आप चाहें तो इसे केवल संयोग की संज्ञा दे सकते हैं, लेकिन कुछ महीनों में बुनियादी ढांचे से जुड़ी ज्यादातर परियोजनाएं सरकारी कंपनियों को ही दी गईं।
ऐसी परियोजनाएं आम तौर पर प्राइवेट कंपनियों को दी जाती थीं। यह कवायद केवल केंद्र सरकार के स्तर पर ही नहीं चल रही है, बल्कि राज्य सरकारों के स्तर से भी हो रही है। इसका नमूना कोलकाता और चेन्नई की मेट्रो रेल परियोजनाएं हैं, जहां केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर यह जिम्मेदारी उठाने का फैसला किया है।
भारतीय हवाई अड्डा प्राधिकरण ने अमृतसर और उदयपुर हवाईअड्डों के सीमित निजीकरण की योजना को ठंडे बस्ते में डाल दिया है। साथ ही, इस बार तेल की खोज के लिए भी सबसे ज्यादा लाइसेंस सरकारी कंपनियों को ही मिले हैं। जवाहरलाल नेहरू शहरी पुनर्विकास मिशन की परियोजनाओं को पूरा करने की बड़ी जिम्मेदारी भी सरकारी एजेंसियों के कंधों पर ही डाली गई है। ऐसा ही राज्य सरकारें भी कर रही हैं।
हालांकि, मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक प्रोजेक्ट को छोड़ दें तो इस तरह की ज्यादातर परियोजनाओं के सरकारी झोली में जाने को अखबारों में भी ज्यादा अहमियत नहीं मिलती है। मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक प्रोजेक्ट ने भी केवल इसी लिए हेडलाइनें बटोरीं क्योंकि उसके साथ अंबानी भाइयों का नाम जुड़ा हुआ था। ऊपरी तौर पर इसकी वजहें साफ नजर आती हैं। प्राइवेट सेक्टर के घटिया प्रदर्शन से टूटता भ्रम और फिर से सरकारी कंपनियों को मजबूत बनाने की कोशिश।
साथ में कोढ़ में खाज है घटिया ठेके, जिसमें प्राइवेट कंपनियों के घटिया प्रदर्शन के लिए उन पर किसी तरह का जुर्माना नहीं लगाया जाता। इस बात की मिसाल हैं, कई हवाईअड्डों के आधुनिकीकरण के ठेके और दिल्ली-गुड़गांव एक्सप्रेस वे। साथ ही, इन कंपनियों की ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की भूख की वजह से निजीकरण के कट्टर समर्थकों का भी दिल खट्टा हो गया है। चूंकि, बुनियादी ढांचे से जुड़ीं दूसरी परियोजनाओं के बारे में काफी कुछ लिखा जा चुका है।
इसलिए हम इस कॉलम में चर्चा करेंगे, 7000 करोड़ रुपये से मुंबई और न्हवा के बीच अरब सागर के ऊपर बनने वाले 22 किमी लंबे मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक के बारे में। इस मामले में भी अगर बोलियों के बीच अंतर पर निगाह डालें तो सरकार का यह परियोजना खुद पूरा करने का फैसला सही ही लगता है। एक तरफ, मुकेश अंबानी ने जहां इसे बनाने के बाद खर्चे निकालने के लिए 75 सालों के लिए मांगा था तो वहीं उनके छोटे भाई अनिल ने इसे केवल नौ साल 11 महीने के लिए मांगा था।
इस वजह से कई लोगों के दिमाग में यह सवाल कुलबुलाने लगा था कि कहीं यह मुकेश की सेज परियोजना में पलीता लगाने की कोशिश तो नहीं है, जिसे इस हार्बर लिंक से काफी फायदा होने वाला था। अनिल ने इस लिंक को बनाने के बाद 9 साल 11 महीने का समय मांगा था। इस वजह मुंबई में यह चुटकुला बन गया था कि अनिल ने मुकेश की सेज परियोजना के साथ वही किया, जो 911 ने अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर के साथ किया था। लेकिन यह सब तो एक दिखावा भर है। अगर राज्य सरकार सचमुच इस मुद्दे पर फिर से बोलियां मंगवाना चाहती थी तो उसे केवल एक महीने और इंतजार करना पड़ता।
