परंपरागत सिध्दांत यह है कि किसी भी सेक्टर के नियमन (रेग्युलेशन) की जिम्मेदारी राजनीतिक आकाओं को सौंपे जाने से बेहतर है कि उस खास क्षेत्र को स्वतंत्र नियामक के हवाले कर दिया जाए।
ऐसा माना जाता है कि यदि किसी सेक्टर के लिए नियामक (रेग्युलेटर) बहाल किया जाता है, नियामक तो उस खास क्षेत्र के भले के लिए कुछ कड़े फैसले लेने से भी गुरेज नहीं करेगा।
यह भी माना जाता है कि नियामकों की वजह से सर्विस मुहैया कराने वाली कंपनियां ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी नहीं करतीं। पर पिछले कई वर्षों की पड़ताल की जाए तो यह परंपरागत सिध्दांत सचाई के ज्यादा करीब नजर नहीं आता। कई मामलों में तो स्वतंत्र नियामक राजनीतिक निगरानी से भी बुरे साबित हुए हैं। चूंकि नियामकों में भी राजनीतिक नियुक्तियां ही की जाती हैं, लिहाजा यह सोचना शायद बचकाना ही माना जाएगा कि ये नियामक स्वतंत्र और वाजिब तरीके से काम करेंगे।
दरअसल, तमाम तरह की समस्याओं के मौजूद रहने और इनके भविष्य में बने रहने की संभावनाओं के बावजूद देश के टेलिकॉम सेक्टर में रेग्युलेरटी बॉडी के गठन के बाद (लंबी दूरी की कॉल को छोड़ दें तो) ग्राहकों से जरूरत से ज्यादा शुल्क लिए जाने की समस्या तो खत्म हुई है।
शुरू में ही टेलिकॉम रेग्युलेटर ने प्राइस कैप तय कर दिया और जैसे-जैसे इस क्षेत्र में स्पध्र्दा तेज होती गई, प्राइस कैप को लागू कराए जाने में कभी भी समस्या पैदा नहीं हुई। इस क्षेत्र में आई तगड़ी स्पध्र्दा का नतीजा यह हुआ कि टेलिकॉम सेक्टर के टैरिफ रेग्युलेटर द्वारा तय प्राइस कैप से हमेशा नीचे ही रहे। पर टेलिकॉम सेक्टर के लिए अपनाए गए मॉडल को सभी क्षेत्रों में लागू करना काफी कठिन है।
आखिरकार किसी सड़क, हवाईअड्डे या फिर बंदरगाह के संचालन के मामले में एक साथ कितनी कंपनियों की सेवाएं ली जा सकती हैं? कहने का मतलब यह कि टेलिकॉम सेक्टर में एक साथ कई कंपनियां अपनी सेवाएं दे रही हैं, पर यह बात हर क्षेत्र के लिए समान रूप से लागू नहीं हो सकती। यहां तक कि बिजली क्षेत्र, जिसमें ओपन एक्सेस का इंतजाम है, वहां भी सप्लाई से जुड़ीं कई कंपनियां हैं, पर इस सेक्टर में भी स्पध्र्दा एक खास सीमा तक ही है।
इनमें से ज्यादातर क्षेत्रों में रेग्युलेटर इस हिसाब से टैरिफ तय करते हैं कि सर्विस मुहैया कराने वाली कंपनियों को उनके निवेश के एवज में एक निश्चित रिटर्न हासिल हो सके। उदाहरण के तौर पर, यदि कोई बिजली कंपनी साल भर में 100 करोड़ रुपये खर्च कर 100 करोड़ यूनिट बिजली की सप्लाई करती है, तो नियामक द्वारा उस कंपनी को ग्राहकों से 1.16 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से टैरिफ वसूलने की आजादी दी जाती है।
यानी उस कंपनी को अपने निवेश पर 16 फीसदी के रिटर्न की छूट दी जाती है। पर समस्या यह है कि (जैसा कि पहले भी देखा जा चुका है) कंपनियों को उनकी लागत के हिसाब से दिया जाने वाला रिटर्न काफी ज्यादा है। एनएसआईसीटी टर्मिनल द्वारा उपायोगकर्ताओं से 80 फीसदी ओवरचार्ज का मामला इसका हालिया उदाहरण है।
इसी तरह, बीएसईएस के मामले में दिल्ली इलेक्ट्रिसिटी रेग्युलेटरी के प्रमुख कह चुके हैं कि इस कंपनी ने बिजली उपकरणों की खरीद के लिए अपनी ही ग्रुप की कंपनी को वाजिब रकम से 533 करोड़ रुपये ज्यादा का भुगतान किया, जिसका बोझ टैरिफ बढ़ोतरी के जरिये दिल्लीवासियों की जेब से लिया जाएगा। तो आखिरकार किस तरह का रास्ता अपनाया जाए?
