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तेल के झटके से महफूज रख सकता है आरबीआई

Last Updated- December 11, 2022 | 6:17 PM IST

तेल की कीमतें अक्सर देश में सुर्खियां बनती हैं। देखा जाए तो 1980 के दशक के आरंभिक दौर के बाद से ही तेल की कीमतें काफी चक्रीय रुझान के वशीभूत हो गई हैं। जरा से उतार-चढ़ाव भरे दौर में कीमतें प्रभावित हो जाती हैं। ऐसे में यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें ऊपर जाएं तो आदर्श रूप में सरकार को तेल पर करों की दर घटानी चाहिए या फिर वह सब्सिडी दे ताकि घरेलू बाजार में तेल की कीमतें बहुत ज्यादा न बढ़ जाएं। वहीं जब तेल की वास्तविक अंतरराष्ट्रीय कीमतें कम हो जाएं तो सरकार कर की ऊंची दर आरोपित कर सकती है। इससे घरेलू स्तर पर तेल कीमतें कमोबेश स्थिर रहेंगी। हालांकि सरकार शायद यह सब नहीं करती।
तब यह सवाल उठता है कि ऐसी स्थिति में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) क्या कर सकता है? तमाम लोग यही कहेंगे कि उसके पास कुछ ज्यादा करने की गुंजाइश नहीं होगी। यह सच नहीं है। बहरहाल इससे पहले कि हम प्रस्तावित वैकल्पिक नीति की चर्चा करें, उससे पहले वर्तमान नीति की पड़ताल करना खासा उपयोगी होगा।
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में वृद्धि और लक्षित मुद्रास्फीति के अनुरूप आरबीआई रिजर्व मनी (आरक्षित मुद्रा) की मात्रा बढ़ाता है। स्वाभाविक है साल दर साल इस मामले में आरबीआई की प्रतिक्रिया भी अलग ही होती है। मगर जब भी हमें तेल कीमतों के मामले में झटका लगता है तो यह पहलू सामान्य कीमतों के स्तर को और बढ़ा देता है। नतीजतन यह मुद्रा की मांग को भी और उच्च स्तर पर ले जाता है। मौजूदा नीति के अंतर्गत मुद्रा की इस अतिरिक्त मांग की पूर्ति भी आरबीआई द्वारा की जाती है। इसी के चलते सामान्य मुद्रास्फीति में तेजी का दौर कायम रहता है। यहीं आरबीआई तेल की कीमतों से जुड़ी लागत-जनित मुद्रास्फीति के मोर्चे पर अपनी भूमिका निभाता है। फिर भी, कुछ समय के बाद एक नई लहर उठ सकती है और मुद्रास्फीति की दर भी और ऊपर जा सकती है।
10 जुलाई, 2010 से 20 मई, 2022 के बीच भारत में रिजर्व मनी (आरक्षित मुद्रा) 15.37 प्रतिशत की वार्षिक दर से बढ़ी है। वहीं साल-दर साल के हिसाब से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक भी बढ़कर अब 7.8 प्रतिशत हो गया है। इसलिए अर्थव्यवस्था में ऊंची मुद्रास्फीति के लिए पूरी तरह केवल तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के अलावा अन्य आपूर्तिगत पहलू ही जिम्मेदार नहीं हैं।
इस साल 4 मई से आरबीआई ने अपनी नरम मौद्रिक नीति को पलटना शुरू किया है। तब उसने रीपो दरों में 0.4 प्रतिशत का इजाफा किया। फिर 8 जून को उसने रीपो दरों में 0.5 प्रतिशत की और बढ़ोतरी की। आने वाले समय में दरों में बढ़ोतरी का यही रुझान देखने को मिल सकता है। इस कवायद में अर्थव्यवस्था की रफ्तार में खासी सुस्ती आने की आशंका है, भले ही इस मामले में आरबीआई अलग ही तस्वीर पेश कर रहा हो।