अगर वह फिर से पूरी की पूरी प्रक्रिया दोहराना भी चाहती तो भी उसे ज्यादा से ज्यादा तीन से चार महीने लगते। वैसे बात जो भी हो, अनिल अंबानी की बोली के साथ वही खामी थी, जो ऐसी ज्यादातर परियोजनाओं के साथ होता है। ऐसी परियोजनाओं में सबसे ऊंची बोली और सबसे कम बोली के बीच काफी बड़ी खाई होती है। अब सासन के अल्ट्रा मेगा पॉवर प्रोजेक्ट को ही ले लीजिए। अनिल की रिलायंस एनर्जी ने परियोजना के लिए 1.19 रुपये प्रति यूनिट की बोली लगाई थी, जबकि सरकारी कंपनी एनटीपीसी ने 2.23 पैसे की बोली लगाई थी।
मुंद्रा में भी यही हुआ था, जहां टाटा पॉवर ने 2.26 रुपये प्रति यूनिट की बोली लगाई थी, जबकि स्टरलाइट ने 3.74 पैसे की बोली लगाई थी। कृष्णापट्टम में भी रिलायंस एनर्जी ने स्टरलाइट की 4.20 रुपये की बोली के मुकाबले केवल 2.33 रुपये की बोली लगाई थी। इनमें से ज्यादातर परियोजनाओं में कई ऐसे बिंदु हैं, जिनके जरिये सरकार काम की प्रगति पर नजर रख सकती थी। इसलिए अगर अनिल अंबानी इनमें से किसी भी बिंदु को पूरा नहीं कर पाते तो उन्हें प्रोजेक्ट से हटकर परियोजना को फिर से ट्रैक पर लाना कोई मुश्किल काम नहीं होता। वैसे भी इसमें मामले में वित्तीय दबाव काफी ज्यादा होता।
सबसे पहले तो 300 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी देनी होती। फिर से 300 करोड़ रुपये का तुरंत भुगतान भी करना पड़ता। साथ ही, दूसरे सालाना भुगतान भी होते। इसलिए अनिल पर भारी वित्तीय दबाव होता। साथ ही, यह मामला उनकी इात के साथ भी जुड़ा हुआ था। इसलिए उन्हें यह काम समय पर पूरा करना ही होता। अब संदेह की नजर रखने वाले लोग-बाग पूछेंगे कि लेकिन केवल 9 साल 11 महीने की ही समयसीमा क्यों? मैं पूछता हूं, क्यों नहीं? अनिल की बोली के आलोचक कहेंगे कि छोटे मियां के वास्ते अपने खर्च निकालने के लिए यह समय-सीमा काफी कम है।
लेकिन आपको वह आखिरी मौका याद है जब सरकार की कोई भविष्यवाणी सच साबित हुई थी? जितने भी हवाई अड्डों के निजीकरण हुए वहां आज इतना ट्रैफिक है, जितना कि भविष्यवाणी सरकार ने आज से पांच साल बाद के लिए की थी। अब दिल्ली-गुड़गांव एक्सप्रेस वे को ही ले लीजिए। वहां भी सरकार की भविष्यवाणी गलत साबित हुई। यह वजह है कि इन सभी जगहों पर जगह कम पड़ने लगी है और उन परियोजनाओं पर भारी दवाब है। मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक के मामले में यहां मुकेश की सेज परियोजना को लेकर काफी ट्रैफिक आता, जिससे सरकारी भविष्यवाणी फिर से गलत हो जाती। तो क्या अनिल की सोच और बोली गलत नहीं थी?
हकीकत में यह सब इसलिए हो रहा है क्योंकि सरकार जान चुकी है कि बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं को किसी और को सौंपने से बेहतर और फायदेमंद उन्हें खुद करना है। अब तक तो वामदलों के विरोध के पर्दे में सरकार बुनियादी ढांचे को बनाने के काम का राष्ट्रीयकरण कर रही थी। लेकिन अब यह देखना मजेदार रहेगा कि सरकार इन कामों को कैसे सही ठहराएगी, जब वामदल दिल्ली की कुर्सी के हिस्सेदार नहीं रह जाएंगे।