इस साल मुल्क के श्रेष्ठ बी-स्कूलों से पास-आउट हुए छात्रों के प्रस्तावित वेतन पर नजर डालें, तो खुश होना स्वाभाविक ही है। दरअसल, इस साल उनके वेतन में 5 या 6 नहीं, बल्कि पूरे 20 फीसदी का इजाफा हुआ है।
इससे मंदी का असर बी-स्कूलों के प्लेसमेंट पर पड़ने की आशंका भी हवा हो गई। ‘बिजनेस स्टैंडर्ड’ और ऑल इंडिया मैनेजमेंट एसोसिएशन के इस साल बेस्ट बी स्कूल सर्वे के सुनहरे आंकड़ों ने दिखा दिया है कि इस बार भी अच्छे मैनेजरों की मांग उनकी आपूर्ति से आगे निकल गई। वेतन में आए इस उछाल को इसलिए भी जबरदस्त कहा जाएगा क्योंकि इसमें विदेशी कंपनियों की पेशकश को शामिल नहीं किया गया है।
इन आंकड़ों से बी-स्कूलों में पढ़ने की ख्वाहिश रखने वाले छात्रों के हौंसले और भी बुलंद हो जाएंगे। लेकिन इस सर्वे में यह बात भी काफी साफ तरीके से कही गई है कि मंदी का असल असर तो अगले साल ही दिखाई देगा। इस बात को आईआईएम अहमदाबाद के निदेशक समीर बरुआ भी कह चुके हैं।
उन्होंने मार्च में कहा था कि, ‘हमारे यहां से लोगों को लेने वाली कंपनियां अमेरिकी मंदी के पूरे असर को भांपने में नाकामयाब रही हैं।’ छह महीने के बाद आज मंदी की आंधी में भरोसे की लौ बुझने की कगार पर है, लेकिन बी-स्कूलों की इस मामले पर तैयारी को देखकर काफी खुशी होती है।
मुल्क के टॉप बी-स्कूल आज मंदी की मार से अपने छात्रों को बचाने के लिए तरह-तरह के नए तरीके अपना रहे हैं। इसलिए तो वे पुराने नियोक्ताओं के अलावा भी देख रहे हैं। अब उनकी नजर गैर अमेरिकी कंपनियों और छोटी कंपनियों पर टिक चुकी है।
वेतन में इजाफा इस पूरी कहानी का केवल एक ही पहलू है। एआईएमए सर्वे कई दूसरी बड़ी बातों को भी सामने रखता है। यह बी-स्कूलों पर पहले हुए सर्वे से काफी हद तक अलग है क्योंकि इसमें संस्थानों की रैंकिंग नहीं होती। यह तो उनके प्रदर्शन के आधार पर उन्हें अलग-अलग समूहों में बांटती है।
यह काफी जरूरी है क्योंकि एक सर्वे छात्रों, संस्थानों और नियोक्ताओं के लिए चेकलिस्ट के तौर पर काम करता है। न कि एक ऐसी सूची, जिसमें थोड़ी सी गलती भी पूरी की पूरी तस्वीर को खराब कर सकती है। मिसाल के तौर पर यह सर्वे हमें बताता है कि एफएमएस, दिल्ली और आईएमटी, गाजियाबाद जैसे संस्थान भी अब तेजी से शोध, पढ़ाने के लिए नए-नए तरीकों और कैंपस के मामले में आईआईएम की बराबरी कर रहे हैं।
अचंभे की बात यह है कि छोटे-छोटे संस्थानों के कई प्राध्यापकों को बड़े संस्थानों के प्राध्यापकों के मुकाबले ज्यादा इात दी जाती है। साथ ही आर्थिक विकास की रफ्तार सुस्त पड़ने की वजह से अब बड़ी-बड़ी कंपनियों ने इन संस्थानों से सलाह मांगनी कम कर दी है।
इसके अलावा, कंपनियों के मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम कोर्सों की तादाद भी इस साल कम हुई है। कुछ बड़े संस्थानों में तो यह गिरावट 50 फीसदी से भी ज्यादा की है। यह अपने-आप में बड़े नतीजे हैं, लेकिन हकीकत तो यही है कि इन सर्वेक्षणों की अपनी भी कुछ सीमाएं हैं।
असल में यह सर्वेक्षण बड़े बी-स्कूलों तक ही सिमटे हुए हैं। एक ऐसे वक्त में जब मैनेजमेंट संस्थान कुकरमुत्ते के उग रहे हों, ऐसे सर्वेक्षण ठोस नतीजे देने में नाकामयाब रहते हैं।