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आरबीआई करेगा 50 आधार अंक का इजाफा?

Last Updated- December 11, 2022 | 2:51 PM IST

 इस वर्ष पहली बार नीतिगत दरों में बढ़ोतरी के कुछ सप्ताह बाद मई में एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर श​क्तिकांत दास ने संकेत दिया था कि आने वाले दिनों में दरों में और इजाफा संभव है। अब अगर केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठ​क के पहले दास एक और साक्षात्कार देते हैं तो शायद यही बात दोहराएंगे। 

मई से रिजर्व बैंक ने अपनी नीतिगत दर यानी रीपो दर में तीन बार इजाफा किया है। यह वह दर है जिस पर वा​णि​ज्यिक बैंक केंद्रीय बैंक से पैसे जुटाते हैं। यह दर 4 फीसदी के ऐतिहासिक निचले स्तर से 5.40 प्रतिशत हो गई है। इस बीच केंद्रीय बैंक ने अपना ध्यान वृद्धि से हटाकर मुद्रास्फीति से निपटने में लगा दिया है।
 इस सप्ताह एमपीसी एक बार फिर दरों में इजाफा कर सकती है। यह इजाफा यकीनन 50 आधार अंक या 35 आधार अंक का होगा। एक आधार अंक प्रतिशत के सौवें हिस्से के बराबर होता है। 

 पहली बात तो यह कि दरों में इजाफा करना ही क्यों? जैसा कि दास ने कहा इस बारे में अनुमान लगाना मुश्किल नहीं। अगस्त में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 7 फीसदी के स्तर पर पहुंच गई। अप्रैल में 7.79 फीसदी की ऊंचाई के बाद जुलाई तक इसमें कमी आई थी और तब यह 6.71 फीसदी पर थी।

 जनवरी में मुद्रास्फीति ने आरबीआई के चार फीसदी से दो फीसदी ऊपर या नीचे के स्तर का उल्लंघन किया था लेकिन मुद्रास्फीति लगातार आठ महीनों तक उस दायरे के ऊपर बनी रही। अगर यह लगातार नौ माह तक 6 फीसदी के ऊपरी स्तर का उल्लंघन करती है तो आरबीआई को केंद्र सरकार को जवाब देना होगा।

 जब रिजर्व बैंक ने 5 अगस्त को नीतिगत दर में 50 आधार अंक का इजाफा किया था तब से तुर्की, रूस और चीन को छोड़कर अ​धिकांश विकसित और विकासशील देशों के केंद्रीय बैंकों ने मुद्रास्फीति से निपटने के लिए नीतिगत दरें बढ़ाई हैं। उपरोक्त तीन देशों ने दरों में कटौती की है।

 यूरोपीय केंद्रीय बैंक, बैंक ऑफ कनाडा, बैंक ऑफ फ्रांस, जर्मनी के डॉयचे बुंडसबैंक, स्वीडन के केंद्रीय बैंक और ​स्विस नैशनल बैंक ने दरों में 75 आधार अंक का इजाफा किया। चिली और हंगरी के केंद्रीय बैंक ने इनमें एक प्रतिशत का इजाफा किया। बैंक ऑफ इंगलैंड, बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया, और न्यूजीलैंड के केंद्रीय बैंकों ने 50 आधार अंक का इजाफा किया। इंडोने​शिया, पोलैंड, नाइजीरिया, थाईलैंड, कोरिया और मले​​शिया ने 25 आधार अंक का इजाफा किया।

 भारत के लिए सबसे अ​धिक मायने फेडरल रिजर्व रखता है। गत सप्ताह फेड ने नीतिगत दरों में 75 आधार अंक का और इजाफा किया तथा यह 2008 के आरंभ के बाद उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। चूंकि रिजर्व बैंक दरों में इजाफे की मदद से अर्थव्यवस्था को सहज बनाए रखना चाहता है इसलिए उसके अलावा कोई विकल्प नहीं है। लेकिन यह इजाफा कितना होगा? जो लोग 35 आधार अंक की बात कह रहे हैं उनके पास भी अपनी बात के पक्ष में कुछ तर्क हैं।

 मॉनसून के सामान्य रहने और कच्चे तेल की भारतीय बास्केट के 105 डॉलर प्रति बैरल रहने के अनुमान के साथ अगस्त में एमपीसी ने कहा था वित्त वर्ष 23 के लिए जून के 6.7 फीसदी मुद्रास्फीति के पूर्वानुमान पर टिकी रही। दूसरी और तीसरी तिमाही में उसने इसमें संशोधन किया लेकिन चौथी तिमाही के अनुमानों को 5.8 फीसदी के साथ अपरिवर्तित छोड़ दिया। वित्त वर्ष 24 की ​पहली तिमाही के लिए खुदरा मुद्रास्फीति का अनुमान 5 फीसदी है।

कच्चे तेल की कीमत कम है और लगता नहीं कि मुद्रास्फीति आरबीआई के अनुमानों से अ​धिक होगी। हकीकत में तो यह रिजर्व बैंक के अनुमान से भी कम रह सकती है।

