वे शहरी इलाके में ही आएंगे ही। ऐसी समस्याओं से बचने का तरीका यह नहीं है कि बड़ी-बड़ी दीवार बना दी जाएं। वह विशेषकर इको-टूरिज्म प्रोजेक्ट के आलोचक हैं क्योंकि इससे जंगली जानवरों के रहने की जगह को बहुत नुकसान पहुंचता है और वे एक तरह से खत्म ही हो जाती हैं। हालांकि डॉ. सुकुमार एक नए तरह का हल बताते हैं। उनका कहना है, ‘वातावरण में परिवर्तन के मद्देनजर कंपनियों को अपना कार्बन उत्सर्जन कम करना चाहिए और पर्यावरण को बेहतर बनाने के लिए वृक्षारोपण पर भी ध्यान देना चाहिए।

जलवायु परिवर्तन की वजह से ही जानवर दूसरी जगह प्रवास करने की कोशिश करते हैं।’ डब्ल्यूटीआई के उपाध्यक्ष अशोक कुमार का कहना है, ‘हम लोगों ने हाथियों की जगह सुरक्षित रखने की पहल की है। हम जमीन खरीद कर भी सरकार को सौंपना चाहते हैं इस आश्वासन के साथ कि इसे सुरक्षित जगह की मान्यता मिले।’ अगली बार आप जयपुर से गुजरें तो आप आमेर जरूर जाएं। अगले महीने वहां आप रूबरू हो सकते हैं भारत के पहले हाथियों के गांव से जिसे राजस्थान पर्यटन विभाग ने बनवाया है। यहां 100 हाथियों के रहने की जगह बनाई जाएगी और महावत के परिवार वालों के लिए भी रहने का यहां ठिकाना होगा।

दिलचस्प पहलू

जंगल में हाथी  वर्ष 1985 में 15,627, वर्ष 2002 में 26,413 और 2008 में आंकड़ा 28,000 पार कर लेगा। उत्तर पूर्वी अभयारण्यों में कम हुए हैं।

पालतू हाथी साल 2000 में 3,667 हाथी। केरल में पालतू हाथियों की संख्या सबसे ज्यादा 1,000 है। यहां हाथियों के लिए 5 पुनर्वास केंद्र बनेंगे।

इस वित्तीय वर्ष में प्रोजेक्ट एलीफेंट के लिए आवंटित राशि 20 करोड़ रुपये। यह राशि 0.5 करोड़ रुपये से लेकर 2 करोड़ रुपये तक सभी राज्य अभयारण्यों को दी गई है।

हाथियों द्वारा विस्थापित जमीनों की कुल संख्या 17, लगभग 1,600 से 2,000 वर्ग किलोमीटर जमीन में यह हिस्सा मौजूद है।

देश में हाथियों का प्राकृतिक आवास 119,550 वर्ग किमी जिसमें से 24,580 वर्ग किमी सुरक्षित क्षेत्र है।

कुछ खास अभयारण्यों के हाथी और हथिनी का लिंग अनुपात :  अवैध शिकार का निशाना अक्सर हाथी ही बनते हैं। पेरियार में 1 हाथी पर 60 से 70 हथिनियां, नागहोल में 1:6, बांदीपुर और नीलगिरी में 1 हाथी पर 25 से 30 हथिनियां, कार्बोट में 1 हाथी पर 3 से 4 हथिनियां हैं और उत्तरी बंगाल में 1:3 का अनुपात (15 साल में हाथी: हथिनी का अनुपात)(स्रोत : डॉ. रमन सुकुमार)

First Published - July 25, 2008 | 10:46 PM IST

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