जैसा कि हम देख चुके हैं, टेलिकॉम मॉडल को हर क्षेत्र के लिए अमल में लाना काफी मुश्किल भरा है। एक रास्ता यह है कि ठेके की अवधारणा को अपनाया जाए। हाईवे सेक्टर में यह अवधारणा काफी कामयाब भी है। इसके तहत, ठेका दिए जाते वक्त ही यह तय कर दिया जाता है कि अधिकतम टैरिफ क्या होगा। इसके बाद ठेका पाने की इच्छुक कंपनियां इस बात के लिए बोली लगाती हैं कि वे रोड बनाने के लिए सरकार से कितना धन हासिल करना चाहती हैं।
पर क्या यह फॉरम्युला पावर सेक्टर में लागू किया जा सकता है, जहां कई चीजें मायने रखती हैं। बिजली खरीदने और उसकी सप्लाई पर आने वाली लागत के अलावा बिजली क्षेत्र के टैरिफ निर्धारण में बिजली चोरी की मात्रा पर भी विचार किया जाता है। कैसा हो यदि कंपनियां व्हीलिंग चार्ज के मद्देनजर अपनी बोली लगाए या फिर यदि कंपनियां बिजली खरीद की सबसे ऊंची कीमत को मानक बनाकर अपनी बोली लगाएं।
चूंकि बिजली चोरी के लेवल के हिसाब से व्हीलिंग चार्ज में अंतर पाया जा सकता है (चोरी जितनी ज्यादा होगी, लागत की भरपाई के लिए उतने ही ज्यादा व्हीलिंग चार्ज की जरूरत होगी )। बोली लगाने वाली कंपनी यह बताएगी कि बिजली चोरी को कम करने के लिए वह कितना निवेश करेगी और फिर इसके हिसाब से अपने व्हीलिंग चार्ज से संबंधित अपनी बोली लगाएगी।
यदि ऐसा होता है, तो इस बात के लिए इलेक्ट्रिसिटी कमिशन पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा कि बिजली कंपनियों की लागत सही है या फर्जी। तो फिर रेग्युलेटर का क्या काम होगा? इनकी भूमिका यहां भी वैसी ही तय की जा सकती है, जैसी कि विदेशों में है। उन्हें इस बात की जिम्मेदारी दी जाए कि किसी खास क्षेत्र को प्राइस कैप के आधार पर रेग्युलेट किया जाए या फिर कॉन्ट्रैक्ट के हिसाब से।
उन्हें परफॉर्मेंस से संबंधित मानक तय करने और उनकी निगरानी का अधिकार हो। इसी तरह खर्च के एक बड़े हिस्से की बोली प्रक्रिया के लिए नियम बनाने का अधिकार रेग्युलेटर को दिया जाए। नेताओं और नौकरशाहों के विशेषाधिकारों को कम किए जाने की मंशा से नियामकों के गठन को प्रयोग के तौर पर लाया गया। पर अब नियामकों के विशेषाधिकारों को कम किए जाने की जरूरत है।