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नियमन और प्रकटीकरण

Last Updated- December 11, 2022 | 6:17 PM IST

राष्ट्रीय कंपनी विधि अपील पंचाट (एनसीएलएटी) ने एमेजॉन की वह अपील खारिज कर दी जिसमें उसने भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीआई) के आदेश को चुनौती दी थी। आदेश 2019 में फ्यूचर ग्रुप के साथ हुए 1,431 करोड़ रुपये के सौदे से संबंधित था। इस निर्णय से एमेजॉन को झटका लगा है। पंचाट ने 200 करोड़ रुपये का जुर्माना भी बरकरार रखा। अनुमान है कि एमेजॉन एनसीएलएटी के इस आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय का रुख करेगी। यह मामला कैसे हल होता है यह देखना होगा लेकिन यह भारत के जटिल नियामकीय वातावरण का एक और उदाहरण है जो आए दिन कारोबारों को प्रभावित करता है। इस मामले की शुरुआत 2019 में हुई जब एमेजॉन ने 1,431 करोड़ रुपये की राशि खर्च करके फ्यूचर कूपंस प्राइवेट लिमिटेड में 49 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी थी। प्रतिस्पर्धा नियामक ने इस सौदे को मंजूरी दी थी। लेकिन सीसीआई ने 2021 में इस सौदे को स्थगित कर दिया और एमेजॉन पर सूचनाएं दबाने के लिए जुर्माना लगाया गया।
अपील पंचाट ने इस नजरिये को बरकरार रखा है कि एमेजॉन ने सीसीआई को गलत वक्तव्यों के जरिये भ्रमित किया तथा प्रासंगिक सूचनाएं छिपाईं। जानकारी के मुताबिक एमेजॉन ने ऐसा संकेत दिया कि वह फ्यूचर कूपंस कारोबार में रुचि रखती है लेकिन यह लेनदेन दरअसल भारतीय खुदरा क्षेत्र में प्रवेश के लिए किया गया था। फ्यूचर कूपंस के पास फ्यूचर रिटेल में भी हिस्सेदारी है जो कंपनी की खुदरा कारोबार शाखा है। एमेजॉन ने अपने कानूनी बचाव में दावा किया कि यह बात स्पष्ट रूप से दर्ज की गई थी कि कंपनी का निवेश इस नजरिये से किया गया था कि कभी न कभी सरकार बहुब्रांड खुदरा में विदेशी निवेश की इजाजत देगी। अब तक यह खुदरा दिग्गज अपनी कानूनी स्थिति के बारे में संबंधित अधिकारियों को सहमत नहीं कर पाई है।
हालांकि यह पूरा मामला तब और जटिल हो गया जब फ्यूचर रिटेल के बोर्ड ने रिलायंस रिटेल के साथ 24,713 करोड़ रुपये के सौदे को मंजूरी प्रदान कर दी। तब एमेजॉन ने सिंगापुर इंटरनैशनल आर्बिट्रेशन सेंटर का रुख किया और यह दावा करते हुए सौदे को रुकवाने की मांग की कि फ्यूचर समूह अनुबंध का उल्लंघन कर रहा है। उसे वहां से स्थगन आदेश मिल गया, हालांकि सीसीआई उक्त सौदे को मंजूरी दे चुका था। हालांकि यह अब प्रासंगिक नहीं रह गया क्योंकि रिलायंस रिटेल ने अप्रैल में इस सौदे पर आगे नहीं बढ़ने का निर्णय लिया क्योंकि फ्यूचर समूह के कर्जदाताओं के विरोध के कारण यह मंजूर नहीं हो सका। राष्ट्रीय कंपनी लॉ पंचाट के फरवरी के एक आदेश के अनुसार मतदान किया गया और इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने फ्यूचर समूह को इजाजत दे दी कि वह रिलायंस रिटेल को बिक्री के मामले में कर्जदाताओं और अंशधारकों की मंजूरी लेने की कोशिश करे।
यह देखना होगा कि अगर एमेजॉन सर्वोच्च न्यायालय जाती है तो वह अपना बचाव कैसे करेगी। यहां दो बातों का उल्लेख करना जरूरी है। पहली बात, विदेशी और घरेलू संगठित खुदरा के बीच मध्यस्थता का भेद अनावश्यक जटिलताएं पैदा कर रहा है। भारत को ऐसी स्थिति नहीं बनानी चाहिए कि एक बड़े निवेशक को इस उम्मीद पर रहना हो कि कभी न कभी सरकार निवेश की इजाजत देगी। बहुब्रांड खुदरा में विदेशी निवेश को लेकर प्रारंभिक दलील यह थी कि इससे स्थानीय किराना कारोबारी प्रभावित होंगे लेकिन अब यह कारगर नहीं है क्योंकि बड़े भारतीय कारोबारी समूह इस बाजार में आ गए हैं। ऐसे में विदेशी निवेश को रोकने से छोटे कारोबारियों के बजाय इन बड़े कारोबारों को मदद मिलेगी। दूसरी बात, यह स्पष्ट नहीं है कि जिस सौदे का मामला एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर चल रहा हो उसमें मतदान की इजाजत देना क्यों जरूरी था। व्यापक स्तर पर, दीर्घावधि का निवेश आकर्षित करने के लिए यह अहम है कि नियमन निष्पक्ष और समान हों। अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को स्वीकार करने का माद्दा भी दिखाना होगा।

First Published - June 15, 2022 | 12:33 AM IST

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