वास्तविक एवं सापेक्ष मूल्यों में अंतर से जुड़ा एक और स्वाभाविक, किंतु महत्त्वपूर्ण बिंदु भी है। तेल की वास्तविक कीमतें बेहद ऊंची दर से बढ़ रही हैं और अन्य वस्तुओं एवं सेवाओं की वास्तविक कीमतें अमूमन अपनी सामान्य दरों से ही बढ़ रही हैं। अन्य कीमतों एवं आय के सापेक्ष तेल की कीमतों में वृद्धि इसी प्रकार अपना असर दिखाती है।
चलिए, अब प्रस्तावित वैकल्पिक नीतिगत ढांचे की चर्चा कर लेते हैं। व्यापक रूप से कहें तो जैसे ही तेल की कीमतें बढ़ती हैं और यहां तक कि सामान्य रूप से कीमतों में तेजी का रुझान हो और मुद्रा की मांग में बढ़ोतरी दिख रही हो तो आरबीआई को रिजर्व मनी में अत्यधिक बढ़ोतरी नहीं करनी चाहिए। यह तेल कीमतों में तेजी से जुड़ी तथाकथित लागत-जनित मुद्रास्फीति की ऊंची दर अस्थिर एवं अव्यावहारिक बनाता है। तेल की ऊंची सापेक्षिक कीमतों की अपरिहार्यता से जुड़ी सच्चाई भी सामने है। हालांकि तेल की वास्तविक कीमतों में मामूली बढ़ोतरी और अन्य तमाम वस्तुओं की वास्तविक कीमतों में मामूली या नगण्य बढ़ोतरी के बावजूद ऐसी स्थिति बन सकती है। यानी तेल की सापेक्षिक कीमतों में बढ़ोतरी में भी वही नतीजा निकल सकता है।
यह सच है कि यदि लक्षित मुद्रास्फीति दर कम भी रखी जाए तो उपरोक्त समायोजन संभव नहीं हो सकता। मगर भारत के मामले में ऐसा नहीं है। आरबीआई के पास चार प्रतिशत तक मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारित करने का अधिकार है, जिसमें कुछ समय के लिए छह प्रतिशत तक की गुंजाइश छोड़ी जा सकती है। इस प्रकार प्रस्तावित नीति को अपनाने की संभावनाएं बन सकती हैं, विशेषकर तब जब तेल की कीमतों में एकबारगी ही बढ़ोतरी न होती हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी के कारण अर्थव्यवस्था को कुछ दर्द झेलने के साथ ही सुस्ती का भी शिकार होना पड़ेगा।
अब मौजूदा एवं प्रस्तावित नीति की कुछ तुलना कर ली जाए। समायोजन लागत या फिर तेल की ऊंची कीमतों के लिए बड़े भुगतान के चलते अर्थव्यवस्था किसी भी सूरत में सुस्त है। प्रस्तावित नीति के अंतर्गत मंदी आसन्न दिखाई पड़ती है। वहीं मौजूदा नीति के तहत सामान्य मुद्रास्फीति के बढ़ने के साथ ही मंदी की शुरुआत हो जाती है। ऐसी स्थिति में मंदी को टाला भी नहीं जा सकता। इसीलिए, जो तमाम विश्लेषक यह कहते हैं कि हमें आर्थिक वृद्धि की कीमत पर मुद्रास्फीति पर लगाम लगानी है तो वह गुमराह करना है। दरअसल आर्थिक वृद्धि में गिरावट तो तय है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि दोनों ही नीतियों के अंतर्गत न तो तेल की ऊंची कीमतों की मार से बचा जा सकता है और न ही आर्थिक मंदी की स्थिति से। फिर भी प्रस्तावित नीति के दौरान वास्तविक कीमतों में मौजूदा नीति की तुलना में कम बढ़ोतरी देखने को मिलेगी। इसलिए प्रस्तावित नीति मौजूदा नीति के मुकाबले कहीं बेहतर है।
(लेखक भारतीय सांख्यिकी संस्थान के दिल्ली केंद्र में अति​थि प्राध्यापक हैं)

First Published - June 15, 2022 | 12:34 AM IST

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