इस बीच वृद्धि बहुत उम्मीद बंधाने वाली नहीं है। देश का जीडीपी वित्त वर्ष 23 की पहली तिमाही में 13.5 फीसदी की दर से बढ़ा है जो एक वर्ष में सबसे तेज है लेकिन यह फिर भी आरबीआई के 16.2 फीसदी के अनुमान से काफी कम है। इस बीच औद्योगिक उत्पादन जुलाई में केवल 2.4 फीसदी की गति से बढ़ा है जो अप्रैल के बाद से न्यूनतम है। जून में यह 12.7 फीसदी था। ऐसे में आरबीआई भी अ​धिक आक्रामकता नहीं दिखा सकता।
 मेरा मानना है कि दरों में एक बार फिर 50 आधार अंक का इजाफा किया जाएगा। यकीनन कच्चे तेल के भारतीय बास्केट की कीमत आरबीआई के अनुमान से अ​धिक कम हुई है। परंतु मॉनसून अनि​श्चित है और खाद्य मुद्रास्फीति एक बड़ी चुनौती है। अगर रुपये में गिरावट जारी रहती है तो तेल कीमतों से होने वाला लाभ भी नहीं मिलेगा। ऐसा लगता नहीं कि रिजर्व बैंक अपने मुद्रास्फीति संबंधी अनुमान में कटौती करेगा।

फेडरल रिजर्व द्वारा 75 आधार अंक की बढ़ोतरी अनुमानों के अनुरूप रही। परंतु अब यह संभव है कि भारत में नीतिगत दरें 2023 में 4.6 फीसदी तक चली जाएं। फेडरल रिजर्व भी 2022 के अं​त तक दरों को 4.4 फीसदी कर सकता है। इस वर्ष दो नीतिगत बैठकें और होनी हैं ऐसे में काफी संभावना है कि इस वर्ष 75  आधार अंक का इजाफा हो सकता है।
 सन 2000 से ही अमेरिकी फेडरल रिजर्व और भारत की नीतिगत दर के बीच औसत अंतर 528.86 आधार अंक का रहा है। अगस्त 2000 में यह 900 आधार अंक के साथ उच्चतम स्तर पर गया था। उस वक्त भारत की नीतिगत दर 15.5 फीसदी थी। उस समय इसे रिवर्स रीपो दर कहा जाता था। तब अमेरिका में दर 6.5 फीसदी थी। जून 2006 में यह 125 आधार अंक के साथ निचले स्तर पर थी। तब भारत में यह 6.5 फीसदी तथा अमेरिका में 5.25 प्रतिशत थी। 

 बीते दशक में एक बार यानी जनवरी 2012 में अमेरिका और भारत की नीति​गत दर के बीच 850 आधार अंक का अंतर था। उस समय भारत की नीतिगत दर 8.5 फीसदी और अमेरिका की शून्य थी। 

ताजा इजाफे के बाद दोनों के बीच का अंतर 240-265 आधार अंक रह गया है। ऐसे में मुद्रा के लिए संकट उत्पन्न हो सकता है क्योंकि मुद्रा तो वहीं जाती है जहां प्रतिफल अच्छा हो।
 गत शुक्रवार को डॉलर के मुकाबले रुपया 80.99 पर बंद हुआ उससे पहले इसने 81.26 के उच्चतम स्तर को भी छुआ। रिजर्व बैंक मुद्रा बाजार में अनिश्चितता रोकने के लिए हस्तक्षेप करता रहा। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बीते एक वर्ष में 96.80 अरब डॉलर घटा है और यह 3 सितंबर, 2021 के 642.45 अरब डॉलर से घटकर 545.65 अरब डॉलर हो गया है। जाहिर है ऐसा केवल आरबीआई द्वारा डॉलर की बिक्री करके रुपये को थामने की वजह से नहीं हुआ है। डॉलर के मुकाबले अन्य मुद्राओं में गिरावट तथा सोने के मूल्य ने भी इसमें योगदान दिया है।

 रुपये में गिरावट के कारण देश के चालू खाते के घाटे को लेकर चिंता बढ़ी है। संस्थागत विदेशी निवेशक जुलाई से भारतीय शेयरों के विशुद्ध खरीदार बन गए थे लेकिन कमजोर रुपये के कारण प्रतिफल प्रभावित होने के कारण वे दोबारा बिकवाली कर रहे हैं।

सामान्य शब्दों में कहें तो आरबीआई दरों में 50 आधार अंक का इजाफा कर सकता है लेकिन ऐसा केवल मुद्रास्फीति  से निपटने के लिए नहीं किया जाएगा ब​ल्कि मुद्रा अवमूल्यन को थामने तथा आयातित मुद्रास्फीति से बचने के लिए भी ऐसा किया जाएगा। हालांकि विनिमय दर प्रबंधन एमपीसी का काम नहीं है लेकिन वह निर्णय लेते वक्त रुपये के अवमूल्यन पर जरूर गौर करेगी क्योंकि इससे मुद्रास्फीति प्रभावित होती है। 
 यदि 50 आधार अंक की वृद्धि हुई तो नीतिगत दर 5.9 फीसदी हो जाएगी। यह चालू  सत्र की अंतिम बढ़ोतरी भी नहीं होगी। कह सकते हैं​ कि यह 6 फीसदी का स्तर पार करके 6.25-6.5 फीसदी के स्तर तक जा सकती है।

क्या आरबीआई अपने वृद्धि अनुमानों में कटौती करेगा? वह ऐसा कर सकता है। फिलहाल वित्त वर्ष 23 के लिए वृद्धि अनुमान 7.2 फीसदी पर है। 

First Published - September 26, 2022 | 10:52 PM IST

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