केंद्र सरकार ने मेडन फार्मास्युटिकल्स पर लगे आरोपों की जांच के लिए चार सदस्यीय समिति गठित करने का निर्णय लिया है। यह प्रकरण देश के औषधि उद्योग से जुड़ी नियामकीय व्यवस्था को लेकर गंभीर प्रश्न उत्पन्न करता है। कथित तौर पर मेडन फार्मास्युटिकल्स द्वारा निर्मित बच्चों का कफ सिरप पीने से गाम्बिया में 66 बच्चों की मौत होने के तत्काल बाद हुई जांच से संकेत मिला कि कंपनी दूषित कच्चे माल का इस्तेमाल कर रही थी।
जांच से यह भी पता चला कि कंपनी अच्छे निर्माण व्यवहार (गुड मैन्युफैक्चरिंग प्रैक्टिसेस यानी जीएमपी) का पालन नहीं कर रही थी जैसा कि उसे औषधि एवं प्रसाधन नियमों के तहत करना चाहिए। इन बातों के सामने आने के बाद पूरा प्रकरण अंतरराष्ट्रीय स्कैंडल का रूप धारण कर चुका है और विश्व स्वास्थ्य संगठन भी सक्रिय हो गया है। यही वजह है कि केंद्र और राज्य सरकार ने पूरी क्षमता से मेडन फार्मास्युटिकल्स के खिलाफ कदम उठाया है।
कंपनी में हर प्रकार का निर्माण रोक दिया गया है और उसे कारण बताओ नोटिस जारी करके पूछा गया है कि वह अपने उत्पादों के निर्माण और उनसे संबंधी मंजूरी की प्रक्रिया में व्याप्त उन तमाम अनियमितताओं का जवाब दे जो हरियाणा औषधि प्राधिकरण तथा केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संस्थान (सीडीएससीओ) द्वारा चिह्नित की गई हैं।
यह जांच और सक्रिय कार्रवाई तब हो रही है जब इस घटना के कारण देश के औषधि उद्योग को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा है। भारत दुनिया का चौथा सबसे बड़ा औषधि उत्पादक देश है और वह जेनेरिक औषधियों का सबसे बड़ा निर्यातक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार दिल्ली मुख्यालय वाली मेडन फार्मा के हरियाणा के संयंत्र में चार कफ सिरप में डाइएथिलीन ग्लाइकोल और एथिलीन ग्लाइकोल जैसे दो विषाक्त तत्त्व पाए गए और आशंका है कि गाम्बिया में मरने वाले बच्चों के गुर्दे इन्हीं की वजह से खराब हुए होंगे।
सीडीएससीओ की जांच में कुछ अन्य बातों के अलावा यह भी पाया गया कि इन दवाओं पर दिसंबर 2021 के निर्माण लेबल के साथ बैच निर्माण की तारीख 2022 की थी। मेडन टैबलेट, जेल और इंजेक्शन के माध्यम से दी जाने वाली दवाएं भी बनाती है और कंपनी के उत्पाद पोर्टफोलियो की जांच में कई कमियां पाई गई हैं। ऐसे में स्पष्ट है कि कंपनी को अपने कारोबार को लेकर कई सवालों के जवाब देने हैं। इसके साथ ही केंद्र और राज्यों के औषधि नियामकों पर भी सवाल खड़े होंगे।
प्रमुख प्रश्न यह है कि आखिर ये नियामक कितनी मजबूती और सख्ती से निगरानी करते हैं। करीब 32 वर्ष पुरानी (वेबसाइट के अनुसार) और अनुबंध के आधार पर औषधि निर्माण में वैश्विक पहुंच वाली कंपनी में ऐसी गड़बड़ियां कैसे चलती रहीं? राज्य और केंद्र के औषधि नियामक कितनी बार जांच करते हैं? उनकी जांच कितनी विस्तार से की जाती हैं?
ये सवाल अतीत में भी लगातार पूछे गए हैं क्योंकि मेडन फार्मास्युटिकल्स से कहीं बड़े आकार की भारतीय औषधि कंपनियों की फैक्टरियां अमेरिकी खाद्य एवं औषधि प्रशासन की जांच में नाकाम हो चुकी हैं। ऐसा नहीं है कि भारतीय दवा कंपनियों के विदेशी ग्राहकों के समक्ष ही जोखिम है। नकली और मिलावटी दवाएं घरेलू बाजार के लिए भी एक बड़ा खतरा हैं।
औद्योगिक संगठन एसोचैम के एक अध्ययन से पता चला कि देश में नकली दवाओं का कारोबार फल-फूल रहा है और घरेलू दवा बाजार में 25 फीसदी दवाइयां नकली हैं। अध्ययन में यह भी कहा गया कि दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र नकली दवाओं के कारोबार का केंद्र है।
बिना नियामकीय प्राधिकार की मिलीभगत या अक्षमता के ऐसे हालात नहीं बन सकते। वैश्विक औषधि उद्योग पूरे प्रकरण पर निगाहें जमाए हुए हैं। ऐसे में मेडन फार्मास्युटिकल्स की जांच निस्संदेह बहुत बारीकी से होगी। नियामक भी अगर अपने कामकाज के तौर तरीकों की ऐसी ही समीक्षा करें तो उन्हें भी लाभ पहुंचेगा।